Lohri 2026 Shubh Muhurat Live: 13 जनवरी को लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाएगा। लोहड़ी का ये त्योहार मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। उत्तर भारत में, खासकर कि पंजाब में इस त्यौहार का महत्व है। जिन लोगों की नई-नई शादी हुई हो या जिनके घर में बच्चा हुआ हो, उन लोगों के लिए ये त्यौहार विशेष महत्व रखता है। लोहड़ी के दिन शाम के समय लकड़ियों और गोबर के उपलों को इकट्ठा करके जलाया जाता है और परिवार के साथ उसके चारों ओर घेरा बनाकर परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा के समय जलती हुई आग में मूंगफली, रेवड़ी, तिल, मक्की के दाने आदि चीजें डालने की परंपरा है। कहते हैं ऐसा करने से दूसरों की बुरी नजर से छुटकारा मिलता है, घर में सुखद माहौल बनता है और व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ दिल्ली के हरियाणा भवन में लोहड़ी मनाई।
बीजेपी नेता तरुण चुघ ने लोहड़ी का त्योहार मनाया।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता जयराम ठाकुर ने कहा, "मैं लोहड़ी के इस पावन अवसर पर सभी प्रदेश वासियों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं देता हूं... हर व्यक्ति और हर वर्ग को पूरे प्रदेश में खुशहाली मिले। खासकर हम इस त्रासदी के दौर से बाहर निकलकर आगे बढ़ें, यही मेरी प्रार्थना है..."
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता जयराम ठाकुर ने कार्यकर्ताओं के साथ लोहड़ी मनाई।
लोहड़ी की आग की 7 या 11 बार परिक्रमा करनी चाहिए। इस दौरान घर-परिवार की खुशहाली और समृद्धि के लिए प्रार्थना भी करते रहे।
जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में लोहड़ी की रौनक देखने को मिल रही है। दुकानों पर रंग-बिरंगे छज्जे देखने को मिल रहे हैं, जिन्हें बच्चे खरीदकर काफी खुश नजर आ रहे हैं। छज्जा लोहड़़ी के समय पंजाब और जम्मू क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय एक पारंपरिक चीज है। यह बांस या लकड़ी की बनी एक छोटी-सी टोकरी या थाली जैसी दिखती है।
1. तिल - लोहड़ी की आग में तिल जरूर डाला जाता है। तिल को शुद्धता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
2. गुड़ - ज्योतिष अनुसार गुड़ मिठास, खुशहाली और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
3. मूंगफली - लोहड़ी की अग्नि में मूंगफली जरूर डाली जाती है। मान्यता है कि इससे अन्नपूर्णा माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
4. रेवड़ी - तिल और गुड़ से तैयार रेवड़ी लोहड़ी का प्रमुख व्यंजन है। कहते हैं इसे लोहड़ी की आग में अर्पित करने से रिश्तों में प्रेम और विश्वास बना रहता है और घर-परिवार को किसी की बुरी नजर नहीं लगती।
5. पॉपकॉर्न - लोहड़ी की अग्नि में पॉपकॉर्न भी जरूर अर्पित किया जाता है। कहते हैं ये चीज प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताने का प्रतीक है।
लोहड़ी में ‘ल’ का अर्थ है लकड़ी, ओह का अर्थ उपले, और ड़ी का मतलब रेवड़ी से होता है। इन तीनों को मिलाने पर लोहड़ी शब्द की उत्पति होती है। लोहड़ी का त्योहार प्रत्येक वर्ष 13 जनवरी को मनाया जाता है।बता दें कि लोहड़ी के त्योहार को सर्दियों के अंत और वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
आज लोहड़ी का त्योहार मनाया जायेगा। लोहड़ी का ये त्योहार मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। उत्तर भारत में, खासकर कि पंजाब में इस त्योहार का महत्व है। जिन लोगों की नई-नई शादी हुई हो या जिनके घर में बच्चा हुआ हो, उन लोगों के लिये ये त्योहार विशेष महत्व रखता है। आज के दिन शाम के समय लकड़ियों और गोबर के उपलों को इकट्ठा करके जलाया जाता है और परिवार के साथ उसके चारों ओर घेरा बनाकर परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा के समय जलती हुई आग में मूंगफली, रेवड़ी, तिल, मक्की के दाने आदि चीज़ें डालने की परंपरा है। कहते हैं ऐसा करने से दूसरों की बुरी नजर से छुटकारा मिलता है, घर में सुखद माहौल बनता है और व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
