1. Hindi News
  2. खेल
  3. अन्य खेल
  4. DOPING: छोटा करियर, जल्द सब कुछ पाने की चाह और डोपिंग का मकड़जाल

DOPING: छोटा करियर, जल्द सब कुछ पाने की चाह और डोपिंग का मकड़जाल

पहलवान नरसिंह यादव ‘प्रकरण’ ने एक बार फिर से डोपिंग के भूत को जिंदा करने का काम किया है। यादव के नेगेटिव डोप टेस्ट ने ओलंपिक में भारत की करोड़ों उम्मीदों को झटका दिया है।

DOPE- India TV Hindi
DOPE

नई दिल्ली: पहलवान नरसिंह यादव ‘प्रकरण’ ने एक बार फिर से डोपिंग के भूत को जिंदा करने का काम किया है। यादव के नेगेटिव डोप टेस्ट ने न सिर्फ ओलंपिक में भारत की करोड़ों उम्मीदों को झटका दिया है बल्कि डोपिंग से जुड़ा वही पुराना सवाल एक बार फिर से हमारे सामने कर दिया है कि आखिर जल्द से जल्द बड़ा मुकाम पाने के लिए खिलाड़ी क्यों डोप का सहारा लेते हैं और शिखर चढ़ते अपने करियर पर ब्रेक सा लगा लेते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिंदुस्तानी खिलाड़ियों को ही सीमित समय में असीमित मुकाम पाने की चाह डोपिंग के दलदल में धकेलती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय दर्जे के खिलाड़ी भी इस कीचड़ में अपने हाथ सान चुके हैं।

अगर क्रिकेट, टेनिस और फुटबॉल को छोड़ दिया जाए तो अन्य खेल के खिलाड़ियों का करियर लगभग छोटा ही होता है जो हर चार साल में एक बार आयोजित होने वाले बड़े इवेंट में हिस्सा लेकर ही अपनी पहचान बना पाते हैं। ऐसे में छोटा करियर और लंबी चाह उन्हें डोपिंग की तरफ खींच लाती है। मगर इसकी चाह में जो भी फंसता है वो सिर्फ अपनी फजीहत ही करवाता है और कुछ नहीं। इन तमाम कशमकश के बीच सबसे बड़ा यह है कि आखिर यह डोप है क्या बला? डोप टेस्ट क्या और कैसे होता है? अब तक कितने देशी और विदेशी खिलाड़ी इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं? कौन लेता है डोप टेस्ट? इसके कानूनी प्रावधान क्या हैं और डोप टेस्ट में फेल हो जाने पर आप पर क्या कार्यवाही हो सकती है।

क्या है डोप:

डोप यानी शक्तिवर्धक दवाओं के जरिए अपने शरीर की मूल क्षमता और ताकत में इजाफा करना है जिसके जरिए खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंदी को चित करने की उम्मीद पाल लेता है। यह एक तरह का शार्टकट होता है जो खेल के नियमों के विरुद्ध है। खेल नियामक इसको अवैध ठहराते हैं। इसके लिए बाकायदा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियां खेल के खिलाड़ियों के लिए प्रतिबंधित दवाओं की एक सूची जारी करती हैं, लेकिन खिलाड़ी चाहे-अनचाहे इसका सेवन कर बुरी तरह फंस जाते हैं।

कब सामने आया पहला मामला:

साल 1904 के ओलंपिक खेलों में इसका पहला मामला सामने आया। तब जानकारी में मालूम चला था कि मैराथन धावक थॉमस हिक ने रेस जीतने के लिए कच्चे अंडे, सिंथेटिक इंजेक्शन, और ब्रांडी का इस्तेमाल शक्तिवर्धक के तौर पर किया था, हालांकि उस वक्त इसको लेकर कोई कड़े नियम कायदे नहीं थे। साल 1920 आते आते खिलाड़ियों की इस तिकड़म को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए गए। साल 1928 में बाकायदा डोपिंग पर नियम बनाए गए और साल 1966 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने एक मेडिकल काउंसिल की स्थापना कर उसे डोप टेस्ट का जिम्मा सौंपा। साल 1968 में डोप टेस्ट को अमल में लाने की कोशिश हुई लेकिन तब यह मुश्किल सामने आई कि आखिर इन डोप एलिमेंट की पहचान कैसे की जाए क्योंकि खिलाड़ी नए नए हथकंडे अपनाकर दवाओं का सेवन करते थे। साल 1974 आते आते खिलाड़ी के लिए प्रतिबंधित दवाओं की एक पूरी लंबी सूची तैयार की जा चुकी थी, जिसका सेवन खिलाड़ी नहीं कर सकते थे। साल 1988 के सियोल ओलंपिक में पहली बार धावक बेन जॉनसन को प्रतिबंधित दवाओं के सेवन का दोषी पाया गया।

