नई दिल्ली: क्या आप सोच सकते हैं कि 21वीं सदी में कोई किसी दूसरे देश का एक पूरा प्रांत खरीद ले? यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप की जिद है। एक ओर ग्रीनलैंड में पिघलते ग्लेशियरों के नीचे दबा हुआ अरबों डॉलर्स का खजाना है, तो दूसरी ओर NATO में पड़ती दरार। INDIA TV के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में विदेश मामलों के एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव ने डोनाल्ड ट्रंप की उस 'सीक्रेट फाइल' को डिकोड किया है जिसने यूरोप समेत पूरी दुनिया की नींद उड़ा रखी है। सवाल है कि क्या ग्रीनलैंड, अमेरिका का 51वां राज्य बनने वाला है? क्या यूरोप इन मुश्किल हालातों में भारत को अपना चौथा पोल बनाएगा? पढ़िए, महाशक्तियों के अहंकार, ग्रीनलैंड विवाद और बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में भारत के भविष्य पर यह बेबाक बातचीत।
सवाल- ट्रंप प्रशासन का दावा है कि रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों के कारण ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है, तो क्या सच में डेनमार्क और NATO की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था इस क्षेत्र में कमजोर है? ट्रंप चाहें तो ग्रीनलैंड की सुरक्षा में अपने सैनिक तैनात कर सकते हैं, वह उसका मालिक बनने पर इतना जोर क्यों दे रहे हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि यह एक बहुत अच्छा बिंदु है। ग्रीनलैंड की सुरक्षा अभी पर्याप्त है। वह नाटो के अंतर्गत है और अगर कुछ भी हुआ तो अमेरिका पूरी तरह साथ आएगा। लेकिन, अमेरिका दुनिया को अपने नजरिए से देख रहा है। और जब वह अपने नजरिए से देख रहा है, तो अभी वह दक्षिण अमेरिका के देशों को भी कह रहा है कि या तो मेरी बात मानो या मेरी कॉलोनी बन जाओ? या फिर मेरे साथ फ्रेंडली रहो।
उन्होंने कहा, 'जब अमेरिका उत्तर की तरफ देखता है, तो अगर आप गौर करें, तो ग्रीनलैंड की जो जमीन वह चाह रहा है, वह अमेरिका के लिए Logical है। उन्हें उससे बहुत फायदा है। अब बात यह है कि आप कह रहे हैं, या हम कह रहे हैं कि यह स्वाभिमान और Ego की बात है। Ego की बात तो है ही, लेकिन यह Geography की भी बात है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि दूसरी बात, जितना ट्रंप कह रहे हैं कि रूस और चीन के जहाज वहां घूम रहे हैं, उतना अभी नहीं है। लेकिन हां, आने वाले वक्त में ऐसा होगा। आने वाले समय में रूस और चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाएंगे और रिसर्च स्टेशन बढ़ाएंगे। और हो क्या रहा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते नॉर्थ पोल के ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं। तो यह जो पूरा का पूरा जमा हुआ बर्फीला नॉर्थ पोल था, वहां कई जगहों पर जब बर्फ पिघलेगी, तो समुद्री रास्ते बनते जाएंगे। और यूरोप से अमेरिका जाने के लिए वह ऊपर से सबसे Shortest Route बन जाएगा। रूस से भी अमेरिका के लिए और चीन से भी अमेरिका के लिए। तो अमेरिका को चीन से जो व्यापार करना है, या चीन का जो माल अमेरिका आ रहा है, जो अभी इतना लंबा घूम के आता है, वह बहुत छोटे रास्ते से आएगा तो वह लाभ तो है ही।
उन्होंने कहा कि इस जमीन में बहुत सारे Minerals हैं। वह क्या हैं यह पूरी तरह पता नहीं लेकिन बहुत खनिज हैं। इन कुछ चीजों को देखकर अमेरिका को यह तार्किक लगता है कि अगर यह हमारा हो जाए, तो अच्छा रहेगा। अब इसमें अमेरिका का कुछ पुराना अनुभव भी है। अमेरिका ने फ्रांस से लुइसियाना खरीदा था, जो एक पूरा राज्य है। अमेरिका ने रूस से पूरा अलास्का राज्य खरीदा है। तो ट्रंप अपने आप को अमेरिका का उस किस्म का राष्ट्रपति और नेता समझते हैं, जो इसकी सीमा, यानी वास्तविक सीमा को भी बढ़ा दें, ताकि देश भी भौगोलिक रूप से बड़ा हो जाए। वह 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' कहते हैं, तो मैं कहूंगा कि वह 'मेक अमेरिका ज्योग्राफिकली ग्रेट' कर रहे हैं।
रोबिंदर सचदेव ने कहा, 'भविष्य में कोई संदेह नहीं है, देखिए अगर आप लंबी अवधि में देखें तो 100 साल, 200 साल, 300 साल, कहां क्या पासा पलटेगा, कोई नहीं जानता। यूरोप अभी यूक्रेन को लेकर फंसा हुआ है कि रूस की तरफ क्या रवैया रखें और अमेरिका का क्या रवैया है। तो 50-100 साल बाद यूरोप की साझेदारी किधर होगी? इसलिए हमेशा बेहतर यही होता है कि जो जगह हो, वह आपकी हो। तो ट्रंप उस राह पर चल रहे हैं।'
सवाल- डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड पर किसी भी तरह का अमेरिकी दबाव NATO के अंत की शुरुआत हो सकता है। क्या सिर्फ ग्रीनलैंड के लिए अमेरिका अपने सबसे पुराने सैन्य गठबंधन को दांव पर लगा देगा?
