Vladimir Putin India Visit: दुनिया एक नए ग्लोबल ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है, और इसी बदलते दौर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा वैश्विक राजनीति के लिए एक बड़ा मैसेज माना जा रहा है। यूक्रेन जंग की आग के बीच पुतिन का नई दिल्ली आना सिर्फ एक साधारण राजनयिक दौरा नहीं, बल्कि उस दोस्ती की याद दिलाता है जो दशकों से भरोसे, सहयोग और मुश्किल वक्त में साथ निभाने की कहानी कहती है। लेकिन दुनिया भर में आखिर रूस ही भारत का सबसे भरोसेमंद साथी क्यों रहा है? क्यों महाशक्तियों की खींचतान, ग्लोबल प्रेशर और बदलते गठबंधन भी इस रिश्ते की नींव नहीं हिला पाते? और पुतिन के इस भारत दौरे से दोनों देशों को क्या-क्या रणनीतिक फायदे होने वाले हैं? इन सभी सवालों का जवाब जानने के लिए INDIA TV ने रूस की साउदर्न फेडरल यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफेसर डॉक्टर संदीप त्रिपाठी से एक्सक्लूसिव बातचीत की, जहां उन्होंने भारत-रूस दोस्ती की असली नींव, इसका भविष्य और इस दौरे के जियोपॉलिटिकल मायने विस्तार से समझाए। इस आर्टिकल में पढ़िए पूरी कहानी।
सवाल- रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का दौरा, भारत और रूस दोनों के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इससे भारत और रूस दोनों को क्या मिलने वाला है?
जवाब- डॉक्टर संदीप त्रिपाठी ने कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है जब दुनिया में वॉर जोन कई तरीके के खुले हुए हैं, स्पेशली रूस खुद एक वॉर जोन में शामिल है। इससे पहले जून के महीने में हमने भारत में भी देखा था कि किस तरह से पाकिस्तान से हमारा टेंशन हुआ था। तब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। बाकी पुतिन का दिल्ली दौरा एक रूटीन है। भारत और रूस के बीच इंडिया-रशिया स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप का जो हमारा इंस्टीट्यूशनल डायलॉग था, जो अक्टूबर, 2000 में साइन हुआ था। इसके बाद ये लगातार चला। मतलब एक बार भारतीय प्रधानमंत्री रूस गए और दूसरी बार रूस के राष्ट्रपति भारत आए। लेकिन 2021 के बाद से प्रेसिडेंट पुतिन भारत नहीं आए, उसका कारण ये था कि International Criminal Court ने उनके खिलाफ पर वारंट जारी किया था। हालांकि, इसके बावजूद वे नॉर्थ कोरिया और चीन गए, लेकिन उसके बाद उन्होंने कहीं विजिट नहीं किया। उस Context में भी यह बहुत अहम हो जाता है कि वारंट जारी होने के बावजूद पुतिन, भारत आ रहे हैं। हमारा जो डायलॉग का इंस्टीट्यूशनल मैकेनिज्म है, वो ये है कि हमारी सालाना समिट होगी, तो उसके लिए रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं।
अब दूसरा सवाल यह है कि आखिर इससे होगा क्या, तो निश्चित ही जो हमारे ट्रेडिशनल एरियाज हैं कोऑपरेशन के जैसे- डिफेंस और ट्रेड सेक्टर है, इसके बाद जियोपॉलिटिकल जो शिफ्ट है, तो इन सारे परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह दौरा अहम हो जाता है। और मुझे लगता है कि अगर मैं सबसे महत्वपूर्ण 2 चीजों की बात करूं तो इसमें ट्रेड और डिफेंस शामिल हैं। हमारे ट्रेड में एनर्जी सेक्टर है, और भारत की इसमें डिपेंडेंसी रही है। एनर्जी की डिपेंडेंसी हमारी 80 से 90 प्रतिशत है। इसके बाद हमारा डिफेंस है, उसमें काफी डिपेंडेंसी है। इन दोनों डिपेंडेंसी में रूस, भारत