लखनऊः यूपी के गोंडा में बर्तन व्यापारी विनोद साहनी की हत्या से प्रदेश में पिछड़ों की सियासत गरमा गई है। विनोद साहनी पिछड़ो में निषाद जाति के थे। विनोद की मौत के बाद लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज की मोर्चरी के बाहर ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसमें विपक्ष के साथ-साथ सरकार के कैबिनेट मंत्री भी धरने पर बैठे नज़र आए। एक तरफ समाजवादी पार्टी और वीआईपी पार्टी के कार्यकर्ता सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे थे तो बगल में सरकार में मंत्री संजय निषाद भी धरने पर बैठे थे। संजय निषाद तो आज यानी शुक्रवार गोंडा में भी धरने पर बैठे।
16 जिलों में 100 सीटों पर निषाद वोट निर्णायक
विनोद साहनी की हत्या के बाद संजय निषाद के इस तरह मुखर होने को निषाद वोट की सियासत से जोड़कर देखा जा रहा है। यूपी में करीब चार फीसदी निषाद वोट है। गंगा नदी के किनारे करीब 16 ज़िलों में निषाद वोट है और करीब सौ विधान सभा सीट पर निषाद वोट का असर है। गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, मिर्ज़ापुर, प्रयागराज, वाराणसी में निषाद वोट ज़्यादा है।
अपना वोट बैंक बचाने मैदान में उतरे संजय निषाद
यूपी में 2027 में विधान सभा चुनाव है। ऐसे में निषाद समाज के विनोद की हत्या से संजय निषाद को चुनाव में नुकसान हो सकता है, खासतौर पर तब जब हत्या का आरोप सवर्णों पर लगा है। संजय निषाद ने साल 2016 में निषाद पार्टी बनाई थी। निषाद पार्टी ने 2017 का विधान सभा चुनाव पीस पार्टी के साथ मिलकर लड़ा। पार्टी ने 72 उम्मीदवार उतारे और एक सीट पर जीत हासिल की। समाजवादी पार्टी ने 2018 में गोरखपुर में हुए उपचुनाव में निषाद पार्टी से संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को टिकट दिया और प्रवीण निषाद ने बीजेपी से सीट छीन ली लेकिन संजय निषाद ने 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया और अब सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
निषाद समुदाय को मैसेज देने में जुटी सपा
उधर अखिलेश यादव के पीडीए फार्मूले में डी से पिछड़े हैं। समाजवादी पार्टी की कोशिश है कि वो निषादों को संदेश दे कि पार्टी निषादों के खिलाफ अन्याय नहीं होने देगी। अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएगी। यही वजह है कि कल लखनऊ में समाजवादी पार्टी पिछड़ा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राजपाल कश्यप धरने पर बैठे और आज भी गोंडा में विनोद के परिवार के साथ रहे।
पिछले चुनाव में एनडीए के साथ थे निषाद
एक सर्वे के मुताबिक 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 63 फीसदी निषादों ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को वोट दिया था और 22 फीसदी निषादों ने सपा और उसके सहयोगी दलों को वोट किया था। बीजेपी के लिए अपने पुराने निषाद वोट को अपने साथ रखने की बड़ी चुनौती है, जबकि लोकसभा चुनाव में बड़ी कामयाबी के बाद सपा के कोशिश निषाद वोट में सेंध लगाने की है।
मान्यता है कि राम जब वनवास जा रहे थे तो प्रयागराज के पास श्रृंगवेरपुर में राम की मुलाकात निषादराज से हुई और यहां केवट ने राम को गंगा पार कराई थी। अब देखना होगा कि 2027 के विधान सभा चुनाव में निषाद किसका साथ देता है। किस की नैया पार कराने में मदद करता है।
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