1. Hindi News
  2. Explainers
  3. काला सागर में ड्रोन की मार, भारत पर कितना असर? गेहूं, तेल और भारतीय नाविकों का क्या है कनेक्शन

काला सागर में ड्रोन की मार, भारत पर कितना असर? गेहूं, तेल और भारतीय नाविकों का क्या है कनेक्शन

रूस-यूक्रेन युद्ध में काला सागर अब ड्रोन हमलों के कारण व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए भी खतरनाक हो गया है। इसका असर भारतीय नाविकों, अनाज-तेल की सप्लाई, समुद्री बीमा और वैश्विक कीमतों पर पड़ सकता है।

Black Sea War, Russia Ukraine War, Black Sea Drone Attacks- India TV Hindi
Image Source : AP रोमानिया में काला सागर के तट पर स्थित एक पोर्ट पर समुद्री ड्रोन के हमले के बाद उठता धुआं।

Highlights

  • काला सागर से दुनिया के गेहूं, तेल और खाद की बड़ी सप्लाई जुड़ी हुई है।
  • ड्रोन हमलों ने रूस-यूक्रेन युद्ध को वैश्विक व्यापार के लिए बड़ा खतरा बनाया।
  • भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर भारत रूस और यूक्रेन से लगातार बात कर रहा।

रूस और यूक्रेन की जंग अब सिर्फ जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं रह गई है। काला सागर में ड्रोन हमलों ने सैन्य ठिकानों के साथ-साथ व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों को भी खतरे में डाल दिया है। इस समुद्र से दुनिया के कई देशों के लिए गेहूं, मक्का, तेल और खाद की सप्लाई होती है। हाल के हमलों में भारतीय नाविक भी प्रभावित हुए हैं। ऐसे में सवाल है कि काला सागर में ऐसा क्या खास है और यहां चल रही लड़ाई का असर अफ्रीका, एशिया और भारत तक कैसे पहुंच सकता है? आइए समझते हैं।

काला सागर की स्थिति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

काला सागर यूरोप और एशिया के बीच स्थित एक बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इसके किनारे रूस, यूक्रेन, तुर्किये, बुल्गारिया, रोमानिया और जॉर्जिया हैं। हालांकि इसका महत्व सिर्फ इन 6 देशों तक सीमित नहीं है। यहां से जाने वाला अनाज, तेल और दूसरी जरूरी चीजें हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के बाजारों तक पहुंचती हैं। इसलिए काला सागर में कोई बड़ी रुकावट पैदा होती है तो उसका असर दूर-दराज के देशों में खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।

गेहूं की सप्लाई में काला सागर की क्या भूमिका है?

काला सागर के बंदरगाहों से हर साल करोड़ों टन अनाज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के निर्यात होने वाले गेहूं का करीब एक चौथाई हिस्सा सप्लाई करते हैं। रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक है, जबकि यूक्रेन गेहूं और मक्का का बड़ा सप्लायर है। अगर इन समुद्री रास्तों पर जहाजों की आवाजाही रुकती या धीमी होती है, तो मिस्र, बेरूत और नैरोबी जैसी जगहों में रोटी की कीमत बढ़ सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ता है जो खाने-पीने की चीजों के लिए आयात पर निर्भर हैं।

तेल के लिए भी क्यों अहम है काला सागर?

काला सागर रूस के तेल कारोबार का भी बड़ा केंद्र है। रूस के समुद्री टर्मिनलों से रोज करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल गुजरता है। नोवोरोसिस्क रूस का प्रमुख दक्षिणी तेल निर्यात केंद्र है। इसके पास कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम का समुद्री टर्मिनल भी है, जो कजाखस्तान के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा संभालता है। इन टर्मिनलों से तेल की आवाजाही में रुकावट आती है तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर असर पड़ सकता है। एशिया की रिफाइनरियों तक पहुंचने वाली सप्लाई भी इससे प्रभावित हो सकती है।

काला सागर से बाहर निकलना मुश्किल क्यों है?