का साथ देता है। रूस दोस्त के रूप में, एक भरोसेमंद साथी के रूप में खरा उतरा है। हमने देखा कि SIPRI की एक रिपोर्ट कहती है कि 2009 में रूस पर 76 प्रतिशत हमारी डिपेंडेंसी थी, यानी कि हम जो इंपोर्ट करते थे आर्म्स, उसमें 76 फीसदी, जो कि 2024 में घटा और उसमें 36 प्रतिशत ड्रॉप हुआ। इसके बावजूद रूस अभी भी भारत के लिए डिफेंस सेक्टर में सबसे बड़ा सप्लायर है। रूस, कच्चे तेल के मामले में भारत के लिए सबसे बड़ा सप्लायर है। ये दोनों क्षेत्र भारत के विकास में निर्णायक हैं। एनर्जी सेक्टर हो या डिफेंस, दोनों में रूस आज हमें सबसे भरोसेमेंद साथी के रूप में दिखाई देता है। रूस ने हमेशा भारत का साथ दिया है और आगे भी देता रहेगा।
सवाल- जब भी रूस की बात आती है, तो हमें याद आता है हमारा सबसे पक्का दोस्त। भारत और रूस के बीच ऐसी क्या केमिस्ट्री है कि ग्लोबल प्रेशर के बावजूद दशकों से दोनों देश एक-दूसरे के भरोसेमंद बने हुए हैं?
जवाब- रूस की साउदर्न फेडरल यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफेसर डॉक्टर संदीप त्रिपाठी के मुताबिक, जियोपॉलिटिक्स में हमेशा हम मानते हैं और जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सिद्धांत है- Realism यानी यथार्थ की थ्योरी, वो कहती है कि राष्ट्रीय हित सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर ही हम किसी देश से अपना इंटरेक्शन करते हैं। लेकिन कई बार इतिहास में हमने देखा कि राष्ट्रीय हित दोनों देशों के अलग-अलग रहे हैं, उसके बावजूद दोनों देश हमेशा एक-दूसरे के साथ खड़े रहे। इसका मतलब है कि दोनों देशों के जो रिश्ते हैं, वो दिल के रिश्ते हैं, वो दिमाग के रिश्ते नहीं हैं। दोनों देशों के जो रिश्ते हैं, वो बेचने वाले और खरीदने वाले के नहीं हैं, वो उससे बढ़कर हैं। और इसकी झलक जब मैं रूस में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में था, तो मैंने देखी थी। वहां मैं गया, जॉइन किया, तो मैंने देखा कि वहां के लोगों में जो एक सेंटीमेंट है इंडिया के प्रति और भारतीय जनमानस में रूस के लोगों के प्रति, वो देखकर यह कहा जा सकता है कि Buyer & Seller के बीच, नॉर्मल फॉरेन पॉलिसी का जो इंटरेक्शन होता है, राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर हम करते हैं। लेकिन भारत-रूस के बीच वह ऐसा नहीं है। वह इन सबसे ऊपर है। यह रिश्ता दोतरफा है।
मैं इस संबंध में सोवियत यूनियन के कोल्ड वॉर के समय के लीडर निकिता ख्रुश्चोव का एक बयान कोट करना चाहूंगा, जो उन्होंने भारत को लेकर दिया था। निकिता ख्रुश्चोव ने कहा था, "We are so near that if you ever call us from the mountain tops, we will appear at your side." इसका मतलब है कि जब भी आप पर कोई संकट आए, आप हिमालय की चोटी से भी एक आवाज दे दोगे, तो सबसे पहले रूस आपके साथ खड़ा होगा। ये इमोशनल सेंटीमेंट होते हैं, इमोशनल स्टेटमेंट होते हैं जो आज भी ईको करते हैं। हमें सुनाई देते हैं।
