Saturday, January 31, 2026
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EXCLUSIVE: इनकम टैक्स नहीं भरते, फिर भी आपका बजट देखना क्यों है बहुत जरूरी? इकोनॉमिक एक्सपर्ट से समझें एक-एक बात

बजट हम सभी की रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर डालता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप इनकम टैक्स भरते हैं या नहीं, इस बात को अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने एक्सक्लूसिव बातचीत में समझाया।

Written By: Vinay Trivedi
Published : Jan 31, 2026 08:19 am IST, Updated : Jan 31, 2026 08:23 am IST
budget 2026 matters- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV इनकम टैक्स नहीं भरने वालों को भी क्यों देखना चाहिए बजट?

Budget 2026: 'मैं तो इनकम टैक्स भरता ही नहीं, तो फिर मुझे बजट क्यों देखना?' अगर आपके मन में भी यही चल रहा है, तो आप अकेले नहीं हैं। लेकिन सच ये है कि बजट का प्रभाव आपकी थाली से बच्चों की पढ़ाई, जॉब और बचत तक हर चीज पर पड़ता है। INDIA TV ने देश के जाने-माने अर्थशास्त्री अरुण कुमार से एक्सक्लूसिव बातचीत में समझा कि कम इनकम वाले लोग दिहाड़ी मजदूर, गिग वर्कर और हाउसवाइफ, जो टैक्स स्लैब में नहीं आते उनके लिए भी बजट देखना क्यों जरूरी है, जितना एक बिजनेसमैन या सैलरी क्लास के लिए होता है। तो अगर आपकी महीने की कमाई 10–20 हजार रुपये ही है, या आप इनकम टैक्स नहीं भरते, तब भी 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले देश के बजट का प्रभाव आपकी जेब पर कैसे पड़ेगा। आइए, इकोनॉमिक एक्सपर्ट से एक-एक बात आसान भाषा में समझें।

सवाल: आम तौर पर यह धारणा है कि बजट सिर्फ 'इनकम टैक्स' भरने वालों या व्यापारियों के लिए होता है, लेकिन जो लोग टैक्स स्लैब में नहीं आते हैं उन्हें बजट वाले दिन न्यूज़ पर नजर क्यों बनाए रखनी चाहिए, उनके लिए इसमें क्या छिपा होता है?

जवाब: अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि बजट हमारी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा इकोनॉमिक इवेंट होता है जिसका असर सबके ऊपर पड़ता है। इसका सीधा संबंध इस बात से है कि अर्थव्यवस्था में कितना रोजगार पैदा होगा और इसका असर आम आदमी पर आता है। साथ ही हमारे यहां चीजों के दाम कितने बढ़ेंगे या घटेंगे, इसका असर भी पड़ता है। तो मतलब जो आम आदमी इनकम टैक्स के दायरे में नहीं आता है, उसके ऊपर भी इसका असर पड़ता है। फिर हमारा जो जीएसटी है, वो तो बजट में डिसाइड नहीं होता है, लेकिन पहले हमारा जो इनडायरेक्ट टैक्स होता था, एक्साइज ड्यूटी वगैरह, उसका भी असर आम आदमी की खरीद-फरोख्त की चीजों पर पड़ता था। इसलिए जितने भी मैक्रो वेरिएबल्स हैं जो आम आदमी से जुड़े हैं, उन सबका असर पड़ता है।

उन्होंने आगे कहा, 'हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर कितना खर्च होगा, इसका असर पब्लिक सेक्टर की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा, जिसका अंततः असर आम आदमी पर ही आता है। अगर हम ज्यादा खर्च करेंगे तो हमारी शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर होंगी। इसके अलावा सड़कों पर अगर खर्च हो रहा है, या रेलवे पर खर्च हो रहा है, तो हमारे ट्रांसपोर्टेशन पर उसका असर पड़ता है। यानी कि कहा जाए तो आम आदमी की पूरी जिंदगी पर बजट का असर पड़ता है, इसलिए आम आदमी को भी बजट के बारे में समझना जरूरी है।

सवाल: देश के बजट का सीधा असर एक हाउसवाइफ की रसोई पर कैसे पड़ता है, तेल, साबुन से लेकर अन्य खर्चों के दाम बढ़ने-घटने पर उन्हें क्यों ध्यान देना चाहिए?

