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Mata Brahmacharini Ki Katha: माता ब्रह्मचारिणी की पूजा के साथ ही करें इस कथा का पाठ, मनोकामनाएं होंगी पूरी

 Written By: Naveen Khantwal
 Published : Mar 19, 2026 07:53 pm IST,  Updated : Mar 19, 2026 07:53 pm IST

Mata Brahmacharini Ki Katha: नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। माता की पूजा तभी सफल होती है जब आप पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ भी करते हैं। आइए ऐसे में जान लेते हैं नवरात्रि के दूसरे दिन की व्रत कथा।

Brahmacharini Vrat Katha- India TV Hindi
माता ब्रह्मचारिणी व्रत कथा Image Source : FREEPIK

Mata Brahmacharini Ki Katha: नवरात्रि के दूसरे दिन माता दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। माता ब्रह्मचारिणी श्वेत वर्ण वाली माता ब्रह्मचारिणी ज्ञान, संयम और आत्बल देने वाली हैं। माता की पूजा से भक्तों की मुरादें पूरी होती हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा के साथ ही व्रत कथा का पाठ भी आपको अवश्य करना चाहिए। साल 2026 में 20 मार्च के दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाएगी। आइए ऐसे में जान लेते हैं माता ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा क्या है। 

मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार माता ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर में हुआ था। नारद जी के उपदेश को सुनकर माता ने भोलेनाथ को अपने पति के रूप में पाने के लिए माता ने कठोर तप किया। माना जाता है कि तपस्या के पहले हजार वर्षों तक माता ने सिर्फ फल और फूल खाकर जीवन बिताया था। इसके बाद सौ वर्षों तक मां केवल जमीन पर रहीं। इसके बाद धूप, वर्षा आदि की परवाह किए बिना माता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या जारी रखी। इसके बाद कई वर्षों तक माता ने केवल बिल्वपत्र खाकर जीवन यापन किया और भगवान शिव की आराधना में लीन रहीं। तपस्या के अंतिम पड़ाव में आते-आते माता ने बिल्वपत्र का त्याग भी कर दिया। माता ने पत्तों का त्याग भी तपस्या के दौरान किया था इसलिए उन्हें अपर्णा भी कहा जाता है। इसके बाद निर्जला रहकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए माता ने तपस्या जारी रखी। माता की कठोर तपस्या को देखते हुए ही इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से पुकारा जाता है। 

माता ब्रह्माचारिणी की तपस्या से प्रसन्न होकर एक ऋषि का रूप बनाकर भगवान शिव माता के पास पहुंचे और माता की परीक्षा ली। हालांकि, ऋषि के रूप में आए भगवान शिव की बात माता ब्रह्माचारिणी ने नहीं सुनी और अपनी तपस्या जारी रखी। तब ऋषि के रूप में आए शिव जी ने उनसे कहा कि शिव तुम्हें पति के रूप में अवश्य मिलेंगे। अंत में भगवान शिव ने माता को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और माता ब्रह्मचारिणी की तपस्या सफल हुई। माता ब्रह्मचारिणी तपस्वी, आत्मसंयमी और दृढ़ संकल्प थीं। यही वजह है कि उनकी आराधना वालों को भी संयम और आत्मबल प्राप्त होता है। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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