डोनाल्ड ट्रंप की नई मांग से NATO समिट से पहले तनाव! आखिर यूरोपीय देशों के नेताओं से क्यों हैं नाराज?
तुर्की में NATO समिट से पहले Donald Trump की उस नाराजगी को लेकर चर्चा तेज हो गई है, जिसमें उन्होंने इस बात पर निराशा जताई थी कि ईरान के साथ जंग में NATO के कई सदस्य देशों ने साथ नहीं दिया।
तुर्की के अंकारा में 7-8 जुलाई, 2026 को आयोजित वाली NATO समिट में अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump और यूरोपीय नेताओं के बीच गहमागहमी का अंदेशा जताया जा रहा है। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों NATO के कई सदस्य देशों से खफा हैं क्योंकि उन्होंने Iran के साथ युद्ध में अमेरिका का साथ नहीं दिया। इस आर्टिकल में समझिए कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप की NATO से नाराजगी की क्या वजहें है, ट्रंप अमेरिका नाटो को छोड़ने की बात क्यों करते हैं और पिछले कुछ समय में ट्रंप ओर नाटो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच तल्खी क्यों बढ़ी है।
अमेरिका को गठबंधन से जोड़े रखना NATO के लिए चुनौती
जान लें कि अंकारा में होने वाली NATO Summit 2026 में नाटो के महासचिव मार्क रुटे के लिए सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका को इस गठबंधन से जोड़े रखने की होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप कई बार NATO को छोड़ने की बात कह चुके हैं। मार्क रुटे का प्रयास रहेगा कि डोनाल्ड ट्रंप को अहसास हो कि NATO के बाकी देश भी अब अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी को उठाने के लिए सतर्क हैं।
मार्क रुटे का 'द ट्रंप ट्रिलियन' वाला दांव
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप की एक पुरानी शिकायत है कि यूरोप के देश अपने डिफेंस को लेकर कम पैसे खर्च करते हैं। इसी शिकायत को दूर करने के लिए मार्क रुटे पिछले महीने अमेरिका भी गए थे और ट्रंप के सामने 'द ट्रंप ट्रिलियन' नाम का चार्ट पेश किया था। इसके जरिए रुटे ने ट्रंप को बताया था 2017 से अब तक NATO के बाकी देशों यानी यूरोप और कनाडा की तरफ से डिफेंस के क्षेत्र में 1.2 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश किया गया है। साथ ही, यूरोप के देशों ने 300 अरब डॉलर की कीमत के अमेरिका के हथियारों को खरीदने के लिए ऑर्डर भी दिया।
भारी-भरकम आर्थिक आंकड़े देखकर भी नहीं खुश हुए ट्रंप
गौरतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप, मार्क रुटे की तरफ से पेश किए गए इन भारी-भरकम आर्थिक आंकड़ों से भी खुश नहीं हुए। ट्रंप ने साफ कहा कि उनकी असली नाराजगी अमेरिका से ईरान के संघर्ष में नाटो सहयोगियों के साथ नहीं देने को लेकर है। ट्रंप का दो-टूक संदेश था कि हमें सिर्फ पैसे नहीं, नाटो देशों से वफादारी भी चाहिए।
प्रमुख NATO सदस्य देशों का रक्षा बजट (2025)
| NATO में रैंक | देश का नाम | 2025 रक्षा बजट (बिलियन अरब डॉलर) | GDP का प्रतिशत |
|---|---|---|---|
| 1 | अमेरिका | 954.0 | 3.1% |
| 2 | जर्मनी | 114.0 | 2.3% |
| 3 | यूनाइटेड किंगडम | 89.0 | 2.4% |
| 4 | फ्रांस | 68.0 | 2.0% |
| 5 | इटली | 48.1 | 1.9% |
| 6 | पोलैंड | 46.8 | 4.5% |
| 7 | स्पेन | 40.2 | 2.1% |
| 8 | कनाडा | 37.5 | 1.6% |
| 9 | तुर्की | 30.0 | 1.9% |
| 10 | नीदरलैंड | 28.9 | 2.2% |
(सोर्स- स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट)
NATO क्या है?
NATO का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन है। इसमें नॉर्थ अमेरिका के कनाडा-अमेरिका और यूरोप के मिलाकर 32 देश है। NATO की स्थापना 4 अप्रैल, 1949 की गई थी। इसका प्रमुख मकसद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप में सोवियत संघ को विस्तार करने से रोकना और सदस्य देशों को सामूहिक रूप से सुरक्षा देना था। शुरुआत में NATO में केवल 12 देश थे लेकिन वर्तमान में इसका विस्तार 32 देशों तक पहुंच चुका है।
NATO के चार्टर की सबसे अहम बात
नाटो के चार्टर के 'अनुच्छेद-5' में जो बात लिखी है, वह इसे खास बनाती है। इसमें लिखा है कि अगर NATO के किसी भी एक सदस्य देश पर कोई हमला होता है, तो उसे NATO के सभी सदस्य देशों पर अटैक माना जाएगा और फिर सभी NATO देश मिलकर उस खतरे का मुकाबला करेंगे।
NATO में कौन कब शामिल हुआ?
| वर्ष | शामिल होने वाले देश |
|---|---|
| 1949 | बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम, अमेरिका (12 संस्थापक सदस्य) |
| 1952 | ग्रीस, तुर्की |
| 1955 | जर्मनी (पश्चिम जर्मनी) |
| 1982 | स्पेन |
| 1999 | पोलैंड, हंगरी, चेक गणराज्य |
| 2004 | बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया |
| 2009 | अल्बानिया, क्रोएशिया |
| 2017 | मोंटेनेग्रो |
| 2020 | उत्तर मैसेडोनिया |
| 2023 | फिनलैंड |
| 2024 | स्वीडन |
(इनपुट- AP)
