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ज़िंदगी का क्या भरोसा? रमज़ान मिले या न मिले...

सुबह के तीन बजे मुंबई के मुहम्मद अली रोड इलाक़े की सड़कों पर रौनक छाई हुई है...चारो तरफ गहमा-गहमी का माहौल है...एक भी ऐसी दुकान नहीं है जिसका शटर गिरा हुआ हो...दुकानों में तरह तरह

Mohammad Sheikh- India TV Hindi
Mohammad Sheikh

सुबह के तीन बजे मुंबई के मुहम्मद अली रोड इलाक़े की सड़कों पर रौनक छाई हुई है...चारो तरफ गहमा-गहमी का माहौल है...एक भी ऐसी दुकान नहीं है जिसका शटर गिरा हुआ हो...दुकानों में तरह तरह की चीज़ें बन रही हैं...कुछ युवा बाइक दौड़ा रहे हैं तो कुछ तंग गलियों में क्रिकेट खेल रहे हैं। ऐसे माहौल में एक शख़्स की आवाज़ गूंजती है, "नींद से जागो, सहरी का वक़्त हो गया। ज़िंदगी का क्या भरोसा? रमज़ान मिले या न मिले।"

ये आवाज़ है मोहम्मद फ़ारुक़ क़रेशी शेख़ की जो पिछले 18 साल से रमज़ान में यहां लोगों को सहरी के लिए जगाता आ रहा है। शेख़ डोंगरी से चिंच बंदर तक सात किलो मीटर का सफर तय कर लोगों को जगाते हैं। शेख़ हर गली में जाकर पुकार लगाकर लोगों को सहरी का वक़्त याद दिलाते हैं।

लोग बुलाते हैं ताज भाई

लोग इन्हें अच्छी तरह जानते हैं और उन्हें ताज भाई नाम से पुकारते हैं। कुछ लोग इस काम के लिए उन्हे कुछ पैसे भी दे देते हैं। बच्चे तो उन्हें देखते ही कहते हैं, ''ताज भाई शुरु हो जाओ।''

56 साल के शेख़ पौने पांच बजे तक लोगों को जगाने का काम ख़त्म कर लेते हैं यानी रोज़ा शुरु होने के 15 मिनट पहले ताकि खुद भी सहरी कर सकें। उम्र की वजह से वह सेहरी में दूध और रोटी ही खाते हैं।

सहरी के लिए जगाने की लुप्त होती परंपरा

सहरी के लिए जगाने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। तब घड़ी नही हुआ करती थी और लोग इसी तरह आवाज़ लगाकर सहरी के लिए लोगों को जगाते थे। मिस्र में इस परंपरा को मुसहराती कहते हैं और जो इस परंपरा का पालन करते हैं उन्हें अल मुसहराती कहते हैं। ये परंपरा कश्मीर में भी है जिसे सहर ख़ान कहते हैं। लेकिन अब ये परंपरा धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है क्योंकि लोग जागने के लिए अब अलार्म का इस्तेमाल करने लगे हैं।

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शेख़ ख़ुद को "सहरीवाला" कहते हैं। उन्हें याद है बचपन में एक बूढ़ा शक़्स लाठी लेकर उनके मोहल्ले में लोगों को सहरी के लिए जगाया करता था। शेख़ ने तीस साल की उम्र में रमज़ान में लोगों को जगाने का काम शुरु किया था। वह जब 22 साल के थे, उनकी पत्नी गुज़र गईं और उनका बेटा भी पैदा हेने के कुछ समय के बाद ही चल बसा।

शेख़ बताते हैं, "शुरु में मैं हर बिल्डिंग में आखिरी माले तक जाकर लोगों को जगाता था लेकिन अब उम्र की वजह ऊपर नहीं चढ़ सकता इसलिए मैंने ये बड़ा सा मेगाफ़ोन ले लिया है।"

शेख़ सारी रात जागते रहते हैं और एक ट्रेवल एजेंसी के एक कोने में पिछले 15 साल से रह रहे हैं।

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