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The Revolutionaries Review: त्याग-देश प्रेम से भरपूर है 'द रिवोल्यूशनरीज', क्रांतिकारी जीवन के हर पहलू को दिखाती सीरीज
निखिल आडवाणी की 'द रिवोल्यूशनरीज' प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है। भुवन बाम, रोहित सराफ, प्रतिभा रांटा और गुरफतेह पीरजादा अपनी दमदार अदाकारी से दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने में सफल रहे।
निखिल आडवाणी की 'द रिवोल्यूशनरीज' प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है। इस सीरीज में भारत के उन बहादुर युवाओं की कहानी को दिखाया गया है, जो देश की आजादी के लिए सब कुछ कुर्बान करते हुए ब्रिटिश कोलोनियल रूल (औपनिवेशिक शासन) के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष करते हैं। भुवन बाम, रोहित सराफ, प्रतिभा रांटा और गुरफतेह पीरजादा ने इसमें अपने किरदारों को पूरी शिद्दत से निभाया है। यह सीरीज क्रांतिकारियों के साहस, संघर्ष और देश की आजादी के लिए उनके अटूट संकल्प को पर्दे पर उतारती है। आजादी की लड़ाई के साथ-साथ यह सीरीज यह भी दिखाती है कि उनकी क्रांतिकारी यात्रा का उनकी निजी जिंदगी और प्रेम कहानियों पर क्या असर पड़ता है। उनका त्याग और भावनात्मक संघर्ष कहानी में गहराई लाते हैं, जिससे सीरीज और भी दिलचस्प बन जाती है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने वाले चार युवा क्रांतिकारियों के बलिदान की कहानी आपको अंत तक स्क्रीन से बांधे रखेगी।
'द रिवोल्यूशनरीज' की कहानी
'द रिवोल्यूशनरीज' सीरीज संजीव सान्याल की बेस्टसेलिंग नॉन-फिक्शन किताब 'रिवोल्यूशनरीज: द अदर स्टोरी ऑफ हाउ इंडिया वॉन इट्स फ्रीडम' से प्रेरित है। इसमें क्रांतिकारियों की कहानी है, जिन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने के लिए हथियार उठाने का रास्ता चुना। इसमें युवा भारतीयों के एक ऐसे समूह को दिखाया गया है, जो ब्रिटिश शासन को मानने से इनकार कर देते हैं। कहानी में दिखाया गया है कि उनका मानना है कि लोगों को जगाने और उन्हें आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित करने के लिए सशस्त्र क्रांति जरूरी है। इसके लिए वे गुप्त तरीके से नेटवर्क बनाते हैं, अंग्रेजों पर हमले की योजना तैयार करते हैं और ब्रिटिश राज के खिलाफ बड़े विद्रोह की तैयारी करते हैं। कहानी की शुरुआत रास बिहारी बोस (भुवन बाम) से होती है, जो आजादी की इस लड़ाई में बाद में होने वाले पति-पत्नी सचिन्द्र नाथ सन्याल उर्फ संचिन (रोहित सराफ) और प्रतिभा लाहिड़ी (प्रतिभा रांटा) से मिलता है। संचिन और प्रतिभा इस लड़ाई में अंत तक उनके साथ रहते थे। वहीं आजादी की इस लड़ाई में बाघा जतिन (गुरफतेह पीरजादा) की मौत हो जाती है, लेकिन कहानी यही खत्म नहीं होती है। जी हां, 8 एपिसोड की इस सीरीज में आपको कई ऐसे सीन देखने को मिलेंगे, जो भले ही बेहद आम लगते हैं, लेकिन कहानी के हिसाब से बिल्कुल सटीक बैठते हैं। राजनीतिक संघर्ष और एक्शन के साथ-साथ सीरीज की कहानी इन स्वतंत्रता सेनानियों के निजी संघर्षों को भी दिखाती है। इसमें उनकी दोस्ती, धोखे, मुश्किल फैसले, त्याग और आजादी पाने के पक्के इरादे को दिखाया गया है।
'द रिवोल्यूशनरीज' के एक्टर्स की परफॉर्मेंस
'द रेवोल्यूशनरीज' की सबसे मजबूत चीजों में से एक इसकी कास्ट है। भुवन बाम, रोहित सराफ, प्रतिभा रांटा और गुरफतेह पीरजादा अपने-अपने किरदारों में पूरी तरह फिट बैठते हैं और कहानी में अलग-अलग रंग भरते हैं। यह सीरीज उन क्रांतिकारियों पर फोकस करती है, जिनके बारे में कम लोग जानते हैं और एक्टर्स ने अपने किरदारों को दिलचस्प और असली जैसा बनाया है।