जवाब- विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि जी हां, कुछ हद तक लगा देगा, लेकिन यह बात नहीं है कि नाटो खत्म होगा। समस्या नाटो और यूरोप के लिए यह है कि मान लीजिए अमेरिका ने किसी तरह ग्रीनलैंड ले लिया, इसके दो-तीन तरीके हैं, उस पर हम बात कर सकते हैं। लेकिन मान लीजिए कि ग्रीनलैंड अमेरिका का हो गया। तो उसमें यूरोप क्या करेगा? क्या वह नाटो से बाहर जाएगा? अगर वह नाटो से बाहर जाएगा, तो यूरोप का जो पूरा सुरक्षा कवच है, वह खत्म हो जाएगा। रूस के सामने वह और बौना हो जाएगा। इसलिए यूरोप वह जोखिम नहीं उठा सकता। यूरोप की जो सैन्य क्षमता है, उनके पास तो सैनिक ही नहीं हैं। इन देशों ने अपने सैनिक कम कर दिए, रक्षा उत्पादन कम कर दिया क्योंकि उनके पास अमेरिका का सुरक्षा कवच था।
उन्होंने कहा, 'अब अगर वे कहते हैं कि अमेरिका ने यह कदम उठाया, तो निश्चित रूप से यह बहुत गलत होगा। हां, यह एक तरह से नाटो के अंत की शुरुआत हो जाएगी। कुछ शुरुआत अभी हो गई है, पर तब निश्चित तौर पर दरार पड़ जाएगी। लेकिन यूरोप इससे बच नहीं पाएगा। दिल में मलाल रहेगा, पर यूरोप को झुकना पड़ेगा क्योंकि यूरोप को सुरक्षा चाहिए।'
सवाल- EU के देश इस मुद्दे पर डेनमार्क के साथ एकजुट दिख रहे हैं। दूसरी तरफ फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों और इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी सीधे रूस से बातचीत शुरू करने की वकालत कर रही हैं। यह विवाद यूरोप को अमेरिका से कितना दूर कर सकता है?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि रूस के पास नहीं जाएंगे, लेकिन वे हकीकत को महसूस करेंगे। अगर अमेरिका से ये हालात हो रहे हैं और उधर रूस शक्तिशाली है, तो यूरोप को डर भी बहुत है। लेकिन अब यह होगा कि वे रूस से Working Relationship रखना चाहेंगे। लेकिन साथ ही साथ, इतनी जल्दी वे रूस के साथ रिश्ते नहीं बढ़ा पाएंगे। इस समय उन्होंने जो Commitments कर दिए हैं, सबसे पहले वे अपनी रक्षा क्षमता बढ़ा रहे हैं। अब उन्हें लगेगा कि अगर अमेरिका का समर्थन नहीं है, तो उन्हें इसे और बढ़ाना चाहिए। अगर वे अपने रक्षा खर्च बहुत ज्यादा बढ़ाएंगे, तो उनकी अर्थव्यवस्थाओं की हालत वैसे ही कुछ गड़बड़ है, तो उनका भट्ठा और बैठना शुरू हो जाएगा, यह एक बात है।
उन्होंने कहा कि दूसरी बात, उन्होंने बड़े Structural Changes किए हैं। यूक्रेन युद्ध से पहले जितनी रूसी गैस पाइपलाइन के जरिए जाती थी, उन पाइपलाइनों को बंद कर दिया गया। और उन्होंने बंदरगाहों पर अरबों डॉलर का निवेश किया है, ताकि समुद्री जहाजों द्वारा गैस आ सके। उन्होंने 30-40 बिलियन डॉलर का निवेश बंदरगाहों पर यह सोचते हुए किया कि आगे हम कभी रूस से गैस नहीं खरीदेंगे। तो उस निवेश का क्या होगा? या क्या वे रूस से वापस गैस खरीदना शुरू करेंगे?