जब रूस मुश्किल में था तो भारत उसके साथ था। और जब भी भारत समस्या में आया, तो रूस ने उसका साथ दिया। किसी भी तरीके का जियोपॉलिटिकल रि-एलाइनमेंट, जियोपॉलिटिकल डाइवर्जेंस, हमें एक-दूसरे के पास आने से नहीं रोकता। और बहुत ही अच्छे तरीके से भारत, रूस को देखता है। दोनों तरफ से ऐसा ही है। मैं इसके 2 उदाहरण देता हूं। 2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत हुई, और इससे पहले जब भारत, अमेरिका और क्वॉड ग्रुप के क्लोज दिखता था, तो रूस में बेचैनी नहीं दिखती थी। और जब रूस, चीन के क्लोज हुआ, तो इंडिया में बेचैनी नहीं दिखी। यह बेचैनी क्यों नहीं दिखती है? यह दिखाता है कि भारत और रूस, दोनों देशों के रिश्ते बहुत परिपक्व हैं और दोनों में गहरी समझ है। और ये परिपक्वता क्यों है, ये भी समझ लीजिए। हमारे बीच लंबी और Time-Tested पार्टनरशिप रही है। और यह हिस्टोरिकल नैरेटिव्स और टाइम पीरियड पर आधारित है। इसमें कई बार टर्बुलेंस आए, लेकिन इसके बावजूद हमने देखा कि उस टर्बुलेंस में भी हमारा जो रिलेशनशिप था और पार्टनरशिप थी, वो नहीं हिली। अभी ऑपरेशन सिंदूर के वक्त एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि जो S-400 का डिफेंस सिस्टम रूस ने हमें दिया, वह गेम चेंजर साबित हुआ। तो आप कह सकते हैं कि इंडिया का जो सबसे बड़ा क्रूशियल पार्ट है डिफेंस का, एनर्जी का, दोनों सेक्टर बहुत ही ज्यादा रूस के साथ Aligned हैं, और हम इसमें लगातार आगे बढ़ रहे हैं।
सवाल- जब भी ग्लोबल पॉलिटिक्स की बात होती है, तो एक बात ये आती है कि हमारे पास वीटो पावर नहीं है। और हमें पता है कि इतिहास में कई बार रूस ने हमारे लिए अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल किया। इससे जुड़ी इतिहास की ऐसी कोई घटना बताइए, जिससे पता चलता हो कि रूस ही हमारा सबसे भरोसेमंद साथी है।
जवाब- डॉक्टर संदीप त्रिपाठी ने बताया कि भारत और रूस का ऑफिशियल इंटरेक्शन तो 1947 से शुरू हुआ लेकिन 1955 के बाद जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वहां गए, और उसके बाद फिर ख्रुश्चोव की यात्रा भारत यात्रा होती है, तो वार्म-अप स्टार्ट होता है। फिर वहां से हमारे रिश्ते में गहराई आई। उसके बाद से फिर अगर मैं खासतौर से कश्मीर की बात करूं, जब 1970 के दशक में इस्लामाबाद, बीजिंग और वॉशिंगटन का जो ट्राइएंगल रहा, और उस ट्राइएंगल के खिलाफ सोवियत यूनियन और नई दिल्ली साथ में आए। तब मॉस्को ने बीजिंग के खिलाफ भी हमारा साथ दिया। इसके अलावा, जब भी कंसेंसस बनता था इस्लामाबाद-वॉशिंगटन का, तो फिर सोवियत यूनियन पहले ही वीटो कर देता था। आज के समय में जो रूस है, वो हमारे साथ है और क्रिटिकल मौके पर हमारे लिए वीटो करता है। और रूस सिर्फ वीटो ही नहीं करता, उसने ये भी कहा कि भारत के पास सभी योग्यता और क्षमता है कि वह UNSC का सदस्य बने, क्योंकि समय बदल गया है, Context बदल गया है और पावर सेंटर भी बदल चुके हैं। भारत अब इस नए दौर के साथ खुद को पूरी तरह से जोड़ चुका है। यही कारण है कि 1945 के बाद बना ग्लोबल ऑर्डर आज पूरी तरह बदल चुका है। और इस बदली हुई परिस्थिति में, भारत का कद UNSC की जरूरतों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। तो मुझे लगता है कि रूस ने भारत के लिए सिर्फ वीटो ही नहीं किया बल्कि भारत का भूगोल, डेमोग्राफी और इंडिया की जो इमर्जिंग टेक्नोलॉजिकल पावर है और जो हमारा स्टेटस है, उसको देखते हुए भारत की वकालत भी की।
सवाल- बदले हुए ग्लोबल ऑर्डर के बीच जब एक तरफ अमेरिका दादा बनने का प्रयास करता है और हर युद्ध खुद सुलझाने की कोशिश करता है, दूसरी तरफ चीन भी दबाव बनाने का प्रयास करता है, तो इस बीच, भारत और रूस की दोस्ती कैसे काम आ सकती है और दोनों एक-दूसरे के साथ मिलकर अपने हित कैसे साध सकते हैं?