जवाब: अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि हमारी जो गृहिणियां हैं, उनका अपना बजट होता है कि कितना खाने-पीने पर खर्च होगा, कितना तेल-साबुन वगैरह पर खर्च होगा और कितना सफाई पर खर्च होगा। तो जो हमारा इनडायरेक्ट टैक्स है, जब वो बदलता है तो उसका असर इन रोजमर्रा की चीजों पर पूरी तरह से पड़ता है। और जब वो असर पड़ता है तो फिर वो निर्धारित करता है कि उनके बजट पर कितना असर पड़ेगा और वो कितनी चीजें खरीद पाएंगी। उन्हें बच्चों का भी ध्यान रखना है और घर में जो बड़े-बूढ़े हैं उनका भी ध्यान रखना है। तभी उनका बजट ठीक रहता है। अगर दाम बढ़ जाएंगे तो उनका बजट डिस्टर्ब हो जाता है। फिर उन्हें खाने-पीने की वस्तुओं में कटौती करनी पड़ती है, या फिर स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों में कटौती हो जाती है।

उन्होंने आगे कहा, 'हाउसवाइफ को सारा घर चलाना होता है और खर्चे तभी हो पाएंगे जब चीजें उनके बजट के अंदर रहेंगी। अगर उनके बजट के बाहर हो जाएंगी तो वो सही ढंग से घर नहीं चला पाएंगी। या जैसे अगर महंगाई ज्यादा हो गई, तो जो अच्छी चीजें वो खरीदती थीं, उसके बजाय उनको लोअर क्वालिटी की चीजें खरीदनी पड़ेंगी जो स्वास्थ्य पर असर करेगा। या फिर हो सकता है कि उनको भी काम करने जाना पड़े अगर ज्यादा महंगाई हो जाए। अगर पति की आमदनी में घर नहीं चलेगा तो फिर उनको भी बाहर जाकर काम करना पड़ेगा, मतलब उन पर डबल बर्डन हो जाएगा।

अरुण कुमार ने बताया कि डबल बर्डन का मतलब है कि अपना घर भी संभालना और बाहर का भी काम करना जिससे कि आमदनी बढ़ जाए। इस तरह से गृहिणियों के ऊपर बजट का सीधे-सीधे असर पड़ता है।'

सवाल: आज गिग वर्कर्स की तादाद बहुत बढ़ गई है। इनके लिए कोई फिक्स सैलरी नहीं है, न पीएफ होता है, तो इन लोगों के लिए बजट देखना क्यों जरूरी है?

जवाब: अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि देखिए बजट का असर सबके ऊपर है। अगर रोजगार बेहतर होगा, तो फिर ये लोग गिग वर्क नहीं करेंगे। अगर अच्छा रोजगार होगा तो उसमें सारी सोशल सिक्योरिटी भी होगी, उनकी छुट्टी भी होगी और उनका प्रोविडेंट फंड वगैरह भी होगा। सरकार की नीति ही यह निर्धारित करती है कि हमारा जो असंगठित क्षेत्र है, वो किस प्रकार से चल रहा है और उसमें कितना रोजगार पैदा होगा। अगर असंगठित क्षेत्र ही बढ़ता रहेगा तो वहां तो कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं होती, कोई छुट्टी नहीं होती और इसीलिए गिग वर्कर को भाग-भाग के काम करना पड़ता है क्योंकि जितने वो ट्रिप्स करेगा, उतनी उसकी आमदनी ज्यादा होगी।

उन्होंने कहा, 'लेकिन अगर उसको एक सिक्योरिटी हो कि उसको एक पगार मिलेगी और सोशल वेलफेयर मेजर्स उपलब्ध होंगे, तो फिर वो इस सब में नहीं पड़ेगा। इसलिए जो गिग वर्कर्स हैं, उनको भी बजट की तरफ ध्यान देना चाहिए क्योंकि वही तय करता है कि उनकी बेहतरी होगी या उनकी परेशानी और बढ़ जाएगी।'

सवाल: कम इनकम वाले लोग शेयर बाजार के बजाय पोस्ट ऑफिस या छोटी बचत स्कीमों में पैसा ज्यादा लगाते हैं, तो बजट में जो योजनाएं आती हैं, उनका क्या ब्याज दरों पर भी असर पड़ता है और ऐसे लोगों के लिए बजट देखना क्यों जरूरी है?

