AI Impact On Children: दुनियाभर में बच्चों और टीनेजर्स के द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। कई देशों और उनके राज्यों में ऐसे कानून बनाए जा रहे हैं, जिनका मकसद कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से दूर रखना है। अब इसी बहस के बीच बच्चों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कि AI चैटबॉट्स पर रोक लगाने की चर्चा भी तेज हो गई है।
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कनाडा के मैनिटोबा प्रांत में बच्चों के AI इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव सामने आया है। सरकार का मानना है कि तकनीकी प्लेटफॉर्म बच्चों को ज्यादा समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने और मुनाफा कमाने के लिए नुकसान पहुंचाने वाले तरीके अपना रहे हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि कनाडा में किन AI प्लेटफॉर्म पर रोक लगेगी और नियम कैसे लागू होंगे।
बच्चों में तेजी से बढ़ रहा AI का इस्तेमाल
आज के समय में बड़ी संख्या में बच्चे AI चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा उपयोग जानकारी खोजने, पढ़ाई में मदद लेने, नोट्स बनाने, सवाल हल करने और प्रोजेक्ट तैयार करने में हो रहा है। कई छात्र AI टूल्स को कठिन विषय समझने और खुद को टेस्ट करने के लिए उपयोगी मानते हैं।

अब AI सिर्फ घर तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों और क्लासरूम तक पहुंच चुका है। कुछ जगहों पर छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए AI आधारित रीडिंग टूल्स इस्तेमाल हो रहे हैं। वहीं कई स्कूलों के लैपटॉप और टैबलेट में AI फीचर्स पहले से इंस्टॉल होकर आ रहे हैं, जो बच्चों को आर्टिकल लिखने, प्रेजेंटेशन बनाने और सवालों के जवाब देने में मदद की पेशकश करते हैं।
एक्सपर्ट्स की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
शिक्षा और मनोविज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि AI बच्चों की पढ़ाई को आसान तो बना सकता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा निर्भरता नुकसानदायक हो सकती है। अगर छात्र हर काम के लिए AI पर निर्भर होने लगें, तो उनकी सोचने-समझने, तर्क बनाने, खुद से लिखने और समस्याओं को हल करने की क्षमता कमजोर हो सकती है। पढ़ाई का असली मकसद सिर्फ जवाब हासिल करना नहीं, बल्कि कठिन सवालों से जूझकर सीखना होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर AI हर मुश्किल काम आसान कर देगा, तो बच्चों का बौद्धिक विकास प्रभावित हो सकता है।

सामाजिक जीवन पर भी असर का खतरा
AI चैटबॉट्स को लेकर एक और बड़ी चिंता बच्चों के सामाजिक व्यवहार को लेकर है। कई रिसर्च में सामने आया है कि बच्चे अब दोस्तों से बात करने की बजाय चैटबॉट्स से ज्यादा समय बिताने लगे हैं। इससे उनके सोशल स्किल पर असर पड़ सकता है। मानव संबंधों में भावनाएं, असहमति, समझ और वास्तविक अनुभव शामिल होते हैं, जबकि चैटबॉट अक्सर सिर्फ सहमति जताते हैं। ऐसे में बच्चों को सही सामाजिक अनुभव नहीं मिल पाता। कई टीनेजर्स खुद भी मानने लगे हैं कि वे AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं।
क्या AI पर पूरी तरह बैन करना सही रास्ता है?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ प्रतिबंध लगाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। सोशल मीडिया बैन के अनुभव बताते हैं कि बच्चे अक्सर ऐसे नियमों से बचने के रास्ते ढूंढ लेते हैं। इसके अलावा पूरी तरह रोक लगाने से तकनीक के सही इस्तेमाल का अवसर भी खत्म हो सकता है। AI भविष्य की तकनीक माना जा रहा है। ऐसे में बच्चों को इससे पूरी तरह दूर रखना उन्हें आने वाले समय के लिए कमजोर भी बना सकता है। कई युवाओं का मानना है कि AI कई चीजों को सीखने के अनुभव को बेहतर बना सकता है और पढ़ाई को ज्यादा आसान व समझने योग्य बना सकता है।

ऐसे में सही रास्ता क्या हो सकता है?
एक्सपर्ट्स अब 'डिजिटल एजेंसी' यानी तकनीक पर समझदारी और नियंत्रण की बात कर रहे हैं। इसका मतलब है कि बच्चों को यह सिखाया जाए कि AI का इस्तेमाल कब, कितना और किस काम के लिए करना सही है। स्कूलों में AI को लेकर स्पष्ट नियम और लगातार बातचीत जरूरी मानी जा रही है। उदाहरण के तौर पर शुरुआत में बच्चों को खुद से लिखने और सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जबकि बाद में सीमित और जिम्मेदार तरीके से AI इस्तेमाल की अनुमति दी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सिर्फ नियम बताने की बजाय उन्हें इस चर्चा में शामिल करना ज्यादा जरूरी है। क्योंकि तकनीक तेजी से बदल रही है और आने वाली दुनिया में AI की भूमिका लगातार बढ़ने वाली है।
AI का संतुलित इस्तेमाल सिखाना होगा
हाल ही में स्कूलों में मोबाइल फोन बैन पर हुई स्टडी में पाया गया कि फोन का इस्तेमाल तो कम हुआ, लेकिन पढ़ाई के नतीजों में बहुत बड़ा सुधार नहीं दिखा। कुछ जगहों पर शुरुआती दौर में अनुशासन से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी भी देखी गई। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि केवल बैन लगाना कितना प्रभावी उपाय है। इसी तरह अब AI को लेकर भी बहस जारी है। एक तरफ इसके फायदे हैं, तो दूसरी ओर इसके दुष्प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को AI से पूरी तरह दूर करने की बजाय उन्हें सुरक्षित, जिम्मेदार और संतुलित इस्तेमाल सिखाना ज्यादा जरूरी है।