Venezuela US Tensions: दुनिया, नए टकराव की दहलीज फिर आ खड़ी हुई है। यूक्रेन-रूस जंग के बीच अब वेनेजुएला और अमेरिका आमने-सामने खड़े दिख रहे हैं। सवाल है कि आखिर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को डोनाल्ड ट्रंप पसंद क्यों नहीं करते हैं? क्या ये लड़ाई सिर्फ विचारधारा की है या इसके पीछे तेल, ड्रग और घुसपैठियों को एंगल भी है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए INDIA TV ने विदेश मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव से की एक्सक्लूसिव बातचीत, जिसमें उन्होंने अमेरिका और वेनेजुएला अदावत की पूरी जियोपॉलिटिकल कहानी परत-दर-परत खोल दी।
सवाल- वेनेजुएला और अमेरिका में दुश्मनी क्यों है, मादुरो से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्यों चिढ़ते हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि सबसे अहम मसला तो ये है कि मादुरो लेफ्टिस्ट हैं, सोशलिस्ट हैं, उनकी सोशलिज्म की विचारधारा है। वो चीन से अच्छी फ्रेंडशिप रखते हैं। इधर डोनाल्ड ट्रंप राइट कंजरवेटिव हैं, जो पॉलिटिकली दूसरे साइड में हो गया स्पेक्ट्रम के। सबसे पहला तो दोनों में आइडियोलॉजिकल और फिलॉसॉफिकल डिफरेंस हैं। दूसरी बात हैं कि ट्रंप शासन के दौरान और ट्रंप से पहले भी वेनेजुएला एंटी-अमेरिकन रहा है। वेनेजुएला कहता है कि अमेरिका इम्पीरियलिस्ट है और हम इम्पीरियलिज्म के सामने नहीं झुकेंगे।
उन्होंने कहा, 'पिछले 25 साल से वेनेजुएला में जो सरकारें रही हैं, पहले Hugo Chávez और फिर मादुरो, इनका एंटी-अमेरिकन व्यू रहता है। इन्होंने अमेरिकन कंपनीज को वेनेजुएला से निकाल भी दिया। हालांकि, एक अमेरिकन कंपनी जो ऑयल की है CHEVRON, वो अभी भी वेनेजुएला में तेल का बिजनेस कर रही है। लेकिन सबसे बड़ा मसला पॉलिटिकल और जियोपॉलिटिकल है, क्योंकि अमेरिका कहता है कि ये जो लैटिन अमेरिका है ये मेरा बैकयार्ड है। और इसमें मैं कोई लेफ्टिस्ट सरकार, सोशलिस्ट सरकार या चीन का इंटरवेंशन नहीं होने दूंगा। ट्रंप के शासन में अमेरिका अब इस मूड में आया हुआ है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि इन सबके अलावा सबसे बड़ा जो फैक्टर है वो है तेल। वेनेजुएला दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल रिजर्व है। वेनेजुएला के पास जो तेल है वो रूस, सऊदी अरब और अमेरिका से भी ज्यादा है। लेकिन उस तेल का प्रोडक्शन वेनेजुएला इतना नहीं कर पाता है। तेल का ज्यादा प्रोडक्शन सऊदी अरब, रूस और अमेरिका ही करते हैं। लेकिन वेनेजुएला के पास जो ऑयल रिजर्व्स हैं वो सबसे बड़े हैं, इसलिए अमेरिका का वहां बहुत इंटरेस्ट है।
उन्होंने आगे कहा, 'अमेरिका चाहता है कि वेनेजुएला में ऐसी सरकार हो जो उनके फेवरेबल हो, जिससे वह वहां पर तेल का बिजनेस कर सकें। वेनेजुएला का ऑयल एक्सप्लॉइट कर पाएं।'
सवाल- जब सऊदी अरब जैसे देश ऑयल इकॉनमी से खुद को शिफ्ट कर रहे हैं, तो अमेरिका के लिए तेल इतना अहम क्यों है, वेनेजुएला से पहले उसने तेल के लिए किन-किन देशों में हस्तक्षेप किया?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि वैसे देखें तो अमेरिका का ट्रैक रिकॉर्ड है, इन्होंने तेल के लिए ही 1953 में ईरान में तख्तापलट करवाया था। वहां की डेमोक्रेटिकली इलेक्टेड सरकार को हटा करके मोहम्मद रजा पहलवी को बैठा दिया था। ऐसा ही इराक में हुआ। इराक में जो अटैक हुआ ये कहकर कि Weapon Of Mass Destruction, सद्दाम हुसैन के पास वो कुछ थे लेकिन बॉटम लाइन ऑयल ही था।
