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Explainer: झारखंड में 'गजराज' का कहर: 5 साल में 474 मौतें; आखिर क्यों नहीं थम रहा मानव-हाथी संघर्ष?

 Edited By: Niraj Kumar
 Published : Feb 15, 2026 02:55 pm IST,  Updated : Feb 15, 2026 02:55 pm IST

झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष एक बड़ा मानवीय और पर्यावरणीय संकट बन चुका है। 2019-20 से अब तक 474 मौतों का आंकड़ा सामने आ चुका है। आइये जानते हैं आखिर क्यों नहीं थम रहा मानव-हाथी संघर्ष?

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हाथी Image Source : PTI

झारखंड के रिहायशी इलाकों में हाथियों के हमले दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। मृतकों की तादाद भी बढ़ती जा रही है। हालात ये है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाथियों के हमले की घटनाओं में बढ़ते मौत के मामलों पर चिंता जताई है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कुछ ऐसी प्रणाली विकसित करें जिससे मानव-हाथी के टकराव को रोका जा सके। मुख्यमंत्री सोरेन ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में राज्य के कई जिलों में हाथियों के हमले में लगभग 27 लोगों की मौत हुई है, जो ''गंभीर चिंता का विषय'' है। शुक्रवार को हजारीबाग जिले के एक गांव में जंगली हाथियों के झुंड के हमले में एक ही परिवार के चार सदस्यों सहित सात लोगों की मौत हो गई थी। जिसके बाद सोरेन ने शनिवार को वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 5 साल में झारखंड में 474 लोगों की मौत हाथियों के हमले में हो चुकी है। यहां हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर मानव-हाथी संघर्ष क्यों नहीं थम रहा है?

संघर्ष बढ़ने के प्रमुख कारण 

हाथियों का आबादी के इलाकों में दाखिल होने की सबसे बड़ी वजह है प्राकृतिक आवास का विनाश होना है। खासतौर पर जंगली इलाकों में खनन और शहरीकरण के चलते हाथियों के लिए जंगल छोटे पड़ते जा रहे हैं।  वहीं हाथी आवागमन के लिए पारंपरिक रास्ते अपनाते हैं। जिन्हें हम एलिफेंड कॉरिडोर कहते हैं। इन कॉरिडोर पर सड़कें, रेलवे लाइन और बस्तियां बन गई हैं, जिससे हाथी भटककर गांवों में घुस रहे हैं।

वहीं जंगलों के सिमटने से हाथियों के लिए भोजन और पानी की समस्या पैदा हो जाती है। जंगलों में बांस और अन्य चारे की कमी के कारण हाथी खेतों की ओर आते हैं और फिर भोजन की रिहायशी इलाकों पर भी हमला कर देते हैं। वहीं हाथियों में अब इंसानों के प्रति आक्रामकता बढ़ी है, खासतौर पर तब जब उन्हें टॉर्च या पटाखों से डराकर भगाने की कोशिश की जाती है।

सरकार और प्रशासन के प्रयास

झारखंड में सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है, लेकिन वे नाकाफी साबित हो रहे हैं। इससे प्रशासन की चिंताएं बढ़ गई हैं। सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की राशि बढ़ाई है। हाथियों के हमले से बचाव के लिए गांव के चारों ओर गहरी खाइयां भी खोदी जा रही हैं ताकि हाथियों का झुंड आसानी से गांव में दाखिल नहीं हो सके। 

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Image Source : FREEPIKहाथियों का झुंड

इसके साथ ही ग्रामीणों को अलर्ट करने और हाथियों को भगाने के लिए विशेष टीमों का गठन किया गया है। वहीं तकनीकों का सहारा लेकर हाथियों की ट्रैकिंग भी की जा रही है। अर्ली वार्निंग सिस्टम का सहारा लेकर रेडियो कॉलरिंग और सायरन के जरिए हाथियों की लोकेशन ट्रैक की जा रही है।

समाधान की राह

दरअसल, हाथियों के पारंपरिक रास्ते में आए अवरोधों और अतिक्रमण को दूर करना सबसे ज्यादा जरूरी है। एलफैंट कॉरिडोर बहाल होने से हाथी अपने पारंपरिक रास्तों को अपनाएंगे और रिहायशी इलाकों की ओर नहीं जा पाएंगे। साथ ही जंगल के आसपास के लोगों को अपने फसल पैटर्न में बदलाव लाना होगा। यानी ऐसे अनाज उगाए जाएं जिसे हाथी पसंद नहीं करते हैं। जैसे मिर्च या नींबू की खेती बाउंड्री पर करना। साथ ही लोगों में यह जागरुकता भी पैदा करनी होगी कि हाथी के सामने आने पर आक्रामक होने के बजाय सुरक्षित दूरी कैसे बनाएं। इसके लिए लोगों को ट्रेनिंग देनी होगा।

एलिफैंड कॉरिडोर का मानचित्रण

बता दें कि हजारीबाग की घटना से आहत मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शनिवार को वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को राज्य के सभी हाथी एलिफैंड कॉरिडोर का मानचित्रण करने का निर्देश दिया तथा प्रभावित क्षेत्रों के ग्रामीणों को विशेष तकनीकी प्रशिक्षण देने को कहा। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित लोगों को हाथी बचाव दल में भी शामिल किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति की हाथी के हमले में मृत्यु हो जाती है तो मृतक के परिवार को घटना के 12 दिनों के भीतर पूरी मुआवजा राशि मिल जानी चाहिए। 

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Image Source : FREEPIKहाथी

सीएम सोरेन ने अधिकारियों को पिछले पांच वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष में हुई मौत और वितरित मुआवजे की पूरी जानकारी राज्य सरकार को सौंपने का निर्देश दिया। वन अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि वे हाथियों के बचाव के लिए त्वरित और जिम्मेवार तंत्र पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जंगली हाथियों को भगाने या पकड़ने के लिए छह 'कुमकी' (प्रशिक्षित) हाथी झारखंड लाए जा रहे हैं। अधिकारियों ने हजारीबाग की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि पांच हाथियों का यह झुंड बेहद आक्रामक है। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में वित्त वर्ष 2019-20 से अब तक मानव-हाथी संघर्ष में 474 लोगों की जान जा चुकी है। 

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