जवाब: अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि जो इंटरेस्ट रेट है वो तो हमारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया फिक्स करता है, सीधे तौर पर बजट से उस पर असर नहीं होता है। लेकिन अगर बजट की नीतियों से अर्थव्यवस्था में इन्फ्लेशन तेज हो जाएगा, तो फिर आरबीआई को भी अपना इंटरेस्ट रेट चेंज करना पड़ेगा। या अगर हमारी ग्रोथ कम हो जाए, तो आरबीआई को इंटरेस्ट रेट कम करना पड़ता है। तो चीजों का असर तो होता है, पर डायरेक्ट नहीं, वो इनडायरेक्टली आरबीआई के थ्रू होता है।

उन्होंने कहा, 'हमारे देश में ज्यादातर लोग गरीब हैं, तो उनकी सेविंग भी बहुत कम होती है। इसलिए वो सेव नहीं कर पाते हैं और जो रिस्की एसेट हैं उनकी तरफ वो सेव नहीं करेंगे। इसलिए उनके लिए बजट को समझना जरूरी है।'

सवाल: हमारा जो गरीब तबका है, उसके लिए राशन और गैस सिलेंडर पर सब्सिडी मिलना बहुत मायने रखता है। अगर बजट में सरकार सब्सिडी का एलोकेशन कम या ज्यादा करती है, तो उनकी जेब पर तुरंत कैसे असर दिखता है?

जवाब: अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा कि सब्सिडी तब देने की जरूरत पड़ती है जब लोगों की आमदनी कम हो और वो अपना जो जीवन निर्वाह कर रहे हैं, उसमें उनको परेशानी आ जाए। जैसे कि हमारा कृषि क्षेत्र है, वहां पर सबसे ज्यादा गरीब लोग हैं क्योंकि बहुत सारे हमारे जो किसान हैं, वो बहुत ही थोड़ी जमीन जोतते हैं, तो उनकी पर्याप्त मात्रा में आमदनी नहीं होती है।

उन्होंने आगे कहा, 'ई-श्रम पोर्टल पर हमारे असंगठित क्षेत्र के करीब 30 करोड़ लोग रजिस्टर्ड हैं। शुरुआती डेटा ने बताया था कि उसमें जो 90 प्रतिशत लोग हैं, वो 10 हजार रुपये से कम आमदनी कमाते हैं। 10 हजार रुपये से कम कमाने का मतलब है कि वो गरीबी की रेखा के आसपास ही हैं। तो उनको जो गरीबी का सामना करना पड़ता है, उससे वो अपने बच्चों की पढ़ाई या स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त पैसा नहीं जुटा पाते।'

वे बोले कि अगर घर में एक भी बीमारी हो जाए तो उनको लोन लेना पड़ता है और उससे फिर वो गरीबी की रेखा के नीचे चले जाते हैं। इसलिए जो गरीब तबका है, वही सबसे ज्यादा पिसता है। जो अमीर तबका या वेल-ऑफ सेगमेंट्स हैं, जो इंडस्ट्री है, वे तो अपना काम चला लेते हैं। लेकिन इन गरीब लोगों को राहत तभी मिल सकती है जब इनको कोई सब्सिडी मिले। सब्सिडी इसलिए दी जाती है क्योंकि अर्थव्यवस्था में परेशानी का दौर है। अगर परेशानी का दौर न हो, रोजगार पर्याप्त हो और सबकी इनकम ठीक हो, तो सब्सिडी की जरूरत नहीं पड़ती है।

सवाल: एक एक्सपर्ट के तौर पर आप उस व्यक्ति को क्या सलाह देंगे जो महीने के 10-20 हजार रुपये कमाता है और इनकम टैक्स भी नहीं देता है। उसे बजट पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के भाषण में कौन सी दो-तीन बातों को कान लगाकर सुनना चाहिए?

जवाब: अरुण कुमार बोले कि मेरा मानना है कि जो गरीब आदमी है, उसको सबसे ज्यादा जो परेशानी है वो बेरोजगारी से है। महंगाई से है। तो उसे यह देखना चाहिए कि बजट में रोजगार की तरफ ध्यान दिया जा रहा है या नहीं। शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है या नहीं। और फिर जो दाम बढ़ने की प्रवृत्ति है, उस पर क्या असर होगा, जिससे उनको फायदा या नुकसान होने वाला है। इन चीजों की तरफ अगर वो ध्यान देंगे, तो फिर वो अपना बजट प्लान कर पाएंगे और उनको समझ में आएगा कि बजट से उनको फायदा होने वाला है या नुकसान।

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