विदेश मामलों के जानकार ने कहा, 'जिस तरह से उन्होंने अपना बर्ताव रखा है और यूक्रेन... इसमें एक और ब्रेक आएगा। वह यह कि यूरोप के जो कुछ देश हैं जो पुराने पश्चिमी यूरोप में थे, जैसे जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन इत्यादि। फिर जब सोवियत यूनियन बिखरा, तो कुछ देश नाटो में आए। जो कि वॉरशॉ पैक्ट के देश थे—जैसे पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, और बाद में लिथुआनिया, एस्टोनिया इत्यादि। अब ये सब कमोबेश नाटो और ईयू में हैं। लेकिन इनमें आपस में दरार है। ये जो सीमा पर स्थित देश हैं- पोलैंड, हंगरी, लिथुआनिया वाले, ये रूस से बहुत ज्यादा डरते हैं, खफा हैं और गुस्से में हैं। यूक्रेन को भी उसी श्रेणी में मानिए।'
उन्होंने कहा कि बाकी ईयू के देशों को कहते हैं कि तुम बहुत ढीले रहे, तुम रूस के साथ ज्यादा आक्रामक नहीं होते हो। पुतिन ऐसे ही बढ़ेगा, पुतिन का अगला लक्ष्य और ठिकाना यूरोप है। तो ईयू या नाटो के अंदर भी वह एक तनाव है, पूर्वी और पश्चिमी देशों के बीच। वह दरार और बढ़ेगी।
रोबिंदर सचदेव ने कहा, 'कुल मिलाकर, यूरोप इस समय बहुत ही गंभीर Geo-political Challenges की स्थिति में है और रहेगा। अभी जर्मन चांसलर की भी भारत यात्रा है और अगले हफ्ते ईयू समिट भी होनी है। मेरा यह मानना है कि यूरोप जिस हालात में है, उसे अब एक रणनीति बनानी चाहिए कि भारत Fourth Pole है। देखिए, उनके लिए एक पोल अमेरिका था, बिजनेस का भी, ट्रेड का भी और सिक्योरिटी भी है। एक पोल इनका था रूस, उससे इनका अच्छा खासा ट्रेड था और कच्चा माल आता था। और तीसरा पोल था चीन। इसको इन्होंने अपनी फैक्ट्री बना रखा था। इनकी फैक्ट्री वहां मैन्युफैक्चरिंग करती थी, तो आर्थिक तौर पर मामला ठीक चल रहा था। ये बेसिकली तीन पोल्स के बीच में खेल रहे थे। अब जो इनको समस्या हो रही है। अमेरिका वाला पोल डगमगा रहा है। रूस वाला पोल तो इनके खिलाफ ही चल दिया है। चीन से ये करना नहीं चाहते, करना भी चाहते हैं तो घबरा रहे हैं। कम्युनिज्म से डरते हैं।'
उन्होंने कहा कि अब उनके पास भारत ही एक विकल्प है, चौथे पोल के रूप में। तो मुझे लगता है कि यूरोप को भारत की तरफ ज्यादा देखना चाहिए क्योंकि यहां मार्केट भी है, टैलेंट भी है और वर्क फोर्स भी है। इस सारे देशों में डेमोग्राफी नीचे जा रही है। इन्हें वर्क फोर्स भी चाहिए। तो यूरोप अभी चैलेंजिंग स्थिति में है। अब उसके ऊपर जो ग्रीनलैंड का मुद्दा आ गया, तो यह तो केमिस्ट्री में केमिकल रिएक्शन के समय प्रयोग होने वाले Catalyst की तरह है, तो यह मुद्दा ऐसा ही Catalyst है जो यूरोप के लिए काफी कुछ सामने ला देगा।
सवाल- ट्रंप प्रशासन के कुछ अधिकारी इसे 1803 की 'लुइसियाना खरीद' की तरह देख रहे हैं, जबकि बाकी दुनिया इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और Right to Self-determination का उल्लंघन बता रही है। आपके हिसाब से कानूनी रूप से अमेरिका का पक्ष कितना कमजोर या मजबूत है?
जवाब- विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि कानूनी पक्ष कितना कमजोर है या मजबूत, यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि आज की दुनिया में जो कानून है, उसे वह परिभाषित कर रहा है जिसके पास शक्ति है। और ट्रंप ने अभी दो दिन पहले न्यूयॉर्क टाइम्स के इंटरव्यू में खुलेआम कह दिया कि मुझे जो नैतिकता सही या गलत दिखती है, मैं वही करूंगा। तो कानून तो आजकल दरकिनार हो गया है, संयुक्त राष्ट्र भी कहीं नजर नहीं आता। लेकिन हां, फिर भी ये सारे प्रश्न हैं।
उन्होंने कहा, 'अब अमेरिका के दिमाग में यह बात आ गई है। तो मुझे लगता है कि अभी नहीं तो एक साल, दो साल, तीन साल या 10 साल में यह शायद होगा। लेकिन ट्रंप इसे तत्काल करना चाहते हैं, अपने कार्यकाल में। क्योंकि वे खुद को महानतम राष्ट्रपति बनाना और बताना चाहते हैं। तो ऐसे में कोई देश खरीद तो सकता नहीं, जब तक कि दूसरा देश बेचने को तैयार न हो। जब अमेरिका ने अलास्का लिया, तो रूस बेचने को तैयार था। जब अमेरिका ने लुइसियाना लिया, तो फ्रांस ने बोला ठीक है, मेरे सिर से मुसीबत टले।'
