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Explainer: धान के खेत क्यों बन रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग की फैक्ट्री? वैज्ञानिकों ने बताई टेंशन वाली बात

 Published : May 23, 2026 04:53 pm IST,  Updated : May 23, 2026 04:53 pm IST

नई वैज्ञानिक स्टडी में खुलासा हुआ है कि धान के खेत तेजी से मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी खतरनाक ग्रीनहाउस गैसें छोड़ रहे हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि पारंपरिक खेती के तरीके समस्या बढ़ा रहे हैं, जबकि क्लाइमेट-स्मार्ट तकनीकों से उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

धान की खेती पर...- India TV Hindi
धान की खेती पर वैज्ञानिकों की नई स्टडी ने तहलका मचा दिया है। Image Source : PEXELS

Rice Farming Climate Change: चावल दुनिया के सबसे जरूरी खाद्य पदार्थों में से एक है। भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत दुनिया के कई देशों में करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी चावल पर टिकी हुई है। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी किसी न किसी रूप में चावल खाती है। लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी ने चिंता बढ़ा दी है। जिस धान की खेती से अरबों लोगों का पेट भरता है, वही खेती अब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को तेजी से बढ़ाने वाली बड़ी वजह बनती जा रही है।

धान की खेती पर क्या बोल रहे हैं वैज्ञानिक?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, धान के खेतों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें लगातार बढ़ रही हैं। 1960 के दशक के मुकाबले अब इन उत्सर्जनों में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हो चुकी है। 2010 के दशक में हर साल औसतन करीब 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर गैसें धान के खेतों से निकलीं। यह मात्रा लगभग 23.9 करोड़ कारों के साल भर के प्रदूषण के बराबर मानी गई है। अब पशुपालन के बाद धान की खेती कृषि क्षेत्र में प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है।

आखिर धान की खेती से कैसे बढ़ता है प्रदूषण?

धान की खेती आमतौर पर पानी से भरे खेतों में की जाती है। खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने से मिट्टी में ऑक्सीजन कम हो जाती है। ऐसे माहौल में कुछ खास तरह के सूक्ष्म जीव सक्रिय हो जाते हैं। ये जीव मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों को तोड़ते हैं और इस प्रक्रिया में मीथेन गैस पैदा होती है। मीथेन एक बेहद खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है, जो धरती का तापमान तेजी से बढ़ाती है।

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Image Source : PEXELSधान की खेती दुनिया के कई हिस्सों में की जाती है।

स्टडी में पाया गया कि उत्सर्जन बढ़ने के पीछे दो बड़ी वजहें हैं। पहली वजह है धान की खेती का लगातार बढ़ता क्षेत्र। उदाहरण के तौर पर अफ्रीका में 1960 के बाद धान की खेती लगभग दोगुनी हो गई, जिससे वहां मीथेन उत्सर्जन भी काफी बढ़ गया। दूसरी वजह खेती के बदलते तरीके हैं। अब किसान ज्यादा उत्पादन के लिए अधिक रासायनिक खाद, गोबर और पुआल जैसी जैविक सामग्री का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही ज्यादा उपज देने वाली किस्में और घनी बुवाई भी उत्सर्जन बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।

खेत में पुआल छोड़ना भी क्यों बना बड़ी वजह?

वैज्ञानिकों ने पाया कि कटाई के बाद खेत में धान का पुआल छोड़कर उसे मिट्टी में मिलाना भी उत्सर्जन बढ़ाने का बड़ा कारण है। यह तरीका मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए अपनाया जाता है, लेकिन इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ जाता है। बाद में माइक्रोब्स इन्हें तोड़ते हैं और ज्यादा मीथेन गैस पैदा होती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 1960 के बाद कुल उत्सर्जन बढ़ने में करीब 18 प्रतिशत योगदान इसी प्रक्रिया का रहा। धरती का बढ़ता तापमान भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। गर्म मौसम में मिट्टी के सूक्ष्म जीव ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जिससे मीथेन का उत्सर्जन और तेजी से बढ़ सकता है। यानी जलवायु परिवर्तन और धान से निकलने वाली गैसें एक-दूसरे को और बढ़ाने का काम कर रही हैं।

