Bangladesh Referendum: बांग्लादेश में हुए संसदीय चुनाव में बंपर जीत हासिल करने के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चेयरमैन तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बने हैं। तारिक रहमान ने पीएम पद की शपथ ले ली है। BNP ने आम चुनावों में 209 सीटों पर जीत का परचम लहराया है। भले ही बांग्लादेश को नया प्रधानमंत्री मिल गया है लेकिन यहां नया सियासी संकट भी खड़ा होता नजर आ रहा है। चलिए आपको बताते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है।
तारिक रहमान ने चुनाव जीतने के बाद पीएम पद की शपथ तो ली है लेकिन उन्होंने जुलाई चार्टर की दूसरी शपथ लेने से इनकार कर दिया। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि रहमान सरकार ने मोहम्मद यूनुस को बड़ा झटका दिया है। शपथ ग्रहण में रहमान समेत BNP के सांसदों ने संवैधानिक सुधार आयोग के सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली। BNP नेता सलाहुद्दीन अहमद ने तो यहां तक कह दिया कि उनकी पार्टी इसे (जुलाई चार्टर) को नहीं मानती है।

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के रुख से अब कहा जा सकता है कि जुलाई चार्टर का भविष्य अधर में लटक गया है। BNP के इस रुख सेजमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजन पार्टी जैसे दल भड़क गए हैं। जमात और NCP ने BNP पर बड़े संवैधानिक सुधार के लिए रेफरेंडम के आदेश को धोखा देने का आरोप लगाया है। जमात और NCP ने सड़कों पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है। जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का सबसे बड़ा विपक्षी दल है और इसने NCP के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। वैसे कई जानकारों का यह भी मानना है कि जुलाई चार्टर का मकसद अगली सरकार के लिए चार्टर को बाध्यकारी बनाना और यूनुस सरकार को वैधता प्रदान करना भी था।
चलिए अब यहां यह भी जान लेते हैं कि यह जुलाई चार्टर है क्या? इसे समझने के लिए जुलाई-अगस्त 2024 के उस दौरा पर नजर डालना जरूरी है जब छात्रों के हिंसक आंदोलन में शेख हसीना को पद और देश दोनों छोड़ा पड़ा था। इसके बाद अंतरिम सरकार के मुखिया बने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में नए सुधारों के नाम पर इस चार्टर को तैयार किया गया था। इस चार्टर में 80 से ज्यादा प्रस्ताव हैं, जिनमें 47-48 संवैधानिक संशोधन शामिल हैं। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सीमित करने, संसद को द्विसदनीय करने जैसी अहम बातें हैं। इसके तहत 100 सदस्यों वाला ऊपरी सदन, पार्टियों के वोट अनुपात में बनेगा और देश में संविधान संशोधन के लिए इसकी मंजूरी जरूरी होगी। अब ऐसे में अगर BNP जुलाई चार्टर पर सहमत होती तो संसद एक तरह से संविधान सभा में बदल जाती।

पहला रेफरेंडम
बांग्लादेश में पहला रेफरेंडम 30 मई 1977 में हुआ था। इसमें मुख्य यह सवाल पूछा गया था कि क्या आप राष्ट्रपति मेजर जनरल जियाउर रहमान और उनकी नीतियों पर विश्वास करते हैं। रेफरेंडम के पक्ष में 98.88 फीसदी और विरोध में 1.12 फीसदी वोट पड़े थे।
दूसरा रेफरेंडम
बांग्लादेश का रेफरेंडम 21 मार्च 1985 में हुआ। इसमें मुख्य सवाल पूछा गया था कि क्या आप राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मोहम्मद एरशाद की नीतियों और कार्यक्रमों पर विश्वास करते हैं और निलंबित संविधान के अनुसार चुनाव तक उनके राष्ट्रपति पद पर बने रहने का समर्थन करते हैं। रेफरेंडम के पक्ष में 94.11 फीसद लोगों ने हां और 5.50 प्रतिशत लोगों ने खिलाफ में वोट किया था।
तीसरा रेफरेंडम
तीसरा रेफरेंडम 15 सितंबर 1991 में हुआ था। इस दौरान मतदाताओं से सवाल पूछा गया था कि क्या बांग्लादेश के संविधान संशोधन को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी चाहिए। रेफरेंडम के पक्ष में 84.38 फीसद लोगों ने हां और 15.64 प्रतिशत लोगों ने विरोध में वोट किया था।
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