रोबिंदर सचदेव ने कहा कि कुछ पैसों की कोई भी डील बन सकती है। अब यहां ग्रीनलैंड में मुद्दा यह है, खरीदने को तो अभी एक तरफ रखिए, सबसे पहली बात है वहां के लोगों के विचार। वे चाहते हैं कि नहीं चाहते? वैसे ग्रीनलैंड की जो स्थिति है, डेनमार्क साम्राज्य के तीन प्रांत हैं। उनमें से एक ग्रीनलैंड है। बाकी दो बड़े हैं और उनकी जनसंख्या ज्यादा है। लेकिन ग्रीनलैंड की कुल जनसंख्या मात्र 57-60 हजार है।
उन्होंने कहा, 'वहां की जो राजनीतिक पार्टियां हैं और ग्रीनलैंड के अंदर भी काफी समय से बार-बार यह आवाज उठी है कि हमें आजादी चाहिए। फिलहाल भी ग्रीनलैंड की स्थिति यह है कि वे अपना सारा प्रशासन खुद चला रहे हैं, उनकी स्थानीय सरकार है, उनके चुने हुए प्रतिनिधि हैं। लेकिन उनकी रक्षा, विदेश नीति और वित्त डेनमार्क के पास है। और हर साल डेनमार्क उन्हें करीब 600 मिलियन डॉलर देता है उनके म्युनिसिपल कार्यों के लिए- सड़क, सफाई, आदि के लिए। डेनमार्क हर साल 600 मिलियन डॉलर देता है, मानो वह उसका राज्य हो।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि लेकिन फिर भी बहुत समय से ग्रीनलैंड के काफी लोगों की यह मांग रही है कि अंततः हमें आजादी चाहिए। फिर यह मांग भी रही है कि हमें डेनमार्क से ज्यादा Autonomy चाहिए। तो 2009 में ग्रीनलैंड के अंदर एक जनमत संग्रह हुआ था। यह डेनमार्क ने ही कराया था, क्योंकि वह डेनमार्क का राज्य है। डेनमार्क ने कहा ठीक है, जनमत संग्रह कर लो कि लोग क्या चाहते हैं। तो उसमें यह तय हुआ था कि ग्रीनलैंड के लोगों के पास भविष्य में यह विकल्प रहेगा कि वे अपना भविष्य खुद तय करें। तो एक तरह से वह माहौल बना हुआ है, कानूनी तौर पर वह स्थिति है कि ग्रीनलैंड के लोग अपना भविष्य तय कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, 'अब वे किस रूप में करेंगे? जनमत संग्रह से करेंगे या चुनाव में कोई पार्टी आएगी जो बोलेगी कि मुझे आजादी चाहिए और अगर बहुमत आ गया तो वे आजाद हो गए। लेकिन साथ ही साथ ग्रीनलैंड के लोग अपनी खुद की पहचान भी रखना चाहते हैं। उनका डेनमार्क से भी यह कहना है कि हम यहां के मूल निवासी हैं, वही Identity Politics है।'
रोबिंदर सचदेव ने कहा कि अब इधर ट्रंप सरकार के यह भी विचार चल रहे हैं कि भाई 60 हजार लोग हैं। ग्रीनलैंड के हर नागरिक के लिए मैं एक लाख डॉलर की घोषणा कर दूं। तो 60 हजार गुना एक लाख, करीब 6 बिलियन डॉलर हुए। तो 6 बिलियन डॉलर अमेरिका के लिए कोई ज्यादा पैसा नहीं है। अब सवाल है कि वह प्रस्ताव कौन स्वीकार करेगा, कैसे करेगा, वह पूरी कहानी अलग है।
उन्होंने कहा कि अगर आप कहें खरीदना है। तो ग्रीनलैंड की कीमत तो कुछ भी हो सकती है, पता ही नहीं कि उसमें कितने Reserves हैं। वे खरबों डॉलर के हो सकते हैं, आप उसकी लोकेशन मान लीजिए, उसकी Geo-strategic कीमत मान लीजिए, तो वह खरबों में है। तो खरीदने की कोई बाजार कीमत तो है नहीं, पर वह कीमत अमेरिका दे नहीं सकता, और न देगा।
विदेश मामलों के जानकार ने कहा, 'अमेरिका इसी तरह का Mechanism बनाना चाहेगा। जिसमें कि उसको ग्रीनलैंड में कुछ पैसा डालना है। अमेरिका के लिए एक अवसर है, थोड़ी देर में जब वहां चुनाव होंगे। अभी शायद 2025 में चुनाव हुए थे, 2029 में फिर से ग्रीनलैंड में चुनाव हैं। वहां चार-पांच पार्टियां हैं। अमेरिका अच्छे से उनको अगले एक-दो साल में प्रोत्साहित कर सकता है, Propaganda कर सकता है, उनमें से एक-दो पार्टियों को पैसे दे सकता है कि तुम आजादी मांगो। और फिर तुम यह मांगो कि हम अमेरिका में विलय करेंगे। तो अगर वह पार्टी सत्ता में आ जाए तो वह पार्टी कहेगी कि हर नागरिक को एक-एक लाख डॉलर मिलेगा, अमेरिकन पासपोर्ट मिलेगा। हमें क्या चिंता है, हम अमेरिकन हो जाएंगे। तो यह समझाकर, अमेरिका यह आराम से कर सकता है, इसकी बहुत अधिक संभावना है। लेकिन ट्रंप इन सब चीजों को जल्दी करना चाह रहे हैं।'
