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TMC में संभावित विभाजन पर जल्दबाजी नहीं, दोनों गुटों को सुनने के बाद फैसला लेंगे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला

बंगाल में चुनावी परिणाम आने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में फूट पड़ गई है। तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई सांसदों ने अलग बैठने की व्यवस्था की मांग करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपा है।

टीएमसी के बागी सांसदों के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला- India TV Hindi
Image Source : PTI टीएमसी के बागी सांसदों के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला टीएमसी के बागी सांसदों के मामले में दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद ही कोई फैसला लेंगे। स्पीकर के ऑफिस ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC सांसदों के ग्रुप को ईमेल भी भेजा है। इन सांसदों को लोकसभा स्पीकर के साथ मीटिंग के लिए बुलाया गया है। 

ममता गुट के सांसदों से मिलने के बाद लिया जाएगा फैसला

सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद ही स्पीकर बागी गुट से जुड़ा कोई फैसला लेंगे। खास बात यह है कि सूत्रों के अनुसार, TMC के बागी गुट के 20 सांसदों ने स्पीकर से मुलाकात की थी। एक पत्र सौंपकर अपने गुट का NCPI में विलय करने का अनुरोध किया था।

ममता गुट से भी इस मामले में मांगा पक्ष

सूत्रों के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ई-मेल भेजकर इस मामले में उसका पक्ष भी मांगा है। इससे पहले संसद से जुड़े सूत्रों ने बताया था कि लोकसभा अध्यक्ष, अलग हुए सांसदों की, अपेक्षाकृत कम चर्चित राजनीतिक दल 'नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में विलय के बाद अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग पर कानूनी राय ले सकते हैं। 

मानसून सत्र से पहले लिया जाएगा फैसला

सूत्रों ने कहा कि इस मांग पर कोई भी निर्णय संसद के मानसून सत्र से पहले लिया जाएगा, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। उन्होंने बताया कि अलग हुए गुट को मान्यता दी जाए या नहीं, इस पर निर्णय केंद्रीय विधि मंत्रालय की लिखित राय के आधार पर लिया जाएगा। 

मंत्रालय लेगा कानूनी राय

मंत्रालय किसी सीनियर कानूनी अधिकारी से परामर्श के बाद अपनी राय देगा। सूत्रों के अनुसार, कानूनी राय इसलिए ली जाएगी ताकि लोकसभा अध्यक्ष का फैसला, यदि अदालत में चुनौती दी जाती है, तो न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरा उतर सके। लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी.डी.टी. आचारी ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 का हवाला देते हुए कहा कि केवल कोई राजनीतिक दल ही दूसरे राजनीतिक दल में विलय कर सकता है, सांसद या विधायक नहीं। 

जानिए क्या बोले संविधान विशेषज्ञ 

आचारी ने पीटीआई से बात करते हुए कहा, 'यदि किसी राजनीतिक दल का नेतृत्व दूसरे दल में विलय का निर्णय करता है, तो उसके सांसदों और विधायकों को उस विलय से सहमत होना पड़ता है। लेकिन केवल सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय नहीं कर सकते। यही संवैधानिक प्रावधान है।' 

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