 

भारत में डोपिंग को लेकर खुलासा:

भारत में डोपिंग को लेकर पहला बड़ा खुलासा साल 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में हुआ। भारतीय धावक कृपाल सिंह दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में 10 हजार मीटर की दौड़ में भाग रहे थे, दौड़ के दौरान उनके मुंह से अचानक झाग निकलने लगा और वो बेहोश हो गए, जांच में मालूम चला कि उन्होंने दौड़ जीतने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन कर रखा था। इसके बाद भारत की तरफ से कई मामले सामने आए।

पांच श्रेणियों में होती है डोपिंग दवाएं:    

स्टेरॉयड

पेप्टाइड हार्मोन

नार्कोटिक्स

डाइयूरेटिक्स

ब्लड डोपिंग

क्या है वाडा-नाडा और डोप की सजा:

किसी भी खिलाड़ी का डोप टेस्ट विश्व डोपिंग विरोधी संस्था (वाडा) और राष्ट्रीय डोपिंग विरोधी एजेंसी (नाडा) ले सकती है। वाडा की स्थापना 10 नवंबर 1999 को स्विटजरलैंड के लुसेन शहर में हुई थी। इसी के बाद लगभग हर देश ने जांच के लए नाडा की स्थापना कर रखी है। अगर आप प्रतिबंधित दवाओं का सेवन करते पाए जाते हैं तो आप पर दो साल से लेकर आजीवन प्रतिबंध लगाए जाने का प्रावधान है।

आखिर कैसे होता है डोप टेस्ट:

किसी भी खिलाड़ी का डोप टेस्ट लेने के लिए आपको संबंधित देश के फेडरेशन से इजाजत लेनी होती है। किसी स्तरीय प्रतियोगिता से पहले डोप टेस्ट किए जाते है जो या तो वाडा करती है या फिर नाडा। टेस्ट के लिए खिलाड़ियों के मूत्र को वाडा या नाडा की लेबोरेट्री (प्रयोगशाला) में पहुंचाया जाता है। नाडा की लेबोरेट्री दिल्ली में है।

दो बार होता है टेस्ट ए और बी:

‘ए’ टेस्ट में पॉजिटिव आने पर खिलाड़ी पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। हालांकि कोई खिलाड़ी अगर मानता है कि इसमे कुछ गलत है तो वो वह एंटी डोपिंग पैनल में बी टेस्ट के लिए अपील कर सकता है। इसके बाद फिर से खिलाड़ी के मूत्र की जांच की जाती है। अगर ‘बी’ टेस्ट भी पॉजिटिव आता है तो खिलाड़ी पर अनुसाशन पैनल प्रतिबंध लगा देता है।

डोपिंग में फंसे भारतीय खिलाड़ी:

सीमा पुनिया (डिस्क थ्रोअर) 2006 एशियन गेम

सौरभ विज (शार्ट पुटर) साल 2010 कॉमनवेल्थ खेल

अश्विनी अकुंजी (स्प्रिंटिंग) साल 2011, दो साल का बैन

सीमा अंतिल (डिस्क थ्रोअर) साल 2000, चेतावनी

सिनी जोंस (स्प्रिंटिंग) साल 2011, दो साल का प्रतिबंध

मनदीप कौर (स्प्रिंटिंग) साल 2011, दो साल का प्रतिबंध

अनिल कुमार (डिस्क थ्रोअर) साल 2005, दो साल का प्रतिबंध

जाउना मुर्मु (स्प्रिंटिंग) साल 2011, दो साल का प्रतिबंध