सवाल- वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी सैन्य दखल के बाद ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की भाषा और ज्यादा आक्रामक हुई है। क्या आपको लगता है कि अमेरिका यहां Hard Power के इस्तेमाल की धमकी को एक बातचीत के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि यह केवल अभी नहीं है, यह ट्रंप के इस राष्ट्रपति कार्यकाल की शुरुआत से है। जब वे सत्ता में आए, तो उनके पास 920 पन्नों का एक दस्तावेज था। जिसे एक Conservative थिंक टैंक 'हेरिटेज फाउंडेशन' ने बनाया था। उसका नाम था 'प्रोजेक्ट 2025'। कि साल 2025 में अगर कोई रिपब्लिकन आता है, खासकर ट्रंप तो उसे क्या-क्या करना चाहिए। उस दस्तावेज में सारे विषयों पर Memos और ड्राफ्ट आदेश बने हुए हैं। कि इस मुद्दे को लेकर ऐसा आदेश जारी करो, उस मुद्दे को लेकर वैसा आदेश।
उन्होंने कहा, 'तभी से ट्रंप पहले दिन से ही, आप देखिए, धड़ाधड़ आदेश जारी किए जा रहे हैं। इमिग्रेशन पर कुछ, रक्षा में कुछ, शिक्षा में कुछ। अभी तो हम लोगों को इसका मात्र 10% भी पता नहीं है कि वे क्या-क्या आदेश जारी कर रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर घरेलू मुद्दों को लेकर भी हैं। वे पर्यावरण नियम हटा रहे हैं, तेल की ड्रिलिंग कहां हो सकती है, नेशनल पार्क कहां हो सकते हैं, स्कूली शिक्षा में क्या हो सकता है, Abortion पर क्या... वे धड़ाधड़ आदेश निकाल रहे हैं। क्योंकि वह सारा होमवर्क उनके पास तैयार पड़ा है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि यह तो एक बात हुई। और एक और बात है, अभी उनका पहला साल पूरा हो रहा है, तो वे जाहिर तौर पर अपने देश के सामने अपना एक रिपोर्ट कार्ड रखना चाहते हैं कि मैंने यह किया। लेकिन वे बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और अलग-अलग मोर्चों पर। और इसके चलते अमेरिका के अंदर जो उनका विपक्ष है, उसको बड़ी समस्या हो रही है। वे कितनी चीजों से जूझें? आज ट्रंप ने यह कर दिया, कल उसने सारे इंस्पेक्टर जनरल्स को, जो मंत्रालयों में ऑडिट करते थे, उन सबको नौकरी से निकाल दिया। उनके पास अधिकार नहीं है, यह अधिकार कांग्रेस का है। वह मामला निचली अदालत में गया, फिर ऊपरी अदालत में, फिर हायर कोर्ट में जा रहा है।
उन्होंने कहा कि वे टैरिफ लगा दे रहे हैं। सीमा की दीवार का क्या करना है। USAID बंद करनी है। DOGE भूल गए आप? एलन मस्क आए, लाखों अमेरिकी सरकारी कर्मचारियों को निकाल चुके हैं। तो वे धड़ाधड़ इस तरह की चीजें किए जा रहे हैं। तो विपक्ष को समस्या यह हो रही है कि इतना जबरदस्त हमला आ रहा है, किस चीज को कैसे संभालें। तो वह चल रहा है। और इसी तरह दुनिया में भी यही हो रहा है। दुनिया के नेता भी तभी परेशान हैं कि यह क्या कर रहे हैं, रोज कुछ न कुछ नया। तो बात यह है कि हमें अगले तीन साल तक इन चीजों के लिए तैयार रहना चाहिए। पिछले साल भर से ही, यह उनका काम करने का तरीका है।
सवाल- अगर डेनमार्क और ग्रीनलैंड अपने 'नॉट फॉर सेल' के रुख पर अड़े रहते हैं, तो आप किस तरह से उस इलाके में टेंशन को बढ़ते हुए देखते हैं? क्या व्यापार युद्ध या प्रतिबंधों की संभावना है? या फिर यूरोप और अमेरिका की सेनाएं आमने-सामने भी आ सकती है?
जवाब- विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि अंतिम स्थिति में मेरे ख्याल से यूरोप और अमेरिका की सेनाएं शायद आमने-सामने खड़ी नहीं होंगी। मुझे फिलहाल जो दिखता है। हम गलत भी हो सकते हैं, कुछ पता नहीं कि बात किस हद तक जाए। लेकिन फिलहाल वह नहीं दिखता। हां, लेकिन Extreme सोचें, जैसा आप कह रहे हैं, तो अमेरिका को ज्यादा लोग भी नहीं चाहिए। उनके पहले से ही वहां एक बेस में करीब 700 सैनिक हैं। वे 700 ही काफी हैं ग्रीनलैंड की राजधानी Nuuk पर कब्जा करके अमेरिकी झंडा लगाने के लिए। या 10 हेलीकॉप्टर भेजे, दो मालवाहक विमान भेजे, सामान भेजकर कल से बोले कि 'ग्रीनलैंड मेरा है'।
उन्होंने कहा, 'ट्रंप ने कहा भी है कि हम कठोर विकल्प भी अपना सकते हैं। तो सबसे कठोर तो यही हुआ। तो अगर उन्होंने सबसे कठोर कदम उठाया, तो ऐसे में,डेनमार्क की प्रधानमंत्री कह रही हैं कि हमारे सैनिक गोली चलाएंगे। हो सकता है। लेकिन वे कितनी गोलियां चलाएंगे। पर अगर वह हुआ तो मामला बहुत ही ज्यादा भयानक हो जाएगा, जो पहले से ही भयानक है।'