काला सागर की भौगोलिक स्थिति इसे और संवेदनशील बनाती है। यह सीधे खुले समुद्र से नहीं जुड़ा है। यहां से निकलने वाले जहाजों को तुर्किये के बोस्फोरस से गुजरना पड़ता है। इसके बाद वे मरमारा सागर पार करते हैं और डार्डानेल्स से होकर भूमध्यसागर की ओर जाते हैं। इन जलडमरूमध्यों पर 1936 की मॉन्ट्रो कन्वेंशन लागू होती है। यही काला सागर को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला समुद्री रास्ता है। इसलिए यहां संकट पैदा होने पर जहाजों के लिए कोई आसान वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध नहीं है।

रूस-यूक्रेन युद्ध में काला सागर कैसे बना जंग का मैदान?

2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद काला सागर भी युद्ध का बड़ा मैदान बन गया। शुरुआत में यहां पारंपरिक नौसैनिक लड़ाई हुई। इसमें युद्धपोत, मिसाइल फ्रिगेट, तटीय मिसाइल सिस्टम और समुद्री सुरंगों का इस्तेमाल हुआ। लेकिन यूक्रेन के पास रूस जैसी बड़ी पारंपरिक नौसेना नहीं थी। इसलिए उसने छोटे, सस्ते और दूर से नियंत्रित किए जा सकने वाले समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया। इन विस्फोटक ड्रोन ने रूस के लिए नई चुनौती पैदा कर दी और धीरे-धीरे काला सागर में युद्ध की रणनीति बदलने लगी।

यूक्रेन के समुद्री ड्रोन से रूस को क्या नुकसान हुआ?

यूक्रेन ने रूस के ऐतिहासिक नौसैनिक केंद्र सेवस्तोपोल के आसपास लगातार समुद्री ड्रोन हमले किए। इन हमलों के कारण रूसी नौसेना को अपने कई बड़े युद्धपोत पूर्व की ओर नोवोरोसिस्क ले जाने पड़े। यह सिर्फ सैन्य तैनाती में बदलाव नहीं था। नोवोरोसिस्क रूस का बड़ा व्यावसायिक केंद्र भी है। यहां से तेल और दूसरे महत्वपूर्ण सामान का कारोबार होता है। नतीजा यह हुआ कि जिस समुद्री क्षेत्र में रूसी युद्धपोत ड्रोन से बचने की कोशिश कर रहे थे, उसी क्षेत्र से तेल, खाद और गेहूं ले जाने वाले व्यापारी जहाज भी गुजर रहे थे।

अब युद्ध का खतरा व्यापारी जहाजों तक कैसे पहुंच गया?

युद्ध शुरू होने के बाद से काला सागर में व्यापारी जहाजों को जोखिम रहा है, लेकिन अक्टूबर की शुरुआत में हालात ज्यादा गंभीर हो गए। अक्टूबर की शुरुआत में यूक्रेनी मक्का लेकर जा रहे तुर्किये के एक कार्गो जहाज को सीधे हमला झेलना पड़ा। जहाज रोमानिया के विशेष आर्थिक क्षेत्र में डूब गया और 2 नाविकों की मौत हो गई। इसके 48 घंटे बाद बुल्गारिया के जलक्षेत्र में 2 कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया गया। यह नाटो के किसी सदस्य देश के समुद्री क्षेत्र में इस तरह के हमलों का पहला मामला था। इस हमले में एक जहाज डूब गया और 10 नाविक लापता हो गए।

बुल्गारिया में हुए दूसरे हमले में भारतीयों के साथ क्या हुआ?

बुल्गारिया के जलक्षेत्र में हमले का शिकार हुए दूसरे जहाज पर 18 चालक दल के सदस्य मौजूद थे। उन्हें बचा लिया गया। इनमें 7 भारतीय नाविक शामिल थे। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय नागरिक दुनिया के समुद्री व्यापार में बड़ी संख्या में काम करते हैं। युद्ध क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा सीधे उनके जीवन को खतरे में डाल सकती है। लाल सागर और अदन की खाड़ी में ड्रोन तथा मिसाइल हमलों के बीच काम कर चुके भारतीय नाविक अब काला सागर में भी इसी तरह के जोखिम का सामना कर रहे हैं।

सोची के पास तेल टैंकर पर हमले से चिंता क्यों?