जवाब- डॉक्टर संदीप त्रिपाठी के अनुसार, रूस और भारत दोनों के हित पहले से ही सध रहे हैं, इसमें कोई नई बात नहीं है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जब भी अमेरिका कोशिश करता है इंडिया को खींचने की, किसी कैंप में करने की, स्पेशली हमने देखा कि जब रूस-यूक्रेन वॉर स्टार्ट हुआ, तो भारत से यूरोपीय देशों ने जानबूझकर पूछा, “भारत किस पक्ष में है?” तब भारत ने बहुत स्पष्ट रूप से जवाब दिया, “भारत का अपना ही पक्ष है। वह पक्ष शांति का है और राष्ट्रीय हित का है।” भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती के साथ दिखाया है। रूस से तेल खरीदने पर 25 फीसदी टैरिफ लगने की संभावना के बावजूद भारत ने कोई समझौता नहीं किया। भारत ने अमेरिका की चिंताओं और आपत्तियों को स्पष्ट रूप से दरकिनार कर दिया।
तो मैं कह सकता हूं कि भारत और रूस, दोनों के लिए जब जियोपॉलिटिकल शिफ्ट होता है, रि-एलाइनमेंट होता है, तो दोनों साथ में आते हैं। और इंडिया की जो स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी है, हमने देखा रूस-यूक्रेन वॉर के समय, यूरोप ने तो यहां तक कोशिश की और कहा, "अगर चीन ने भारत पर हमला किया तो क्या होगा।" इसका भारत ने कैटेगोरिकली जवाब दिया, "हम देख लेंगे कि चीन से हमें कैसे निपटना है, आप हमें डर मत दिखाइए।"
तो मुझे लगता है कि यह जो इस तरीके का जो एक सुपरफिशियल वेब ऑफ थ्रेट होता है, वह अमेरिका की हमेशा ही कोशिश रहती है, क्योंकि अमेरिका की जो इकोनॉमी है, यह बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट मैं बता रहा हूं, अमेरिका की इकोनॉमी वॉर बेस्ड इकोनॉमी है। 1945 के बाद अगर वॉर दुनिया में नहीं होती, तो अमेरिका खत्म हो जाता। इसका मतलब है कि वॉर इनकी मशीन है। तो वह अभी रूस-यूक्रेन कर रहे हैं, फिर कभी इजरायल-गाजा कर देते हैं, इसके बाद फिर अभी वेनेजुएला पर देख रहे हैं, इसके पहले ये वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन की बात इराक पर कर रहे थे, और अफगानिस्तान का तो पूरा इतिहास है। जहां-जहां वॉर है, वहां-वहां अमेरिका है। हम कह सकते हैं कि इंडिया ने बहुत ही अच्छे से रेस्पोंड किया है और इंडिया ने अपनी शक्ति को दिखाया है। भारत एक Suitable Strategic Spot के रूप में उभरा है, जिसकी वजह से हर देश, भारत की बढ़ती ताकत और प्रभाव के साथ खुद को जोड़ते हुए दिख रहा है।