उन्होंने कहा, 'मिडिल ईस्ट में जो भी रिश्ते हैं, पार्टनरशिप्स हैं अमेरिका की, सब ऑयल पर बेस्ड हैं। उन्होंने सऊदी अरब में चाहे तख्तापलट नहीं करवाया लेकिन सऊदी अरब में उसकी वो रॉयल्टी को सपोर्ट करते हैं। तो अमेरिका, ऑयल को लेकर डेफिनेटली दुनिया में सरकारें गिराता है, तख्तापलट करता है, ऐसा लीबिया में भी हुआ था। इन्होंने गद्दाफी को जो हटाया, पहले तो उससे डील कर ली थी कि न्यूक्लियर गिव अप कर दे। और फिर बाद में अलग-अलग रीजन्स देकर गद्दाफी को हटाया गया। तो अमेरिका बहुत लंबे समय से अलग-अलग जगहों पर सरकारें बदलवाने में शामिल रहा है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि वेनेजुएला के साथ अमेरिका और ट्रंप का एक और शिकवा है। उनका ये कहना है कि वेनेजुएला ड्रग्स एक्सपोर्ट करता है और अलाउ करता है ड्रग कार्टेल्स को अमेरिका में स्मगल करने के लिए। खासकर Fentanyl और कोकीन। लेकिन असलियत ये है कि वेनेजुएला से जितना ड्रग्स जाता है वो इतना ज्यादा नहीं है। वेनेजुएला के ड्रग गैंग्स वगैरह जो हैं उनका करीब 10 परसेंट ही बिजनेस है। अमेरिका को जो सप्लाई होती है, बाकी सप्लाई तो और देशों से भी आती है।
उन्होंने आगे कहा, 'दूसरा मुद्दा है इलीगल इमिग्रेशन का। अमेरिका का आरोप है कि वेनेजुएला से इलीगल इमिग्रेंट्स आते हैं और उनके साथ कुछ गैंग्स आते हैं, क्रिमिनल गैंग्स आते हैं जो कि अमेरिका में आकर क्राइम की सिचुएशन को बढ़ावा देते हैं। अब अमेरिका का कहना है कि उसके देश में ड्रग्स आ रहे हैं और हमको ड्रग्स को खत्म करना है। वेनेजुएला से क्रिमिनल गैंग्स खत्म करना है। इन्हें रोकने के लिए अमेरिका जो चाहता है वो वेनेजुएला नहीं कर रहा है।'
सवाल- जब पहले से यूरोप में रूस और यूक्रेन लगभग चार साल से लड़ रहे हैं तो अमेरिका कैरेबियन सी में नया फ्रंट क्यों खोलना चाह रहा है, अगर लड़ाई होती है तो अमेरिका के खिलाफ वेनेजुएला का कौन-कौन से देश साथ दे सकते हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि दुनिया भर में कॉन्फ्लिक्ट्स हो रहे हैं, बड़े और वायलेंट कॉन्फ्लिक्ट्स हो रहे हैं। इनमें से कई में अमेरिका का रोल है। यहां पर युद्ध हुआ तो कैरिबियन सी में माहौल टेंस हो जाएगा। फिर वहां पर इस रीजन में कुछ और सरकारें हैं जो ट्रंप के खिलाफ कहें या एंटी-अमेरिका हैं, जो अमेरिका को इम्पीरियलिस्ट देखती हैं, जैसे कि क्यूबा भी है। अब वेनेजुएला के ऊपर अटैक करके अमेरिका का एक और प्रयास है क्योंकि क्यूबा का काफी तेल वेनेजुएला से आता था।
उन्होंने आगे कहा, 'इस समय क्यूबा पर प्रेशर हो रहा है इंटरनली क्योंकि ऑयल की सप्लाई उसकी गड़बड़ हो गई है। उनकी तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। तो क्यूबा की इकॉनमी पर प्रेशर आ रहा है तो अमेरिका का प्रयास होगा और उसकी इच्छा भी है कि क्यूबा में रेजीम चेंज हो जाए। जैसे कि वो इधर वेनेजुएला में भी करना चाह रहा है, मादुरो को हटाना चाह रहा है।'
विदेश मामलों के जानकार ने कहा कि वेनेजुएला के साथ कौन-कौन खड़े होंगे की बात करें तो बॉटम लाइन ये है कि उसके साथ कोई नहीं होगा, मीनिंगफुल तरीके से सोचें। वेनेजुएला के जो साथ खड़े होंगे, उसमें रूस होगा, लेकिन रूस क्या करेगा, डिप्लोमैटिकली बस स्टेटमेंट्स ही देगा। वो कहेगा कि ये गलत हो रहा है लेकिन रूस अपनी फोर्सेज या अपनी सबमरीन्स वेनेजुएला के लिए नहीं भेजेगा। लेकिन हां अगर मादुरो को कुछ वेपन्स वगैरह चाहिए हों तो रूस शायद सप्लाई कर सकता है। चीन पर उन्होंने कहा कि वेनेजुएला के साथ जो दूसरा साथ खड़ा हो सकता है, वो चीन है। लेकिन चीन भी कोई मिलिट्री कमिटमेंट तो करेगा नहीं सिक्योरिटी का, तो वेनेज़ुएला को अकेले ही ये जंग लड़नी पड़ेगी।
सवाल- अभी तो अमेरिका और वेनेजुएला की दुश्मनी है, लेकिन क्या कभी इन दोनों के संबंध मीठे भी रहे हैं?
जवाब- रोबिंदर सचदेव ने कहा कि हां उनके संबंध अच्छे भी रहे हैं। मेरे ख्याल से 1980 से करीब 2000 तक या एक पीरियड था बीच में जब इनके रिश्ते ठीक थे। आई एम नॉट वैरी श्योर बट आई थिंक 80s में या 90s में थे। मेरे ख्याल से बीच में भी रहे हैं। लेकिन जब Hugo Chávez 1998 में आए थे तो उन्होंने वेनेजुएला और अमेरिका के रिश्तों को डेफिनेटली चैलेंज किया क्योंकि वो बहुत ही स्ट्रांग सोशलिस्ट लीडर थे, रिवोल्यूशनरी टाइप थे और अमेरिका के वो सख्त खिलाफ थे। और उसके बाद 2013 में उनकी डेथ हुई तो फिर मादुरो आए। तब से अभी तक मादुरो चल रहे हैं। मादुरो उन्हीं के फॉलोअर हैं।
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