रासायनिक खाद और सिंचाई का भी बड़ा असर

स्टडी के अनुसार, साल 2000 के बाद सिंथेटिक नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल करीब 76 प्रतिशत बढ़ गया। इससे नाइट्रस ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ा है। यह गैस भी बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मानी जाती है और वैश्विक प्रदूषण बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है। सिंचाई का तरीका भी उत्सर्जन को प्रभावित करता है। पहले धान के खेतों में पूरे सीजन पानी भरा रहता था, जिससे लगातार मीथेन गैस बनती रहती थी। अब कई किसान बीच-बीच में खेतों से पानी निकालने लगे हैं। इससे मीथेन उत्सर्जन तो कम होता है, लेकिन मिट्टी के बार-बार गीले और सूखे होने से नाइट्रस ऑक्साइड गैस थोड़ी बढ़ जाती है।

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Image Source : PEXELSधान की ज्यादा उपज के लिए किसान बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने धान की खेती पर कैसे की रिसर्च?

इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दुनियाभर के 1200 से ज्यादा खेतों में हुए प्रयोगों का सहारा लिया। इन सभी आंकड़ों को मिलाकर 1961 से 2020 तक धान से होने वाले उत्सर्जन का विश्लेषण किया गया। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि कौन-सी खेती की तकनीकें ज्यादा प्रदूषण पैदा कर रही हैं और किन तरीकों से इसे कम किया जा सकता है।

क्या धान की खेती से प्रदूषण कम किया जा सकता है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सही तकनीक अपनाकर धान से होने वाले प्रदूषण को कम किया जा सकता है और इससे उत्पादन पर भी बड़ा असर नहीं पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने धान की खेती से प्रदूषण कम करने के 3 प्रमुख तरीके बताए हैं:

  1. खाद का सीमित इस्तेमाल: जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन खाद डालने से प्रदूषण और पानी दोनों खराब होते हैं। संतुलित उपयोग से किसानों का खर्च भी बचेगा।
  2. खेतों को बीच-बीच में सुखाना: लगातार पानी भरा रखने के बजाय कुछ समय के लिए खेत सुखाने से मीथेन गैस कम होती है।
  3. पुआल का सही इस्तेमाल: बहुत ज्यादा पुआल मिट्टी में मिलाने से मीथेन बढ़ती है। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि कुछ पुआल को “बायोचार” में बदला जा सकता है।

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Image Source : PEXELSधान की खेती में पानी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है।

पूरी दुनिया में नहीं काम करेगा एक ही तरीका

स्टडी में 'बायोचार' को भी एक बेहतर विकल्प बताया गया है। इसमें पुआल को कम ऑक्सीजन में जलाकर मिट्टी में मिलाया जाता है। इससे मिट्टी में कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और मीथेन गैस का उत्सर्जन कम हो सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ कहा कि पूरी दुनिया में कोई एक तरीका हर जगह काम नहीं करेगा। ठंडे इलाकों और गर्म क्षेत्रों की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए हर क्षेत्र को अपनी जलवायु और खेती के हिसाब से समाधान चुनना होगा।

दुनिया के सामने अब आगे क्या है चुनौती?

स्टडी के मुताबिक, अगर दुनिया भर के किसान अभी उपलब्ध सबसे अच्छे 'क्लाइमेट-स्मार्ट' तरीके अपनाएं, तो 2050 तक धान से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 10 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन को गंभीर स्तर पर रोकने के लिए इससे भी बड़े और नए समाधान विकसित करने होंगे। धान की खेती दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। चुनौती यह है कि उत्पादन भी बना रहे और पर्यावरण को नुकसान भी कम हो। वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर तकनीक, संतुलित खेती और नई वैज्ञानिक विधियों की मदद से इस संतुलन को बनाया जा सकता है। (द कन्वर्सेशन)

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