रोबिंदर सचदेव ने कहा कि वैसे जो बाकी नाटो के देश हैं, अब क्या फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड अपने युद्धपोत ग्रीनलैंड भेजेंगे और Nuuk में मौजूद अमेरिकी सेना पर मिसाइलें मारेंगे? मुझे इसकी संभावना कम लगती है। लेकिन मामला उतना ही गंभीर होगा। अगर वे कुछ नहीं कर पाएंगे तो यूरोप और हताश होगा। और हताश होकर वे अपने को Re-calculate करेंगे और जैसा आप कह रहे थे, वे रूस के प्रति अपनी नीतियां कुछ बदलेंगे। भारत के प्रति कुछ बदलेंगे। वही मैं कह रहा हूं कि तभी उन्हें इस समय अपनी रणनीति बनानी चाहिए जिसमें वे कहें कि 'हमारी रणनीतिक भागीदारी का चौथा पोल भारत है'।
सवाल- जैसा कि यूरोप और अमेरिका के रिश्तों में अब दरार पड़ती दिख रही है। तो क्या यूरोप, अमेरिका से इतना दूर जा सकता है कि वह NATO जैसा अपना नया सैन्य संगठन बनाने के लिए मजबूर हो जाए?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि निश्चित रूप से, वह बात तो पहले से चल रही है। मैक्रों कई बार कह चुके हैं, जर्मनी कई बार कह चुका है। नाटो से अलग या नाटो के अंदर ही। सब नाटो के देश हैं। ये मूल रूप से अपनी सेनाएं बढ़ाएं। अब उसको ये कुछ अलग नाम दे दें, एक समूह बनाकर, वह बात अलग है। लेकिन मैं एक चीज और कहना चाहता हूं जो अहम है, ट्रंप यूरोप से इतना नाखुश क्यों हैं? ग्रीनलैंड की बात छोड़िए, वह लेना चाहते हैं। लेकिन भौगोलिक तर्क से देखें तो मुझे भी अगर हो, तो मैं भी उसे अपनाना चाहूंगा। उस देश के लिए बहुत फायदा है।
उन्होंने कहा, 'ट्रंप यूरोपीय सरकारों से किस तरह बात करते हैं। उनका मजाक उड़ाते हैं। JD Vance जर्मनी में जाकर, चुनाव के कुछ ही हफ्तों बाद, बर्लिन में भाषण देते हैं और कहते हैं कि आपकी सरकारें कुछ काम नहीं कर रहीं और जर्मनी की जो Far Right पार्टी है, वे कहते हैं कि वह पार्टी सही है क्योंकि वह राष्ट्रवाद की बात करती है, Anti-immigration की बात करती है। अभी एक महीने पहले अमेरिका का National Security Doctrine निकला है, मात्र 30 पन्नों का। उसमें उन्होंने कहा है कि यूरोप Civilizational Erasure का सामना कर रहा है। यानी कि आपकी सभ्यता मिटने की कगार पर आ गई है। वह सब चीजें हैं।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि अमेरिका के MAGA वालों की बुनियादी समस्या यह है, वे यूरोप को एक उदारवादी झुकाव वाले समाज और सरकारों के रूप में देखते हैं। उदारवादी, कल्याणकारी और समाजवादी, सेंटर-लेफ्ट किस्म की चीजें। और इनको अब वह Philosophy बिल्कुल पसंद नहीं है। MAGA वालों का यह कहना है कि यूरोप इन उदारवादी विचारों का निर्यात करता है। और अब हमें अमेरिका में ऐसे उदारवादी विचार नहीं चाहिए। तो इसलिए यूरोप सुधरे, अपनी विचारधारा बदले, अपना रवैया बदले। क्योंकि यूरोप जिस हाल में फिलहाल है, यह हमारे लिए अच्छा नहीं है। क्योंकि इनके जो विचार हैं, उदारवादी विचार... और यूरोप-अमेरिका के तो रिश्ते रहे हैं, यूरोपियन ही तो आकर अमेरिका में बसे, यूरोपियन ने ही तो अमेरिका बनाया। लेकिन उनका मानना है कि अब हमें इन विचारों को स्वीकार नहीं करना है।
उन्होंने माना कि तो इसलिए यूरोप के प्रति ट्रंप, उनकी सरकार, MAGA और अमेरिका का जो दक्षिणपंथ है, वे यूरोप को लेकर बहुत ज्यादा सहानुभूति नहीं रखते। वे उसे नजरअंदाज कर रहे हैं या यूरोप जो भी कह रहा है उसे अहमियत नहीं दे रहे क्योंकि उनका मानना है कि नहीं, यूरोप को तो हमें ऐसे ही Deal करना है। हमें यूरोप की जरूरत है लेकिन हमें यूरोप को बदलना है। और इसके चलते उनका प्रयास यह भी है कि यूरोप के अंदर जो सरकारें हैं, वे जितनी ज्यादा हो सके Populist, राष्ट्रवादी और पूरी तरह Anti-immigration हों।
सवाल- जैसा कि कहा जा रहा है कि ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स का खजाना है, तो क्या अमेरिका उसपर कब्जा करके इकॉनमी में बहुत आगे निकल जाएगा, वो उसके लिए ज्यादा अच्छा है या यूरोप से संबंध खराब करना उसके लिए ज्यादा नुकसानदायक साबित होगा?