इसके बाद रूस के पर्यटन शहर सोची के तट के पास लाइबेरिया के झंडे वाला कच्चे तेल का टैंकर ‘अफ्रामैक्स रियो’ समुद्री ड्रोन की चपेट में आ गया। हमले के बाद जहाज के डेक पर भीषण आग लग गई। आपातकालीन टग बोट ने आग बुझाने की कोशिश की और सभी 23 चालक दल के सदस्यों को बचा लिया गया। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और युद्ध के बीच की कड़ी को साफ कर दिया। जहाज लाइबेरिया के झंडे के नीचे था, उसके क्रू के सभी सदस्य भारतीय थे और वह रूसी तट से लदा कच्चा तेल ले जा रहा था।

इस हमले की सबसे बड़ी खास बात क्या थी?

‘अफ्रामैक्स रियो’ पर हमला सक्रिय युद्ध की अग्रिम पंक्ति से सैकड़ों किलोमीटर दूर हुआ। इसका मतलब यह है कि खतरा सिर्फ उस जगह तक सीमित नहीं है जहां रूस और यूक्रेन की सेनाएं सीधे आमने-सामने हैं। समुद्री ड्रोन बहुत दूर तक पहुंचकर ऐसे जहाजों को भी निशाना बना सकते हैं जो युद्ध में सीधे शामिल नहीं हैं। किसी व्यापारी जहाज का झंडा किस देश का है, उसमें कौन सा सामान है और उसका चालक दल किस देश का है, इन सबके बावजूद समुद्र में मंडरा रहा ड्रोन उसे एक संभावित लक्ष्य बना सकता है।

रूस और यूक्रेन जहाजों को निशाना क्यों बना रहे हैं?

रूस और यूक्रेन दोनों समुद्री सप्लाई लाइनों को युद्ध में रणनीतिक महत्व देते हैं। रूस यूक्रेन के डेन्यूब बंदरगाहों और तटीय भंडारण केंद्रों पर हमले करता है। रूस का दावा है कि इन जगहों पर हथियारों की सप्लाई होती है। दूसरी ओर, यूक्रेन तेल टैंकरों और ईंधन से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाता है। उसका उद्देश्य रूस की तेल से होने वाली कमाई को प्रभावित करना है, क्योंकि इसी आय से युद्ध के लिए संसाधन जुटाए जाते हैं। लेकिन इन हमलों के बीच सबसे ज्यादा जोखिम उन नागरिक नाविकों का है जिनका युद्ध से कोई सीधा संबंध नहीं है।

काला सागर में जंग का जहाजों के किराए पर क्या असर पड़ता है?

व्यापार के लिए समस्या केवल जहाज पर हमला होने से नहीं पैदा होती। खतरा बढ़ते ही समुद्री बीमा कंपनियां युद्ध जोखिम का प्रीमियम बढ़ा देती हैं। काला सागर में हर नए हमले के साथ जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है। बुल्गारिया के नेतृत्व ने भी चेतावनी दी है कि बढ़ती बीमा लागत सामान्य व्यापारिक जहाजों के संचालन को मुश्किल बना रही है। इसके बाद जहाज मालिक ज्यादा जोखिम भत्ता मांगते हैं और माल ढुलाई का किराया बढ़ता है। बड़ी शिपिंग कंपनियां जोखिम वाले रास्तों से पीछे हट सकती हैं और इसके चलते पुराने जहाजों पर निर्भरता बढ़ सकती है।

आखिर इस पूरे संकट का असर आम लोगों पर कैसे पड़ेगा?