भुवन बाम ने रास बिहारी बोस के तौर पर जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है। वे अपनी जानी-पहचानी कॉमिक इमेज से हटकर किरदार का एक ज्यादा मैच्योर पहलू सामने लाते हैं। बोस के निडर स्वभाव, पक्के इरादे और मुश्किल हालात में भी शांत रहने की उनकी काबिलियत को उन्होंने बहुत अच्छे से दिखाया है। एक्टर ने किरदार में एक रहस्य भी बनाए रखा है, जो भेष बदलने में माहिर बोस के रोल के लिए बिल्कुल सही है। उनका लुक बहुत अच्छे से पेश किया गया है, जो दर्शकों को बहुत पसंद आने वाला है।
रोहित सराफ ने सचिन्द्र नाथ सन्याल उर्फ संचिन के तौर पर अच्छा काम किया है। उन्होंने किरदार की मासूमियत और उसके क्रांतिकारी विचारों के बीच अच्छा तालमेल बिठाया है। उनके इमोशनल और फिजिकल बदलाव से रोल में अलग ही गहराई देखने को मिली। खासकर उन सीन में, जहां सान्याल को मुश्किल फैसले लेने पड़ते हैं।
प्रतिभा रांटा ने अपने रोल में मजबूती और संवेदनशीलता दिखाई है। उन्होंने प्रतिभा लाहिड़ी को एक ऐसी युवा महिला के तौर पर दिखाया है, जो पुरुषों के दबदबे वाले क्रांतिकारी आंदोलन में अपनी आवाज उठाने की कोशिश कर रही है। उनकी एक्टिंग बहुत ज्यादा ड्रामैटिक होने के बजाय कहानी से जुड़ी हुई लगी।
गुरफतेह पीरजादा क्रांतिकारी दादा बाघा जतिन के रोल में बिल्कुल सही लगते हैं, खासकर एक्शन वाले हिस्सों में। वे इस किरदार में एक शांत मजबूती और दबा हुआ गुस्सा दिखाते हैं। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी क्रांतिकारी सीन को और गंभीर बना देती है। हालांकि, उनके किरदार को बीच में खत्म कर देना कहानी का एक कमजोर हिस्सा लगता है। अगर वह अंत तक नजर आते तो कहानी और बेहतर हो सकती थी।
जेसन शाह ने जनरल डायर के रोल में एक क्रूर विलेन और बेरहम ब्रिटिश डायर बन कम स्क्रीन स्पेश में भी अच्छा काम किया है। उनकी एक्टिंग युवा क्रांतिकारियों के सामने एक मजबूत विरोधी की छाप छोड़ती है। उनका किरदार ब्रिटिश पक्ष को एक दमदार विलेन देता है, जो कहानी में तनाव बनाए रखता है।
कुल मिलाकर एक्टिंग इतनी अच्छी है कि किरदार पूरी सीरीज में दिलचस्प बने रहते हैं। मुख्य कलाकार एक-दूसरे के साथ अच्छा तालमेल बिठाते हैं और हर कोई क्रांतिकारी ग्रुप में अपनी अलग पर्सनैलिटी लेकर आता है। हालांकि, बाघा जतिन के किरदार की मौत का सीन कहानी का एक कमजोर हिस्सा लगता है।
सपोर्टिंग कास्ट की बात करें तो एड रॉबिन्सन ने कलकत्ता के ब्रिटिश पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट का किरदार निभाया है। उनके किरदार को समझने में थोड़ा समय लग सकता है, क्योंकि कहानी में उनकी एंट्री अचानक होती है और उन्हें कहानी से जुड़ने में वक्त लगता है। पाओली दाम ने पिशिमा के रोल में अच्छा काम किया है, लेकिन कभी-कभी उनका रोल बेवजह लंबा लगता है। अबानी सान्याल के रोल में टोटा रॉय चौधरी को भी कम स्क्रीन टाइम मिला है, लेकिन उनका किरदार असरदार है और कहानी में अच्छी तरह फिट बैठता है।
'द रिवोल्यूशनरीज' का निर्देशन
निखिल आडवाणी ने ऐतिहासिक माहौल को बड़े पैमाने और भावनाओं के साथ बखूबी पेश किया है। उनके निर्देशन में युवा क्रांतिकारियों के संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प को असरदार ढंग से दिखाया गया है। हालांकि, कुछ सीन खींचे हुए लगते हैं, जब कहानी कहने के तरीके को और बेहतर किया जा सकता था। जैसे बाघा जतिन की मौत और रास बिहारी बोस का बनारस से कोलकाता आने के पहले का प्लान, जो बिना मतलब में खींचा था। कुछ हिस्सों में कहानी थोड़ी रिपिटिटिव लगने लगती है। खासकर सचिन्द्र नाथ सन्याल और प्रतिभा लाहिड़ी की प्रेम कहानी को लेकर, जिसे दर्शकों के सामने बार-बार रहस्य की तरह पेश किया जाता है, जबकि उनकी कहानी पहले से ही सामने है। बाद में उनके लव लेटर का आजादी की लड़ाई के बीच बेवजह जिक्र भी कहानी को थोड़ा खींचा हुआ महसूस कराता है। ऐसे में कुछ सीन्स को हटाकर या छोटा करके इस सीरीज की कहानी को 7 एपिसोड में ही पूरा कर सकते थे और कहानी के मुख्य उद्देश्य पर पूरा फोकस बी बना रहता।
