कलाम ने लिखा कि डीटीडीपी का साक्षात्कार 'आसान' था, लेकिन वायुसेना चयन बोर्ड के साक्षात्कार के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि योग्यताओं और इंजीनियरिंग के ज्ञान के अलावा बोर्ड, उम्मीदवारों में खास तरह की 'होशियारी' देखना चाहता था। वहां आए 25 उम्मीदवारों में कलाम को नौंवा स्थान मिला, लेकिन केवल आठ जगहें खाली होने की वजह से उनका चयन नहीं हुआ।
कलाम ने कहा था, मैं वायुसेना का पायलट बनने का अपना सपना पूरा करने में असफल रहा। उन्होंने लिखा है, मैं तब कुछ दूर तक चलता रहा और तब तक चलता रहा जब तक कि एक टीले के किनारे नहीं पहुंच गया। इसके बाद उन्होंने ऋषिकेश जाने और एक नई राह तलाशने का फैसला किया।
डीटीडीपी में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक की अपनी नौकरी में अपना 'दिल और जान डालने वाले' कलाम ने लिखा, जब हम असफल होते हैं, तभी हमें पता चलता है कि यह संसाधन हमारे अंदर हमेशा से ही थे। हमें उनकी तलाश करनी होती है और जीवन में आगे बढ़ना होता है।
इस किताब में वैज्ञानिक सलाहकार के तौर पर उनके कार्यकाल, सेवानिवृत्ति के बाद का समय और इसके बाद शिक्षण के प्रति उनका समर्पण एवं राष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल से जुड़ी 'असंख्य चुनौतियां और सीखों' की कहानियां हैं। कलाम के वैज्ञानिक सलाहकार रहते हुए ही भारत ने अपना दूसरा परमाणु परीक्षण किया था। कलाम ने इस किताब में अपने जीवन की सीखें, किस्से, महत्वपूर्ण क्षण और खुद को प्रेरित करने वाले लोगों का वर्णन किया है।
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