जवाब- विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि मुझे लगता है सबसे पहले तो ये जो रेयर अर्थ मिनरल्स और Critical Elements हैं, वे ग्रीनलैंड में बहुत हैं, पर पहले तो यह पक्का पता नहीं कि कितने हैं, पर हैं बहुत। और इनको निकालने का कितना खर्चा है, वह भी पता नहीं, और उनमें से कई आर्थिक रूप से Viable नहीं भी हो सकते। लेकिन हो भी सकते हैं। पर मानिए कि कुल मिलाकर बहुत फायदा है।
उन्होंने कहा, 'अब आप कह रहे हैं कि उसको तराजू में तोलो कि उसका लाभ बनाम यूरोप से रिश्ते बिगाड़ने का नुकसान। अमेरिका यह सोचता है कि यूरोप के पास कोई चारा नहीं है। उसको लगता है कि किसी के पास मेरे से डील करने का कोई और विकल्प नहीं है। तो मैं चाहे जो भी करूं, ये जितना रोएं, धोएं, चिल्लाएं, पर अंत में ये मेरे साथ ही चलेंगे। उसे यह लगता है।'
सवाल- ट्रंप की नीतियों की वजह से यूरोप और अमेरिका के बीच में जो खटास आ रही है उसे देखकर चीन और रूस क्यों मुस्कुरा रहे हैं? और क्या भारत के लिए भी इन परिस्थितियों में फायदा उठाने का कोई मौका है?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि रूस और चीन फायदा उठा सकते हैं। रूस तो पहले से ही उठा रहा है, रूस तो पहले से ही कर रहा है। केवल यह होगा कि भाई अब उसके पास कहने को हो जाएगा कि, देखो दुनिया में ऐसा होता है, अंतरराष्ट्रीय कानून यह है। जब और भी कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं। तो यूक्रेन के खिलाफ जो तर्क हैं, उनको लेकर रूस कह सकता है ना, कि यह तो मेरे Backyard में है। और यहां पर यह हो रहा था इसलिए मैंने जाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित की है। जो अमेरिका भी वही कर रहा है। और रूस तो पहले से ही उस राह पर चल रहा है, तो रूस के रवैये में कोई नयापन नहीं आ सकता। पुतिन पहले से वही कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, 'चीन के मामले में आ सकता है। वैश्विक कूटनीति में कि यह तो हमारा क्षेत्र है। वह अपने Western Hemisphere को अपना कहता है। तो चीन भी कह सकता है ना कि यह क्षेत्र मेरे पड़ोस में है और यहां पर ताइवान तो मेरा ही अपना अंग है, तो मैं वह करूंगा। और चीन जो करना चाहे, या करे या ना करे कह नहीं सकते, लेकिन जब वह करता है, तो उसके पास अब यह कहने का तर्क है। न भी करे तो उसके पास अब यह कहने को है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि भारत के पास इस समय मौका यह है, मैं बार-बार दोहराता हूं जो मुझे लगता है, हां कि यूरोप को इस समय जरूरत है। हमें भी जरूरत है, बिल्कुल हर चीज में दोनों की जरूरत होती है और साझेदारी होती है, तभी आगे चीजें बनती हैं। तो यूरोप को जो एहसास होना चाहिए मेरे ख्याल से, जो इस चीज में मदद करेगा, वही मैं कह रहा हूं कि यूरोप की नीति अब उनके विदेश नीति हलकों में यह होनी चाहिए कि भारत हमारे लिए Fourth Pole है। भारत के साथ हमें बहुत ज्यादा चीजों के लिए जुड़ना चाहिए। बाजार तो है ही, उसे छोड़िए। उसके अलावा व्यापार है, बेशक वह भी है।
मतलब भारत के अंदर उनकी कंपनियों के लिए बाजार है, दोनों के बीच व्यापार है। लेकिन उसके अलावा जो मैं एक और बात कह रहा हूं मानव संसाधन। यहां उनकी मैनपावर बुरी तरह गिर रही है। उसके लिए उन्हें भारतीय मैनपावर की, जैसे जर्मनी के चांसलर आए हुए हैं, इस मामले में हेल्थ केयर या पैरामेडिकल वर्कर्स की प्रतिभा की जरूरत है। तो वह सब है। लेकिन यूरोप को अपनी भागीदारी के चौथे पोल के रूप में भारत को देखना चाहिए। उसके अलावा तो ठीक है बाकी जो-जो करना है हर एक देश अपना करे, लेकिन इस नीति पर चले।
उन्होंने कहा कि उदाहरण के लिए मंगोलिया। वह भारत को कहता है, My third neighbor, क्योंकि चीन उसका एक पड़ोसी है, उसके बाद बोलता है कि 'मेरा दूसरा पड़ोसी' रूस, इस तरह से भारत तीसरा पड़ोसी। तो भू-राजनीति में इस तरह के Paradigms होते हैं कई बार। तो हमें वह Paradigms यूरोप को समझाना चाहिए, दरअसल यूरोप को खुद समझना चाहिए। तो हम जो अभी आपसे बात कर रहे हैं, मेरा यही प्रयास है कि यह तर्क यूरोपीय नेताओं तक पहुंचे और वे इस रणनीति को अपनाएं क्योंकि मुझे लगता है यह उनके लिए बहुत अच्छी होगी और हमारे लिए भी बहुत अच्छी होगी।
सवाल- ट्रंप इतनी बड़ी उथल-पुथल करके करना क्या चाहते हैं और उनका फाइनल गोल क्या समझ में आता है? दुनिया के बाकी देशों के पास इससे निपटने का क्या रास्ता है?
