सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाकर यूपी बीजेपी को बड़ी राहत दी है। यूजीसी का मुद्दा सीधे पर तौर पर किसी पार्टी या राज्य से नहीं जुड़ा है। यह विश्वविद्यालयों और कॉलेज का मामला है, लेकिन इसका असर अगले साल यूपी चुनाव पर भी होने वाला था। अब कोर्ट ने नियमों पर रोक लगाकर सरकार को एक मौका दिया है, जिससे वह सबकुछ ठीक कर सकती है और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चल सकती है।
यूजीसी के नए कानूनों में दो अहम बातें थीं, जिनका विरोध हो रहा था। पहला यह कि जातिगत भेदभाव की जांच करने वाली समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर कुछ नहीं कहा गया था। दूसरा इन नियमों का दुरुपयोग करने वालों पर कार्रवाई के लिए कुछ नहीं कहा गया था। इसी वजह से यूजीसी के नए कानून को लेकर पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे थे और अपने कुछ नेताओं के इस्तीफे और विरोध के सुर से बीजेपी में काफी बैचैनी दिख रही थी।
चिंतित थी यूपी सरकार
यूपी सरकार और बीजेपी में चिंता ज्यादा दिखाई दे रही थी। यूपी में जगह-जगह इसके विरोध में प्रदर्शन और इस्तीफे हो रहे थे। अब यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद बीजेपी ने राहत की सांस ली है। यूपी बीजेपी और सरकार में खुशी ज्यादा है, क्योंकि प्रदेश में 2027 में विधान सभा चुनाव हैं। यूजीसी के नए कानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन यूपी में बीजेपी को दिक्कत में डाल सकते थे। बीजेपी यूपी में "बंटेगे तो कटेगे" नारे के साथ 2027 के विधान सभा चुनाव में जाने की तैयारी में है। बीजेपी समग्र हिंदू के बात कर रही है और यूजीसी के नए नियम से समाज अगड़े-पिछड़े में बंटा हुआ नजर आना शुरू हो गया था।
2017 में बीजेपी ने की थी वापसी
यूपी में बीजेपी 2002 में सत्ता में थी, जिसके पंद्रह साल बाद 2017 में सत्ता में वापस आ पाई। बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ी तादाद में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित वोट अपने साथ जोड़ा। यही वोट बैंक जीत की वजह बना। करीब 17-18 फीसदी सवर्ण वोट तो बीजेपी के पास था ही। दलित और ओबीसी वोट के जरिए बीजेपी 2017 विधान सभा चुनाव के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव और 2022 का विधान सभा चुनाव जीती और यूपी में दुबारा बहुमत की सरकार बनाई। इस दौरान बीजेपी मायावती का कुछ जाटव वोट भी तोड़ने में कामयाब रही। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी के वोट शेयर में 8.50 फीसदी की गिरावट आई, जिससे बीजेपी की 26 सीट घट गई। अखिलेश यादव का पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक (पीडीए) फार्मूला काम आया और समाजवादी पार्टी और कांग्रेस यूपी में 80 में 43 सीट जीत गई।
बीजेपी से दूर हो रहा था ब्राह्मण वोट बैंक
सवर्ण समाज में खासतौर से ब्राह्मणों की बीजेपी से नाराजगी की कई खबरें आईं। ब्राह्मण विधायको की लखनऊ में मीटिंग भी हुई। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बीजेपी को लगा कि इस सबसे ऐसा माहौल बन रहा है कि ब्रहामण बीजेपी के खिलाफ हैं। यूपी में ब्रहामण वोट करीब 12 फीसदी है। दलित ,ओबीसी और मुस्लिम वोट के मुकाबले इनकी तादाद काफी कम है, लेकिन यूपी में कहते हैं कि ब्राह्मण वोट माहौल बनाने का काम करता है। यूजीसी के नए नियमों से सवर्णों को लग रहा था कि बीजेपी की पूरी सियासत दलितों और पिछड़ों के इर्दगिर्द है और उनकी कोई जगह नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने खत्म की समस्या
यूजीसी कानून को लेकर सरकार के सामने दिक्कत ये थी कि अगर सरकार कानून वापस लेती तो दलित ओबीसी वोट खिसकने का डर था। वापस नहीं लेती तो सवर्ण समाज की नाराजगी का सामना करना पड़ता। जाहिर है कि केंद्र सरकार के फैसले का असर यूपी पर भी पड़ता। अब सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगा कर सरकार को बड़ी राहत दे दी है। अब यूजीसी के नए नियमों पर दोबारा विचार कर इनकी भाषा स्पष्ट की जा सकती है। इसके साथ ही संशोधन कर इन कानूनों को ऐसा बनाया जा सकता है, जो जातिगत भेदभाव को रोकने में सक्षम हों और उनके दुरुपयोग की गुंजाइश भी न हो।
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