प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर में पुलिस की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए उत्तर प्रदेश के DGP को स्वतंत्र और गोपनीय जांच के आदेश दिए हैं। मामला एक ऐसी महिंद्रा XUV से जुड़ा है, जिसे आबकारी मामले में पुलिस ने जब्त किया था। आरोप है कि यह गाड़ी पुलिस थाने से निकालकर एक वॉन्टेड आरोपी को पकड़ने के लिए की गई रेड में इस्तेमाल हुई और 3 दिन बाद मथुरा में इसका एक्सीडेंट हो गया। हादसे में एक महिला की मौत हो गई थी। हाईकोर्ट ने DGP को 8 हफ्ते के भीतर जांच पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ सिर्फ सर्विस रिकॉर्ड में ‘सेंसर एंट्री’ करके विभागीय कार्रवाई क्यों बंद कर दी गई।
शराब मिलने के बाद जब्त हुई थी SUV
मामला 16 अप्रैल 2021 का है। बुलंदशहर के रामघाट थाने की पुलिस ने SUV को जब्त किया था। पुलिस के मुताबिक, गाड़ी से अवैध शराब के 19 कार्टन मिले थे। इसके बाद SUV को जब्त करने की कार्रवाई चल रही थी। इसी बीच 4 जून 2021 को गाड़ी को थाने से बाहर ले जाया गया। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन हेड मोहर्रिर सीताराम ने कांस्टेबल पंकज राणा और नरेंद्र सिंह के साथ मिलकर इसे एक वॉन्टेड आरोपी को पकड़ने के लिए की गई रेड में इस्तेमाल किया। बताया गया कि यह काम तत्कालीन SHO बीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना हुआ।
3 दिन बाद मथुरा में हुआ हादसा
SUV को थाने से निकालने के सिर्फ 3 दिन बाद, 7 जून 2021 को मथुरा के राया इलाके में उसका एक्सीडेंट हो गया। हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में मनोज कुमार की मां की मौत हो गई। इसके बाद मथुरा पुलिस ने मामले में FIR दर्ज की और SUV को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। जब हाईकोर्ट ने पूछा कि इस मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, तो सामने आया कि तत्कालीन बुलंदशहर SSP ने विभागीय कार्यवाही बंद करते हुए हेड मोहर्रिर सीताराम और दोनों कांस्टेबलों को सिर्फ ‘सेंसर एंट्री’ दी थी।
अदालत ने जताई कड़ी आपत्ति
हाईकोर्ट ने ‘सेंसर एंट्री’ की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई। जस्टिस अनिल कुमार ने 22 सितंबर के आदेश में कहा कि मामले की गंभीरता, गाड़ी के बिना अनुमति इस्तेमाल किए जाने के परिणाम और संभावित आपराधिक जिम्मेदारी पर विचार किए बिना केवल सेंसर एंट्री देना प्रथम दृष्टया पूरी तरह अपर्याप्त लगता है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला महज सामान्य प्रक्रियागत गलती का नहीं है। इसमें जब्त वाहन को बिना अनुमति थाने से निकालना और इस्तेमाल करना, उसकी सुरक्षित हिरासत की जिम्मेदारी का उल्लंघन और ऐसा आचरण शामिल है, जिसके बाद वाहन एक जानलेवा हादसे में शामिल हुआ।
SHO और SSP की भूमिका जांची जाएगी
कोर्ट ने DGP से यह भी जांचने को कहा है कि पुलिसकर्मियों का कथित आचरण चोरी, आपराधिक गबन या आपराधिक विश्वासघात जैसे अपराधों के दायरे में आता है या नहीं। हालांकि, कोर्ट ने इस चरण पर किसी पुलिसकर्मी की आपराधिक जिम्मेदारी को अंतिम रूप से तय नहीं किया है। जांच का उद्देश्य तथ्यों की पड़ताल और कानून के मुताबिक जिम्मेदारी तय करना है। DGP की जांच में तत्कालीन SHO बीरेंद्र सिंह की निगरानी से जुड़ी भूमिका और तत्कालीन बुलंदशहर SSP की भी भूमिका देखी जाएगी। जांच में यह भी देखा जाएगा कि पहले हुई विभागीय कार्रवाई निष्पक्ष और पर्याप्त थी या नहीं।
वाहन मालिक की याचिका हुई खारिज
वहीं, कोर्ट ने वाहन मालिक की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी SUV को जब्त किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने माना कि वाहन की जब्ती का आदेश अपने आप में कानूनी खामी से ग्रस्त नहीं था, लेकिन पुलिस अधिकारियों द्वारा जब्त वाहन को संभालने के तरीके में गंभीर प्रशासनिक चूक दिखाई देती है। कोर्ट ने कहा कि अगर जब्त वाहनों को बिना कानूनी अधिकार पुलिस हिरासत से निकालकर इस्तेमाल करने दिया जाए और बाद में ऐसे मामलों में केवल मामूली विभागीय सजा दी जाए, तो इससे आपराधिक न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
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