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Explainer: मई-जून के बाद भी जारी रहेगी मौसम की मार, सूखे की चिंता जता रहे वैज्ञानिक, जानें क्या है कारण, कैसे बचें किसान?

भारत में भीषण गर्मी का कहर जून के तीसरे सप्ताह तक जारी रह सकता है। इसके बाद मानसून और प्री मानसून के कारण होने वाली बारिश गर्मी से राहत दिला सकती है, लेकिन अल नीनो का असर पूरे साल देखने को मिलेगा।

Heatwave- India TV Hindi
Image Source : PTI भारत में जारी मौसम का कहर

देश के अधिकतर हिस्सों में भीषण गर्मी का कहर जारी है। मध्य और उत्तर भारत के ऊपर हीट डोम बना हुआ है। इस वजह से गर्म हवाएं बाहर नहीं निकल पा रही हैं और सभी शहर जमकर तप रहे हैं। दुनियाभर के मौसम की जानकारी देने वाली वेबसाइट एक्यूआई के अनुसार विश्व के 100 सबसे गर्म शहरों में 86 भारत के शहर हैं। गर्मी के कारण बिजली की खपत बढ़ गई है और आने वाले दिनों में भी हालत बदलने की संभावनाएं बेहद कम हैं।

हीट डोम की स्थिति तभी बदलेगी, जब पश्चिमी विक्षोभ की हवाएं इसे कमजोर करें। मानसून के आगमन पर ही ऐसा होने की संभावना है। आईएमडी का अनुमान है कि अगले सप्ताह मानसून केरल में दस्तक दे सकता है। मानसून आने के साथ ही बारिश का दौर शुरू होगा और भीषण गर्मी से राहत मिलेगी। हालांकि, केरल से उत्तर भारत तक पहुंचने में मानसून 4-6 हफ्ते लगाता है। इस दौरान दिल्ली-यूपी समेत पूरे उत्तर भारत में गर्मी का कहर जारी रहेगा। 15-20 जून तक मानसून आधे से ज्यादा भारत को कवर कर लेगा। उत्तर भारत में भी प्री-मानसून की गतिविधियां शुरू हो सकती हैं। ऐसे में 20 जून के बाद ही यहां गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद है।

अल नीनो बनने की आशंका

अमेरिका की सरकारी साइंटिफिक और रेगुलेटरी एजेंसी (NOAA) के अनुसार इस साल अल नीनो के बनने की संभावना बेहद ज्यादा है। अभी सामान्य स्थिति बनी हुई है, लेकिन प्रशांत महासागर में पानी तेजी से गर्म हो रहा है। मई-जुलाई 2026 में अल नीनो बनने की संभावना 82%  है और यह दिसंबर 2026-फरवरी 2027 तक रह सकता है। इसकी संभावना 96% है। कोलंबिया की आईआरआई यूनिवर्सिटी का भी कहना है कि मई-जुलाई में अल नीनो बनने की संभावना 98% है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग भी मान रहा है कि मानसून सीजन (जून-सितंबर) के दौरान अल नीनो विकसित होने की संभावना है।

क्या है अल नीनो?

अल नीनो और ला नीना दो स्थितियां हैं, जो भारत में मानसून को प्रभावित करती हैं। जब प्रशांत महासागार का पानी ठंडा रहता है, जब ला नीना बनता है। इस दौरान भारत में सामान्य से ज्यादा बारिश होती है। कई जगहों पर बाढ़ भी आती है। पिछले साल इसका असर देखने को मिला था। अब अल नीनो बन रहा है। इसके कारण बारिश कम होती है। सुपर अल नीनो बनने पर कई जगहों पर सूखे का खतरा भी बन जाता है।

जारी रहेगी मौसम की मार

अल नीनो बनने पर बारिश कम होती है। 2016 में अल नीनो बनने पर देश में 14 फीसदी कम बारिश हुई थी। इस बार उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है। भारत में 50 फीसदी से ज्यादा खेती मानसून की बारिश पर निर्भर है। ऐसे में बारिश कम होने पर फसलों में रोग भी ज्यादा लगते हैं। सिंचाई कम होने से उपज भी घटती है। अल नीनो के कारण ठंड भी कम होती है। ठंड के मौसम में होनी वाली बारिश (मावठा) भी न के बराबर होती है। देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी अभी भी खेती से जुड़े काम में लगी हुई है। ऐसे में देश की आबादी बड़े पैमाने पर इससे प्रभावित होगी। पश्चिमी एशिया में जारी युद्ध से उपजे हालातों के बीच कमजोर मानसून बेहद चिंताजनक स्थिति पैदा करता है।

कैसे बचें किसान?

भारत में किसान बड़े पैमाने धान-गेहूं, गन्ने जैसी फसलों की खेती करते हैं। कमजोर मानसून में ऐसी फसलों की खेती की जा सकती है, जो कम समय में पक जाती हैं और पानी की खपत भी कम करती हैं। इसके साथ ही उन किस्मों का चयन करना जरूरी है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा हो। कम लागत की फसलें समझदारी भरा विकल्प हो सकती हैं। पश्चिमी एशिया में बने हालातों के कारण खाद की लागत भी बढ़ी है। हालांकि, सरकार बढ़ी हुई लागत का बोझ किसानों पर कभी नहीं डालती है, लेकिन पीएम ने खुद ऑर्गेनिक खेती की अपील की है। ऐसे में किसान अंधाधुंध खाद डालने की बजाय ज्यादा वैज्ञानिक तरीके अपना सकते हैं। ऑर्गेनिक खेती पर फोकस कर सकते हैं या फलों की खेती पर ध्यान दे सकते हैं, जिनमें मौसम का असर अपेक्षाकृत कम होता है।

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