समुद्र में बढ़ते जोखिम का असर आखिरकार आम लोगों की जेब तक पहुंच सकता है। जहाजों का बीमा और माल ढुलाई महंगी होने पर डीजल, तेल और आटे जैसी चीजों की कीमत बढ़ सकती है। अगर स्थिति इतनी खराब हो जाए कि कंपनियां काला सागर को प्रतिबंधित क्षेत्र मानने लगें, तो सप्लाई और महंगी हो जाएगी। अनाज को लेकर चिंता सबसे ज्यादा है। 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आने वाले महीनों में बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि कुछ बड़े अनाज निर्यातकों को खासकर काला सागर के रास्ते माल भेजने में परेशानी हो सकती है।

भारत ने रूस और यूक्रेन से बातचीत क्यों बढ़ाई?

जयशंकर ने यह भी बताया था कि खाद की कमी बढ़ रही है और भारत सुरक्षित काला सागर शिपिंग बहाल करने के लिए रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत कर रहा है। यानी भारत की भूमिका अब केवल चिंता जताने तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली सीधे दोनों पक्षों से संपर्क कर रही है। भारत के लिए यह मुद्दा खाद्य सुरक्षा और अपने नागरिकों की सुरक्षा दोनों से जुड़ा है। दुनिया के वाणिज्यिक समुद्री कर्मचारियों में भारतीय नाविकों की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से अधिक है। ऐसे में काला सागर में बढ़ता खतरा भारत के लिए आर्थिक और मानवीय दोनों तरह की चिंता पैदा करता है।

भारत की कूटनीति सिर्फ नाविकों तक सीमित क्यों नहीं रही?

भारतीय कोशिशों की शुरुआत व्यापारी जहाजों में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा से हुई, लेकिन बाद में इसका दायरा बढ़कर अनाज और ऊर्जा ढांचे तक पहुंच गया। यूक्रेन ने भारत, अमेरिका, तुर्किये और मिस्र की ओर से दिए गए 4 अलग-अलग युद्धविराम प्रस्ताव मिलने की पुष्टि की है। यूक्रेन के मुताबिक, भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक था, क्योंकि इसमें समुद्री स्थिरता के साथ ऊर्जा से जुड़े ढांचे को भी शामिल किया गया था। हालांकि इन प्रस्तावों को जमीन पर लागू करना मुश्किल है। रूस समुद्री हमलों पर औपचारिक रोक लगाने का विरोध कर रहा है, क्योंकि व्यापारिक ढांचे पर दबाव उसके लिए युद्ध में महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है।

एक ही समुद्र में युद्ध और कूटनीति साथ-साथ क्यों चल रही है?

काला सागर में इस समय एक अनोखी स्थिति बन गई है। जिस समुद्र में ड्रोन सैन्य जहाजों और तेल टैंकरों को निशाना बना रहे हैं, उसी समुद्र में सुरक्षित व्यापार के लिए कूटनीतिक बातचीत भी चल रही है। यानी सैन्य कार्रवाई और कूटनीति दोनों का केंद्र एक ही समुद्र है। यही वजह है कि काला सागर अब सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच चल रही लड़ाई का हिस्सा नहीं रह गया है। यहां वैश्विक खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सप्लाई, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ गई है।

काला सागर का असर दुनिया के दूसरे हिस्सों तक क्यों जाएगा?

रूस और यूक्रेन जमीन और संप्रभुता को लेकर लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी अर्थव्यवस्था और समुद्री व्यापार पूरी दुनिया से जुड़े हैं। काला सागर से निकलने वाला गेहूं अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया के देशों तक पहुंचता है। यहां से जाने वाला तेल वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है। भारतीय नाविक इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार का अहम हिस्सा हैं और अब उनकी सुरक्षा भी खतरे में है। इसलिए काला सागर में होने वाला हर ड्रोन हमला सिर्फ एक जहाज या एक देश की समस्या नहीं है। इस समुद्र की स्थिति आगे चलकर दुनिया के खाद्य बाजार, ईंधन की कीमतों और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती है।

ये भी पढ़ें: क्या रूस NATO पर हमला करने वाला है? कीव पर फिर मिसाइलों की बौछार, काला सागर में भी अटैक