लोहड़ी की कथा अनुसार, एक गांव में सुंदरदास नाम का एक गरीब किसान रहता था जिसकी सुंदरी और मुंदरी नाम की दो बेटियां थीं। ये दोनों लड़कियां मुगल सरदारों के अत्याचारों का शिकार बनने वाली थीं। गांव का नम्बरदार लड़कियों के पिता सुंदर दास को मजबूर कर रहा था कि वह अपनी बेटियों की शादी उससे कर दे। सुंदर दास ने ये बात जाकर दुल्ला भट्टी को बता दी। दुल्ला भट्टी ने नम्बरदार को सबक सिखाने के लिए उसके खेत जला दिए और इसके बाद उन्होंने सुंदरी-मुंदरी की शादी वहीं करवाई, जहां उनके पिता सुंदर दास कराना चाहते थे। जब लड़कियों की विदाई करने की बात आई तो उस समय दुल्ला भट्टी के पास कुछ नहीं था। ऐसे में उसने एक सेर शक्कर देकर दोनों को विदा कर दिया। लोहड़ी पर्व पर आज भी दुल्ला भट्टी की वीरता से जुड़ी इस कहानी को जरूर याद किया जाता है, खासकर 'सुंदर मुंदरिये' लोकगीत के माध्यम से।
लोहड़ी की अग्नि में गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और तिल अर्पित करना शुभ होता है। ऐसा करने से आपके जीवन में धन-धान्य और समृद्धि का आगमन होता है। घर में सदैव बरकत बनी रहती है।
लोहड़ी के दिन काले और सफेद रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। लोहड़ी के दिन लाल, नारंगी और पीले जैसे शुभ रंग के कपड़े पहनें। आप पारंपरिक कपड़े भी पहन सकते हैं।
लोहड़ी की आग में तिल, गजक, रेवड़ी, मूंगफली, चना, सूखे मेवे और साबुत अनाज इन सभी चीजों को डाला जाता है। यदि आप लोहड़ी मना रहे हैं तो इन सभी समाग्रियों को व्यवस्थित कर लें।
लोहड़ी का पर्व मुख्य रूप से कृषि व प्रकृति को समर्पित होता है। यही वजह है कि लोहड़ी में प्रसाद के लिए गुड़, तिल, गजक, रेवड़ी और मूंगफली को रखा जाता है।
लोहड़ी के दिन सभी लोग ढोल और नगाड़ों के बीच जमकर भांगड़ा (नाचते) करते हैं। वहीं महिलाएं लोहड़ी की पारंपरिक गीत भी गाती हैं।
लोहड़ी के दिन लोग लकड़ियों को इकट्ठा कर के आग जलाते हैं और फिर उसमें गुड़, तिल, रेवड़ी, मूंगफली और गजक चढ़ाते हैं। इसके बाद सभी लोग आग के चारों तरफ घूम-घूम कर पूजा करते हैं।
इस प्रकार उन दोनों की शादी तो हो गई, लेकिन बाद में मुगल शासकों ने अब्दुल्ला भाटी पर हमला कर दिया और वह मारा गया। तब से अब्दुल्ला भाटी की याद में लोहड़ी का ये त्यौहार मनाया जाता है और शाम के समय लकड़ी और उपले जलाकर उसकी परिक्रमा की जाती है। लोहड़ी के दिन एक-दूसरे को मूंगफली, रेवड़ियां आदि बांटने और खाने का भी रिवाज़ है।
अब्दुल्ला भाटी कोई पंडित तो था नहीं, इसलिए उसने आस- पास पड़ी लकड़ियों और गोबर के उपलों को इकट्ठा करके उसमें आग जलायी और उसके पास जो कुछ खाने की चीज़ें जैसे मूंगफली, रेवड़ी आदि थीं, वो सब उसने आग में डाल दी और उन दोनों की शादी करवा दी। शादी के समय अब्दुल्ला भाटी ने कुछ इस तरह का गीत भी गाया था-
सुन्दर मुंदरिए
तेरा कौन विचारा
दुल्ला भट्टीवाला
दुल्ले दी धी व्याही
सेर शक्कर पायी
कुड़ी दा लाल पताका
लोहड़ी के इस त्यौहार को मनाने के पीछे इतिहास के कुछ पन्ने भी जुड़े हैं। इस दिन को मुगलशासकों के विरुद्ध न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोकप्रिय नायक, परमवीर, हिन्दू गुर्जर अब्दुल्ला भाटी की याद में मनाया जाता है। अब्दुल्ला भाटी हमेशा सबकी मदद के लिए तैयार रहते थे। ऐसे ही एक बार उन्होंने एक ब्राह्मण की कन्या को मुगलशासक के चंगुल से छुड़ाया था और उसकी शादी एक सुयोग्य हिन्दू वर से करवायी थी। उस कन्या का नाम सुंदर मुंदरिए था।
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