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दुनिया के महासागर गर्म क्यों होते जा रहे हैं? एल नीनो से दुनिया को कितना खतरा है? समझें पूरी बात

दुनिया के महासागर ग्रीनहाउस गैसों और जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार गर्म हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार नया एल नीनो 2026-27 में वैश्विक तापमान, समुद्री हीटवेव, चक्रवात, बाढ़ और सूखे का खतरा बढ़ा सकता है। महासागरों की बढ़ती गर्मी समुद्री जीवन और मौसम प्रणाली दोनों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।

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Image Source : AP/INDIA TV आने वाले दिनों में दुनिया को बड़े खतरों का सामना करना पड़ सकता है।

दुनिया के महासागर लगातार गर्म हो रहे हैं और जून महीने में तो एक नया रिकॉर्ड बन गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जून महीने में दुनिया के महासागरों की सतह का औसत तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। इससे पहले सबसे अधिक तापमान 2023-24 के एल नीनो (El Nino) के दौरान दर्ज किया गया था। अब एक नया एल नीनो विकसित हो रहा है, जिसके कारण आने वाले महीनों और अगले साल गर्मी और भी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि महासागर क्यों गर्म हो रहे हैं, इसका दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है और इससे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है।

पिछले 150 सालों में कितने गर्म हुए महासागर?

इस समय दुनिया के उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण महासागरों की सतह का औसत तापमान 21 डिग्री सेल्सियस से थोड़ा कम है। इसके मुकाबले, वर्ष 1870 यानी बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण शुरू होने से पहले यह तापमान लगभग 19.6 डिग्री सेल्सियस था। पहली नजर में करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस का अंतर बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरे महासागर को इतना गर्म करने के लिए ऊर्जा की बेहद विशाल मात्रा की जरूरत होती है।

Image Source : APदुनिया के महासागर लगातार गर्म होते जा रहे हैं।

आखिर ये महासागर इतने गर्म क्यों हो रहे हैं?

महासागरों के इस कदर गर्म होने का सबसे बड़ा कारण कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का लगातार इस्तेमाल है। इनसे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में गर्मी को फंसा देती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्रीनहाउस गैसों के कारण पृथ्वी में जितनी अतिरिक्त गर्मी जमा हुई है, उसका 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा महासागरों ने अपने अंदर सोख लिया है। इसी वजह से महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं।

दुनिया में कितनी तेजी से बढ़ रही है गर्मी?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2025 में महासागरों में जितनी अतिरिक्त गर्मी जमा हुई, वह हर दिन हर सेकंड लगभग 12 हिरोशिमा परमाणु बमों के विस्फोट से निकलने वाली ऊर्जा के बराबर थी। अगर वर्तमान स्थिति की तुलना अतीत से करें तो वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा मौसम करीब 1 लाख 20 हजार साल पहले, यानी पिछले हिमयुग से पहले देखने को मिला था। उस समय पृथ्वी की कक्षा में धीरे-धीरे बदलाव होने से हजारों वर्षों में तापमान बढ़ा था। लेकिन इंसानों की गतिविधियों के कारण लगभग वही बदलाव सिर्फ करीब 100 साल में देखने को मिल रहा है।

महासागर गर्म होने से कौन से खतरे होते हैं?

महासागर के गर्म होने से कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। बता दें कि महासागरों में जमा गर्मी वहीं नहीं रहती। इसका असर पूरे मौसम तंत्र पर पड़ता है। गर्म महासागर की वजह से चक्रवात ज्यादा शक्तिशाली हो सकते हैं। हवा में नमी बढ़ जाती है। भारी और अचानक बारिश की घटनाएं बढ़ सकती हैं। बाढ़ का खतरा बढ़ता है। समुद्र के ऊपर बनने वाली गर्म हवा जमीन पर भी भीषण हीटवेव ला सकती है। यानी समुद्र का तापमान बढ़ना केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे विश्व के मौसम पर पड़ता है।

Image Source : India TVमहासागर गर्म होने के 5 सबसे बड़े खतरे।

एक बार फिर चर्चा में आया एल नीनो क्या है?

एल नीनो (El Nino) एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। एल नीनो के दौरान कई क्षेत्रों में भीषण गर्मी, सूखा, समुद्री हीटवेव और शक्तिशाली चक्रवात देखने को मिल सकते हैं, जबकि कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की घटनाएं बढ़ जाती हैं। यह घटना आमतौर पर 2 से 7 साल के अंतराल पर होती है और करीब 9 से 12 महीने तक प्रभाव डाल सकती है।

एल नीनो का दुनिया पर क्या असर होगा?

