श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के पंपोर में हुए हमले के बाद आतंकियों से मुठभेड़ में आतंकी सरगना के बेटे के रेस्क्यू पर विवाद खड़ा हो गया है। हमले में शहीद जवानों के परिजनों ने इसका विरोध किया है। जम्मू-कश्मीर के पंपोर में 20 फरवरी को हुए आतंकी हमले में सेना के जवानों ने जान पर खेलकर वहां मौजूद करीब सौ लोगों की जान बचाई थी। अब पता चला है कि बचाए गए लोगों में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का मुखिया सैयद सलाउद्दीन का बेटा सैय्यद मुईन भी ईडीआई की बिल्डिंग में था। इसे लेकर हमले में शहीद जवानों के परिजन नाराज हैं।
सेना ने आतंकी के बेटे को बचाया!
- हमले के वक्त हिजबुल चीफ सैयद सलाउद्दीन का बेटा सैयद मुईन भी ईडीआई के दफ्तर में फंसा था
- मुईन वहां आईटी मैनेजर के तौर पर काम करता है
- पुलिस के मुताबिक उसका किसी आतंकी संगठन से लेना-देना नहीं है
- इसके अलावा सलाउद्दीन के दो और बेटे मेडिकल क्षेत्र से जुड़े हैं
- बताया जाता है कि इन लोगों ने खुद को अपने पिता से अलग कर लिया है.
- रेस्क्यू के बाद मुईन ने भी आर्मी का शुक्रिया अदा किया
सैयद मुईन ने बताया, ‘सेना को पता चल चुका था कि मैं सलाउद्दीन का बेटा हूं लेकिन इसके बाद भी उन्होंने ना ही मुझसे कोई पूछताछ की ना ही परेशान किया। उन्होंने मुझसे वैसा ही अच्छा बर्ताव किया जैसा उन्होंने बिल्डिंग से बाकी के बचाए गए 100 लोगों से किया और हमें बिल्डिंग से सुरक्षित बाहर निकाला।’
क्या है पूरा मामला ?
20 फरवरी को श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर पंपोर में पिछले सप्ताह लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादियों के हमले में यूनाईटेड जिहाद काउंसिल के सुप्रीमो सैयद सलाहुद्दीन के बेटे सैयद मुईन सहित करीब 100 कर्मचारी और प्रशिक्षु सरकारी इमारत में फंस गए थे। अधिकारियों ने बताया कि जिस समय शनिवार को तीन आतंकवादियों ने राजमार्ग पर सीआरपीएफ के एक काफिले पर गोलीबारी के बाद परिसर में प्रवेश किया उस समय पंपोर के जम्मू कश्मीर एंट्रोप्रेनेउरशिप डेवमेंट इस्टीच्यूट (जेकेईडीआई) में एक सूचना तकनीकी मैनेजर के रूप में कार्यरत मुईन अपने सहकर्मियों के साथ दोपहर में नमाज अदा कर रहे थे ।
उन्होंने बताया कि जिस समय आतंकवादी परिसर के मुख्य बहुमंजिला इमारत की ओर जा रहे थे उस समय महिलाओं सहित वहां मौजूद करीब 20 कर्मचारी भयभीत हो गए और मुईन सहित कुछ लोग ने नमाज छोड़कर सीढियों की ओर लपके। आतंकवादियों ने उनसे अपना मोबाइल फोन छोड़ने और भवन से बाहर जाने का निर्देश दिया। कर्मचारी पिछले दरवाजे से नजदीकी छात्रावास भवन की ओर निकले जहां पर और कर्मचारी और प्रशिक्षु छिपे हुये थे।
एक माली को गोली मारा गया था और जिसकी बाद में मौत हो गयी, उसे छोड़ कर उन सभी को परिसर से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए सुरक्षा बलों ने मदद प्रदान की। परिसर से सभी नागरिकों को बाहर निकाले जाने के बाद सुरक्षा बलों और छिपे हुये आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ शुरू हो गयी और तीन दिनों के बाद मुठभेड़ समाप्त होने पर तीन आतंकवादियों मारे गये। ये सभी विदेशी थे। मुठभेड़ में स्पेशल फोर्स के दो कैप्टन सहित तीन सैन्यकर्मी और दो सीआरपीएफ जवान शहीद हुये थे और मुख्य भवन को बुरी तरह नुकसान पहुंचा था।
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