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248 साल में लगाता है सूर्य का चक्कर, 18 फरवरी 1930 को हुई थी खोज; दिलचस्प है इसके नामकरण का किस्सा

 Published : Feb 17, 2026 09:00 pm IST,  Updated : Feb 17, 2026 09:00 pm IST

18 फरवरी 1930 को अमेरिकी वैज्ञानिक क्लाइड टॉमबा ने एक बौने ग्रह की खोज की थी। पहले इसे ग्रह मान लिया गया था, लेकिन बाद में इसे ग्रहों के परिवार से बाहर कर दिया गया। इस ग्रह के नामकरण का किस्सा बेहद रोचक है।

अंतरिक्ष की तस्वीर- India TV Hindi
अंतरिक्ष की तस्वीर Image Source : AP

नई दिल्ली: हर दिन कुछ नया खोजने और अनोखी चीजों की तलाश में रहने वाले उत्सुक लोगों की दुनिया में कभी कमी नहीं रही। ऐसे ही जिज्ञासु व्यक्तियों में से एक थे अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबॉ। 18 फरवरी 1930 को उन्होंने एक ऐसी खोज की, जिसने पूरे ब्रह्मांड की समझ को बदल दिया। उन्होंने एक नए आकाशीय पिंड की खोज की, जिसे शुरू में 9वां ग्रह मान लिया गया। यह खोज लोवेल वेधशाला में की गई थी, जहां टॉमबॉ ने कई महीनों तक आकाश की तस्वीरों की तुलना करके इस रहस्यमयी वस्तु का पता लगाया। उस समय तक सौर मंडल में 8 ग्रह ही ज्ञात थे। 

शुरू में 'प्लैनेट एक्स' के नाम जाना गया प्लूटो

वैज्ञानिकों को लगता था कि नेप्च्यून के परे भी कोई बड़ा ग्रह हो सकता है, जिसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से नेप्च्यून की कक्षा में कुछ असामान्य गड़बड़ी दिख रही थी। इसी खोज की तलाश में क्लाइड टॉमबॉ ने उस नए पिंड को खोज निकाला। शुरू में इसे 'प्लैनेट एक्स' के नाम से जाना गया और फिर 1930 में आधिकारिक तौर पर 9वें ग्रह के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इस नए ग्रह का नाम तय करने के लिए दुनिया भर से सुझाव मांगे गए। हजारों नामों के प्रस्ताव आए, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित और अंत में चुना गया नाम एक 11 वर्षीय ब्रिटिश लड़की वेनेशिया बर्नी का सुझाव था। उस समय वह इंग्लैंड में स्कूल में पढ़ रही थी। 

नाम के पीछे का तर्क

वेनेशिया ने सुझाव दिया कि इस ग्रह का नाम 'प्लूटो' रखा जाए। उसका तर्क बहुत सरल लेकिन गहरा था। रोमन पौराणिक कथाओं में प्लूटो अंधेरे के देवता का नाम है। चूंकि यह ग्रह सूर्य से इतनी दूर है कि वहां हमेशा गहरा अंधेरा और ठंड रहती है, इसलिए यह नाम इसके लिए एकदम सटीक लगता है। उसके इस सुझाव को खगोलविदों ने पसंद किया और 1930 में ही आधिकारिक रूप से ग्रह का नाम प्लूटो रख दिया गया।

ग्रह होने पर खड़े हुए सवाल

प्लूटो की खोज के कई दशकों तक इसे सौर मंडल का 9वां ग्रह माना जाता रहा। लेकिन 21वीं सदी की शुरुआत में नई खोजों ने इसकी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए। 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने ग्रह की नई परिभाषा तय की। इसके अनुसार, एक ग्रह को तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं। वह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाए, अपनी कक्षा से अन्य मलबे को साफ कर चुका हो और उसका आकार इतना बड़ा हो कि वह गुरुत्वाकर्षण से गोलाकार बन सके। प्लूटो पहली और तीसरी शर्त तो पूरी करता है, लेकिन दूसरी शर्त पर खरा नहीं उतरता। इसकी कक्षा में बहुत सारा मलबा और अन्य बौने ग्रह मौजूद हैं। इसलिए IAU ने प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाकर 'बौने ग्रह' की नई श्रेणी में डाल दिया।

नासा ने ली हैं तस्वीरें

प्लूटो सूर्य से लगभग 5.9 अरब किलोमीटर दूर है। इसे सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 248 वर्ष लगते हैं। इसकी सतह पर मीथेन, नाइट्रोजन और कार्बन मोनोऑक्साइड की बर्फ जमी रहती है, जिससे यह दूर से चमकदार दिखता है। 2015 में नासा के न्यू होराइजंस मिशन ने प्लूटो के करीब से तस्वीरें लीं, जिनमें दिलचस्प हृदय के आकार का क्षेत्र और ऊंचे पर्वत दिखे थे।

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