बता दें कि इस समय प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में नया एल नीनो विकसित हो रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एल नीनो काफी प्रभावशाली हो सकता है। इसके कारण पश्चिमी हिंद महासागर, उष्णकटिबंधीय अटलांटिक महासागर और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्री हीटवेव और तापमान बढ़ने की संभावना है। आमतौर पर एल नीनो लगभग एक साल तक रहता है। इसका सबसे ज्यादा असर उसके अंतिम चरण में दिखाई देता है। इसी वजह से वैज्ञानिकों का मानना है कि 2026 बहुत गर्म साल हो सकता है, लेकिन 2027 इससे भी ज्यादा गर्म रहने की संभावना है, क्योंकि महासागर में जमा गर्मी फिर सतह पर लौट आती है। ऐसा पहले 2015-16 और 2023-24 के एल नीनो के दौरान भी देखा गया था।

Image Source : APएल नीनो के असर की वजह से कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ देखने को मिलता है।

दुनिया में इस समय सबसे ज्यादा गर्म इलाके कौन से हैं?

यूरोप इस समय रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव का सामना कर रहा है। यूरोप के आसपास के समुद्र भी असामान्य रूप से गर्म हैं। भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से 6 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा है। उत्तरी सागर के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक है। वहीं, एल नीनो बनने के कारण मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान औसतन 1.24 डिग्री सेल्सियस ज्यादा है। सिर्फ सतह ही नहीं, बल्कि समुद्र के अंदर भी काफी गर्मी जमा है। पूर्वी प्रशांत महासागर की गहराई में तापमान सामान्य से 6 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया है।

महासागरों के गर्म होने से समुद्री जीवन पर क्या असर पड़ेगा?

महासागर लगातार गर्म होने और समुद्री हीटवेव लंबे समय तक बने रहने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसका असर खास तौर पर प्रवाल भित्तियों (Coral Reefs), समुद्री घास (Sea Grass Meadows) और तटीय चट्टानी पारिस्थितिकी तंत्र (Coastal Reefs) पर पड़ रहा है। 2023-24 के एल नीनो और 2024 की अत्यधिक गर्मी के दौरान इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर व्यापक नुकसान देखने को मिला था।

महासागर की गर्मी जमीन पर कैसे असर डालती है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि 'महासागर में जो होता है, वह वहीं नहीं रुकता।' उदाहरण के तौर पर जून 2023 में उत्तर अटलांटिक महासागर में रिकॉर्ड समुद्री हीटवेव आई। इसके कुछ समय बाद यूरोप में भीषण गर्मी पड़ी, स्पेन में भारी बारिश और बाढ़ आई। इसके साथ ही भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगलों में आग लगी। गर्म महासागर गर्मियों में जमीन को ठंडा रखने की क्षमता भी कम कर देते हैं। साथ ही अधिक वाष्पीकरण होने से हवा में नमी बढ़ती है, जिससे अचानक तेज बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

Image Source : APएल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में भयानक गर्मी पड़ रही है।

एल नीनो के दौरान किन इलाकों पर ज्यादा असर पड़ता है?

एल नीनो के समय दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का एक निश्चित पैटर्न देखने को मिलता है। पश्चिमी हिंद महासागर में ज्यादा शक्तिशाली चक्रवात आ सकते हैं। ऐसे चक्रवात जमीन पर पहुंचने के बाद भारी बारिश कर सकते हैं। पश्चिमी दक्षिण अमेरिका में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की संभावना रहती है। वहीं ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।

क्या पहले से तैयारी की जा सकती है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब महासागरों और एल नीनो के प्रभाव को पहले की तुलना में बेहतर तरीके से समझा जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कई अन्य देशों में अब समुद्री हीटवेव का 3 से 4 महीने पहले तक अनुमान लगाया जा सकता है। इससे सरकारों और समुद्री एजेंसियों को पहले से तैयारी करने का मौका मिलता है। वे जरूरत पड़ने पर:

  1. मछली पकड़ने की सीमा तय कर सकती हैं।
  2. संवेदनशील समुद्री जीवों के संरक्षण की शुरुआत पहले कर सकती हैं।
  3. संभावित मौसमीय खतरों के लिए तैयारी कर सकती हैं।

क्या भविष्य में मौसम का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है?

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में पिछले वर्ष जलवायु से जुड़े आंकड़े जुटाने वाले कई कार्यक्रमों के बजट में कटौती की गई। साथ ही नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च (NCAR) जैसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली को भी प्रभावित करने वाले कदम उठाए गए। इस वर्ष एक महत्वपूर्ण समुद्री निगरानी नेटवर्क की फंडिंग बंद करने की घोषणा भी की गई थी, हालांकि बाद में उस फैसले से पीछे हटने की जानकारी सामने आई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि महासागरों से जुड़े आंकड़े जुटाने की व्यवस्था कमजोर होती है या बंद हो जाती है, तो मौसम और जलवायु का सटीक अनुमान लगाना कठिन हो जाएगा। (द कन्वर्सेशन)

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