'द रिवोल्यूशनरीज' का म्यूजिक
'द रिवोल्यूशनरीज' का म्यूजिक सिर्फ पारंपरिक देशभक्ति स्टाइल वाले संगीत पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय एल्बम में युद्ध, देशभक्ति, रोमांस, भक्ति और बलिदान जैसे विषय पर भी गाने हैं। 'और आएंगे', 'माहिया', 'जय दुर्गा', 'एकला चलो रे', 'पगड़ी संभाल जट्टा' और 'एक ओंकार' जैसे गाने कहानी में अलग-अलग मूड जोड़ते हैं। फिल्म के लिए आकाशदीप सेनगुप्ता, श्रेयस पुराणिक, आशुतोष फाटक और मनन भारद्वाज जैसे कई संगीतकार ने गाना गाया है। सुखविंदर सिंह और लोक गायक रंजीत बावा की आवाज का मेल साउंडट्रैक को और शानदार बनाता है। 'द रिवोल्यूशनरीज' के म्यूजिक की सबसे बड़ी खूबी है। इसमें हर गाने को एक आम देशभक्ति गीत जैसा नहीं बनाया गया है।
'द रिवोल्यूशनरीज' की एडिटिंग में कहां रह गई कमी
'द रिवोल्यूशनरीज' में उस दौर की दुनिया को अच्छे से दिखाया गया है। इसका प्रोडक्शन डिजाइन, कॉस्ट्यूम, सेट और सिनेमैटिक प्रस्तुति इसकी सबसे बड़ी खूबियां हैं। हालांकि, इसका विजुअल स्केल कभी-कभी उतना रियल नहीं लगता है, जो इस ऐतिहासिक ड्रामा को असली दिखाता है। जैसे हवाई जहाज वाला सीन, जब अंग्रेज क्रांतिकारियों को रोकने के लिए प्लेन पर ताबड़तोड़ गोली चलाते हैं और उसका अहम हिस्सा जलने लगाता है, लेकिन वह उड़ाती रहती है और बाद में सीन को एकदम से कट कर दूसरे सीन पर डाल दिया जाता है। इस सीन के दौरान एडिटिंग में कमी देखने को मिली।
'द रिवोल्यूशनरीज' की खूबियां और कमियां
यह सीरीज अपने विषय की वजह से खास है। इसमें की गई गहरी रिसर्च, शूटिंग लोकेशन और दमदार कास्ट इसे शानदार बनाती है। एक्शन सीन अच्छे से फिल्माए गए हैं। चारों क्रांतिकारियों के बीच दिल को छू लेने वाला प्यार दिखाया गया है। इसमें पॉलिटिक्स और अंग्रेज शासन के दौर को भी अच्छे से दिखाने की कोशिश की है।
'द रिवोल्यूशनरीज' की कमियों की बात करें तो कुछ जगहों पर बिना मतलब का ड्रामा देखने को मिलता है, जैसे संचिन और प्रतिभा की हर मुलाकात को नया दिखाना। कुछ इमोशनल सीन जरूरत से ज्यादा लंबे खिंच जाते हैं, जब रास बिहारी बोस यह कहते दिखाई देते हैं कि आजादी की जंग में प्यार, परिवार और घर का त्याग ही हमें अंदर से मजबूत बनाएगा और उसके दूसरे सीन में वह आजादी की जंग छोड़ बाघा जतिन और पिशिमा के लिए आंसू बहाते दिखाई देते हैं। कहानी में बाघा जतिन का किरदार थोड़ा लंबा होना चाहिए था, जो कहानी का अच्छा अंत बन सकता था। सीरीज की एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी। कुछ बातचीत में उन्हीं भावनाओं को दोहराया गया है, जो पहले ही दिखाई जा चुकी हैं। मौजूदा सब-प्लॉट को खींचने के बजाय कुछ सपोर्टिंग किरदारों को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता था।
'द रिवोल्यूशनरीज' क्यों देखें?
'द रिवोल्यूशनरीज' भारत की आजादी की लड़ाई को एक नए नजरिए से दिखाती है, इसलिए इसे जरूर देखना चाहिए। आजादी की लड़ाई के सिर्फ मशहूर नामों पर ध्यान देने के बजाय, यह सीरीज कम जाने-पहचाने क्रांतिकारियों की कहानियों को सामने लाती है। यह उन चार युवा आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की कहानी है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियार उठाने का रास्ता चुना और उनके साहस, त्याग, दोस्ती और पक्के इरादे को दिखाती है। किरदारों पर आधारित कहानी दर्शकों को क्रांतिकारी आंदोलन के पीछे के निजी संघर्षों और मुश्किल फैसलों को करीब से देखने का मौका देती है। अगर आपको ऐतिहासिक ड्रामा, देशभक्ति वाली कहानियां, एक्शन से भरपूर कहानियां और असल घटनाओं पर आधारित कहानियां पसंद हैं तो 'द रिवोल्यूशनरीज' वॉचलिस्ट में शामिल कर सकते हैं।
द रिवोल्यूशनरीज के लिए 3/5 स्टार।
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