जवाब- विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि ट्रंप उथल-पुथल करना चाहते हैं, वे अपने हिसाब से अमेरिका को बनाना चाहते हैं। उनको यह भी लगता है कि अमेरिका को ये चीजें अभी करनी चाहिए, जो वे कर रहे हैं। और अगर अमेरिका ने ये चीजें अभी नहीं कीं, तो अमेरिका का जो Global Dominance) है, वह हमेशा के लिए डूबता जाएगा। तो उनका पूरा प्रयास इस समय यही है।
उन्होंने कहा कि अब देशों को क्या करना चाहिए? मुझे लगता है देशों के लिए कई रास्ते हैं, हर कोई अपना-अपना हित देख रहा है, इस समय एक नया 'वर्ल्ड मैट्रिक्स' बन रहा है। जिसमें देश अपनी साझेदारी और हर चीज का Re-calculation कर रहे हैं। और देशों को सक्रिय रूप से नए साझेदार और Creative Diplomacy करनी चाहिए। रचनात्मक तरीके, रचनात्मक साझेदारियां करनी चाहिए। भारत को खासकर, बेशक हमें भी ये सब चीजें करनी चाहिए। साझेदार बनाएं और अलग-अलग जैसे भी हम देखें। नैरेटिव बनाने चाहिए। देखिए दुनिया का आधा खेल इस समय, आधा नहीं तो कुछ हिस्सा Opto-politics है। आप क्या Optics बनाकर चल रहे हैं।
रोबिंदर सचदेव ने कहा, तभी मैं कह रहा हूं जैसे अगर यूरोप यह धारणा बनाए कि भारत मेरा चौथा पोल ध्रुव है, तो उस Optics के अंतर्गत बड़ी चीजें आ जाती हैं। अभी जो हमारा यह एशिया पैसिफिक था, इसको कागजों में नाम बदलकर 'इंडो-पैसिफिक' कर दिया गया, वैसे यह अमेरिका ने ही किया था। तो उससे देखिए मानसिकता बदलती है। तो चीजों को परिभाषित करना कई बार बहुत अहम हो जाता है।'
उन्होंने कहा कि भारत काफी चीजें कर रहा है, अपनी कूटनीति में करेगा, हर देश करेगा। मैं पब्लिक डिप्लोमेसी में काफी काम करता हूं तो मुझे लगता है पब्लिक डिप्लोमेसी की बहुत गुंजाइश होती है People to people रिलेशनशिप में। जब लोग मिलते हैं, तभी विचार बनते हैं, तभी बिजनेस या काफी चीजें बनती हैं। तो पब्लिक डिप्लोमेसी पर बहुत ज्यादा जोर होना चाहिए। क्योंकि देखिए आपकी जो सरकार है, और खासकर भारत सरकार, हमारे विदेश मंत्रालय में मात्र एक हजार राजनयिक हैं। अब शायद एक हजार या 1,200 होंगे। चीन के पास 7 हजार हैं। अमेरिका के पास 15 हजार थे, पर मस्क ने आकर काफी कम कर दिए। तो हमारे राजनयिक काफी कुछ कर सकते हैं, पर सब कुछ इतना ज्यादा नहीं भी कर सकते। तो People to people संपर्क पर बहुत जोर होना चाहिए।
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि भारत के हिसाब से मैं कहूं तो भाषा पर जोर होना चाहिए। आप उन देशों के साथ बिजनेस में काम ज्यादा तभी कर पाएंगे, जब आपके पास थोड़ी भाषा की भी सहूलियत होगी। तो भारत के अंदर जर्मन, फ्रेंच, चाइनीज, कोरियन, जैपनीज, रशियन यह सब सिखानी चाहिए।
उन्होंने कहा, 'भारत के लिए मेरे हिसाब से एक सबसे अहम चीज है आज की तारीख में, मुझे तो लगता है भारत को इस समय एक Geo-political emergency घोषित कर देनी चाहिए। जिसमें यह हो कि अगले एक साल के लिए हमारी सरकार और प्राइवेट सेक्टर हफ्ते में 6 दिन काम करेंगे। अभी हम 5 दिन काम करते हैं। इसका तर्क मेरा यह है कि अगर हम अपना Work Week 6 दिन का कर देंगे, तो हमारी जीडीपी, सैद्धांतिक रूप से और यह कमोबेश एक मजबूत विश्लेषण है 2% बढ़ेगी।'
तो हम जो यह कहते हैं कि दुनिया में हम यह करेंगे, वो करेंगे, यह वक्त आ गया है भारत के लिए, हम सबके लिए मुझे लगता है मेहनत करने का। अपने देश का एक चरित्र मजबूत बनाकर दुनिया को भी दिखाओ, काम करो। आपके जापान, कोरिया, ताइवान, ये 'एशियन टाइगर' ऐसे ही नहीं बन गए। मैं यह भी समझता हूं कि हां, इस 6 दिन के वर्क वीक में काफी मुद्दे हैं, चुनौतियां हैं। तो मैं कहता हूं इस पर राष्ट्रीय बहस हो। मैं समझता हूं मानसिक स्वास्थ्य का मामला होगा, तनाव होगा, लोग थकते भी हैं। और फिर यह भी होगा कि काम ज्यादा किया, कमा तो रहा है आपका कॉर्पोरेट। उसमें कुछ बोनस प्लान किया जाए। चीजें प्लान की जा सकती हैं। लेकिन मुझे लगता है यह राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। क्योंकि अभूतपूर्व समय में अभूतपूर्व कदम भी उठाने चाहिए, वही नेतृत्व होता है।