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Vaishakh Purnima Vrat katha: वैशाख पूर्णिमा व्रत की पौराणिक कथा, मिलेगा संतान सुख और दीर्घायु होने का आशीर्वाद

Vaishakh Purnima Vrat Katha in Hindi: पूर्णिमा तिथि विष्णु जी और मां लक्ष्मी को समर्पित है। इस बार वैशाख माह में पूर्णिमा 1 मई को है। इस दिन विष्णु-लक्ष्मी की आराधना करने से हर इच्छा पूर्ण होती है। इस दिन पूजा के दौरान वैशाख पूर्णिमा व्रत का पाठ जरूर करें। इससे पूजा पूर्ण मानी जाती है।

Vaishakh Purnima Vrat Katha- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV वैशाख पूर्णिमा व्रत की पौराणिक कथा

Vaishakh Purnima Vrat Katha in Hindi: सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के अगले दिन पूर्णिमा तिथि आती। हर महीने आने वाली पूर्णिमा तिथि को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। वैशाख माह की पूर्णिमा को वैशाख बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस साल वैशाख पूर्णिमा 1 मई को मनाई जा रही है। मान्यताओं के अनुसार, वैशाख पूर्णिमा को ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। पूर्णिमा पर ज्यादातर लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान करने का भी विशेष महत्व है। इस दिन पूजा के दौरान वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करने से विष्णु जी की विशेष कृपा मिलती है। यहां पढ़िए संपूर्ण कथा। 

वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा (Vaishakh Purnima Vrat Katha )

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है कांतिका नाम के एक समृद्ध नगर में चंद्रहास्य नामक राजा राज्य करता था। उसी नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहता था। उनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने के कारण दोनों अत्यंत दुखी रहते थे। एक दिन नगर में एक साधु आया, जो सभी घरों से भिक्षा मांगता, परंतु धनेश्वर के घर कभी नहीं जाता था। इस बात से दंपत्ति को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने साधु से इसका कारण पूछा।

साधु ने स्पष्ट कहा कि निःसंतान घर से भिक्षा लेना अशुभ माना जाता है, इसलिए वह उनके घर नहीं जाता। यह सुनकर धनेश्वर व्यथित हो गया और उसने साधु से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। तब साधु ने उन्हें सोलह दिनों तक मां चंडी की विधिपूर्वक पूजा करने का उपदेश दिया। दंपत्ति ने श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन किया।

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां काली प्रकट हुईं और सुशीला को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। साथ ही उन्होंने पूर्णिमा के व्रत की विधि भी बताते हुए कहा कि हर पूर्णिमा को दीपक जलाना और प्रत्येक बार दीपकों की संख्या बढ़ाते जाना, जब तक उनकी संख्या 32 न हो जाए। दंपत्ति ने इस नियम का पालन किया और कुछ समय बाद सुशीला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम देवदास रखा गया।

जब देवदास बड़ा हुआ, तो उसे शिक्षा के लिए काशी भेजा गया। वहां उसके साथ एक विचित्र घटना घटी और उसका विवाह धोखे से करा दिया गया, जबकि वह स्वयं को अल्पायु बता रहा था। कुछ समय बाद जब उसके प्राण लेने का समय आया, तो मृत्यु भी उसे छू न सकी। अंततः यमराज ने इस रहस्य को जानने का प्रयास किया।

तब यह ज्ञात हुआ कि देवदास के माता-पिता द्वारा पूर्णिमा का व्रत और मां काली की आराधना के प्रभाव से उसे दिव्य संरक्षण प्राप्त था। इस प्रकार वैशाख पूर्णिमा का व्रत संतान सुख और दीर्घायु का वर देने वाला माना जाता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)