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कैराना में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में होगी कड़ी टक्कर! समझिए कैसे पिछले 3 दशकों से दो सियासी परिवारों में घूम रही सीट

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले वेस्टर्न उत्तर प्रदेश की कैराना विधानसभा सीट सियासी चर्चाओं के केंद्र में है। आइए जानते हैं कि कैसे पिछले 3 दशकों में Kairana सीट और वहां की जनता ने दो सियासी परिवारों का दबदबा देखा है।

उत्तर प्रदेश की हॉट विधानसभा सीटों में कैराना भी शुमार है। कैराना, वह सीट है, जहां बीते 3 दशक से मुनव्वर हसन और हुकुम सिंह के सियासी परिवारों का दबदबा है। कभी हुकुम सिंह लगातार 4 बार कैराना के विधायक बने तो अब नाहिद हसन पिछले तीन चुनाव कैराना में जीत रहे हैं। आखिर कैराना की सियासत कैसे बदली और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में यहां किस पार्टी का पलड़ा भारी पड़ सकता है? आइए कैराना के चुनावी इतिहास और सामाजिक समीकरण से समझते हैं।

कैराना में दांव पर रही है दो सियासी परिवारों की साख

बता दें कि कैराना, शामली जिले की सामान्य विधानसभा सीट है। इसका निर्वाचन क्षेत्र का नंबर 8 है। कैराना की सियासत पिछले 3 दशक में प्रमुख तौर पर 2 राजनीतिक परिवारों- मुनव्वर हसन और हुकुम सिंह की फैमिली के प्रभाव के लिए भी जानी जाती है। हुकुम सिंह, कैराना से 7 बार विधायक रहे, जबकि मुनव्वर हसन ने साल 1991 और 1993 में कैराना से जीत हासिल की। बाद में मुनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन ने कैराना सीट पर अपनी पकड़ बनाई।

पहले मुनव्वर लगातार दो बार और फिर हुकुम सिंह 4 बार बने विधायक

1991 और 1993 की चुनाव की बात करें तो तब मुनव्वर हसन ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था और हुकुम सिंह को मात दी थी। लेकिन फिर 1996 में कैराना की सियासी तस्वीर बदली और BJP कैंडिडेट हुकुम सिंह ने सपा के बाबू सिंह को 13 हजार 443 वोट से पटखनी दे दी। इसके बाद, 2002 और 2007 में भी हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की। फिर, 2012 में भी हुकुम सिंह ने BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा और BSP के प्रत्याशी अनवर हसन को 19 हजार 543 वोट से हराकर लगातार चौथी बार कैराना विधानसभा सीट जीत ली।

1991 से 2022 तक किस-किसने जीती कैराना विधानसभा सीट?

वर्ष विजेता पार्टी विजेता वोट रनर-अप पार्टी रनर-अप वोट अंतर
1991 मुनव्वर हसन जनता दल 48,224 हुकुम सिंह कांग्रेस 31,660 16,564
1993 मुनव्वर हसन जनता दल 51,888 हुकुम सिंह कांग्रेस 43,980 7,908
1996 हुकुम सिंह BJP 81,658 बाबू सिंह SP 68,215 13,443
2002 हुकुम सिंह BJP 72,782 राजेश्वर कुमार SP 62,299 10,483
2007 हुकुम सिंह BJP 53,483 अरशद RLD 44,983 8,500
2012 हुकुम सिंह BJP 80,293 अनवर हसन BSP 60,750 19,543
2017 नाहिद हसन SP 98,830 मृगांका सिंह BJP 77,668 21,162
2022 नाहिद हसन SP 1,31,035 मृगांका सिंह BJP 1,05,148 25,887

(सोर्स- Election Commission Of India)

2014 के उपचुनाव से बदली कैराना की सियासत

गौरतलब है कि 2014 में हुकुम सिंह कैराना लोकसभा सीट से सांसद बन गए थे, जिसकी वजह से कैराना विधानसभा सीट खाली हुई। तब अक्टूबर, 2014 में उपचुनाव हुआ था और SP ने मुनव्वर हसन के बेटे नाहिद हसन को चुनावी मैदान में उतारा था। इस उपचुनाव में नाहिद हसन ने BJP के अनिल चौहान को बेहद करीबी मुकाबले में हरा दिया था। नाहिद को 83  हजार 984 और अनिल चौहान को 82 हजार 885 वोट मिले था। जीत का अंतर सिर्फ 1 हजार 99 वोटों का रहा था।

बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ कैराना उपचुनाव

यही उपचुनाव कैराना के सियासी इतिहास का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। क्योंकि अगले ही विधानसभा चुनाव यानी 2017 में नाहिद हसन ने सपा के टिकट पर 98 हजार 830 वोट पाए थे, जबकि BJP की हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह, 77 हजार 668 वोट पाकर हार गईं। इनमें जीत का अंतर 21 हजार 162 वोटों का रहा था। ECI के मुताबिक, नाहिद हसन का वोट प्रतिशत 47.50 और मृगांका सिंह का वोट शेयर 37.33 फीसदी रहा था।

2022 में बढ़ गया नाहिद हसन की जीत का अंतर

वहीं, 2022 में कैराना का विधानसभा चुनाव और ज्यादा सीधी टक्कर का था। ECI के ऑफिशियल आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के चुनाव में सपा प्रत्याशी नाहिद हसन को 1 लाख 31 हजार 35 वोट यानी 54.16 फीसदी, जबकि मृगांका सिंह को 1 लाख 5 हजार 148 वोट यानी 43.46 प्रतिशत मिले थे। नाहिद हसन, 25 हजार 887 वोटों से जीत गए थे। दिलचस्प ये रहा था कि 2022 में नाहिद की जीत का अंतर 2017 के चुनाव के मुकाबले करीब 4 हजार बढ़ गया था।

कैराना का सामाजिक समीकरण

कैराना के सामाजिक समीकरण की बात करें तो यहां की सियासत में मुस्लिम, जाट, गुर्जर, दलित, कश्यप, ब्राह्मण, सैनी, ठाकुर और अन्य OBC जातियों को महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में 2027 में कैराना की सियासत में पार्टियों की तरफ से कैंडिडेट के चयन, नाहिद हसन और मृगांका सिंह के परिवारों के प्रभाव और सामाजिक गठजोड़ सबसे अहम कारक हो सकते हैं, लेकिन कैराना का इतिहास किसी एक पार्टी की अगली जीत की गारंटी नहीं देता है।