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23 साल बाद बुढ़ापे में मिली रिहाई, खुद को निर्दोष साबित करने में गंवाई जवानी

बिहार के बगहा से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने देश की न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल खुद को निर्दोष साबित करने के चक्कर में 4 युवकों ने अपनी जवानी बिता दी और 23 साल बाद जाकर उन्हें इंसाफ मिला। चलिए जानते हैं क्या है पूरा मामला।

23 साल बाद बुढ़ापे में मिली रिहाई, खुद को निर्दोष साबित करने में गंवाई जवानी- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV 23 साल बाद बुढ़ापे में मिली रिहाई, खुद को निर्दोष साबित करने में गंवाई जवानी

न्याय मिलने में देरी कई बार खुद में एक अन्याय बन जाती है। बिहार के बगहा से सामने आई यह घटना भारतीय न्यायिक व्यवस्था की इसी धीमी रफ्तार की एक दर्दनाक तस्वीर पेश करती है। 4 व्यक्ति को अदालत ने निर्दोष करार देकर बरी तो कर दिया, लेकिन इस फैसले को आने में पूरे 23 साल लग गए। एक मामले में नामजद होने के बाद करीब 23 वर्षों तक न्यायालय में खुद को निर्दोष साबित करने की लड़ाई लड़ते रहे चार अभियुक्तों को आखिरकार अदालत से राहत मिल गई। लंबे इंतजार के बाद जब जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ मानवेन्द्र मिश्र की अदालत ने सभी चार अभियुक्तों धूरई चौधरी, रामाशीष चौधरी, रामप्रीत चौधरी और बुधराम चौधरी को संदेह का लाभ देते हुए रिहा करने का आदेश सुनाया तो उनकी आंखें छलक उठीं। उम्र के उस पड़ाव पर मिली रिहाई ने उनके लिए खुशी के साथ बीते वर्षों की पीड़ा को भी ताजा कर दिया।

कहां का मामला
मामला रामनगर थाना क्षेत्र के खजूरिया गांव से जुड़ा है। कांड संख्या 143/03 में अदालत में सुनवाई चल रही थी। अपर लोक अभियोजक जितेंद्र भारती ने बताया कि घटना आठ अगस्त 2003 की है। भगवान चौधरी ने रामनगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट कर उन्हें जख्मी किया गया। मामले में पुलिस ने कुल छह लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया था।

मामले की सुनवाई शुरू होने के बाद न्याय की आस में सभी अभियुक्तों को लंबे समय तक अदालत की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। इस दौरान मुकदमे के छह नामजद अभियुक्तों में से दो अभियुक्त अजय और गोबिंद की मौत हो गई। दोनों की मौत मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही हो गई। वहीं, बचे चार अभियुक्तों को अदालत के समक्ष चली सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अंततः संदेह का लाभ मिला।

अदालत ने किया रिहा

अदालत ने चारों अभियुक्तों को रिहा करने का आदेश दिया। फैसला सुनाए जाने के बाद न्यायालय परिसर में मौजूद अभियुक्तों और उनके परिजन भावुक हो गए। वर्षों तक मुकदमे का बोझ उठाने वाले अभियुक्तों के चेहरे पर राहत साफ दिखाई दे रही थी। वहीं परिजनों का कहना था कि जिस उम्र में परिवार और समाज के बीच सुकून से जीवन बिताना चाहिए था, उस उम्र का बड़ा हिस्सा अदालत और मुकदमे की चिंता में गुजर गया। दो नामजद अभियुक्त तो फैसला सुनने के लिए इस दुनिया में भी नहीं रहे। ऐसे में 23 साल बाद आया यह फैसला उनके परिवार के लिए भी भावुक कर देने वाला रहा। अदालत के आदेश के साथ ही करीब ढाई दशक से चले आ रहे इस मामले का पटाक्षेप हो गया। चारों अभियुक्तों को संदेह का लाभ मिलने के बाद उनके चेहरे पर वर्षों बाद राहत और संतोष नजर आया।

(रिपोर्ट - अमित कुमार)