नई दिल्लीः बिहार में क़ानून की रखवाली करने वालों की एक ऐसी बस्ती है जहां हर दिन वर्दीवालों का सामना उनकी जातिवाद के ज़हर से होता है। इस बस्ती में सबसे पहले वर्दीवालों की जाति पूछी जाती है, फिर उनकी रसोई और रसोइया तय होता है। वो पुलिसवाला कहां रहेगा, ये भी उसकी जाति से ही तय होता है।
हमारी-आपकी हिफ़ाज़त करने वाली पुलिस ही जातिवाद और भेदभाव का चूल्हा जलाकर क़ानून को तल रही है और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। गया की पुलिस लाइन्स है में ज़िलेभर के पुलिसवाले रहते हैं और वहीं सारे पुलिसवालों की रसोई बनती है। लेकिन ये रसोई कैसे बनती है, उसे सुनकर आपको शर्म आएगी कि हम आज भी 18वीं सदी में जीते हैं।
गया की पुलिस लाइन्स में अलग-अलग जातियों की अलग-अलग रसोई है। ब्राह्मणों की अलग रसोई, राजपूतों की अलग रसोई, भूमिहारों की अलग रसोई और दलितों और दूसरी जातियों की अलग रसोई। जाति के हिसाब से कुल 11 रसोई हैं गया की पुलिस लाइन्स में। हर जाति के लोगों का खाना उनकी रसोई में बनता है। हर जाति के वर्दीवाले अपनी रसोई में खाने खाते हैं। और ग़लती से कोई नया रंगरुट अपनी बिरादरी से अलग रसोई में भूख मिटाने चला जाए तो उसे निकाल-बाहर कर दिया जाता है।
जाति की दीवार इतनी ऊंची और मज़बूत है कि पुलिस लाइन्स के बैरक के कमरे भी अलग-अलग जातियों के मुताबिक बंटे हैं। ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, दलित और दूसरी जातियों के लोगों के अलग-अलग बैरक हैं। एक जाति की दूसरी जाति के बैरक में एंट्री पर सख्त मनाही है। पराई जाति वालों का सामान बाहर निकालकर फेंक दिया जाता है।
जाति-व्यवस्था के शर्मिंदा कर देने वाले सच से आला अफ़सर भी वाकिफ़ हैं और मुख्यमंत्री ख़ुद नीतीश कुमार इस व्यवस्था को ख़त्म करने का आदेश दे चुके हैं। लेकिन जातिवादी मेस और बैरक शूल बनकर बिहार के सीने में घुसा है। इसका विस्तार गया से लेकर पटना तक है पर बिहार के डीजीपी साहब का इससे इन्कार है।
डीजीपी भले इससे इनकार करें लेकिन बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग (बीएचआरसी) पुलिस लाइन की जातिवादी बैरक और रसोई पर रिपोर्ट पेश कर इसे बंद करने का आदेश दे चुका है। लेकिन अफ़सोस है कि बिहार में जात पर वोट मांगने वालों ने वर्दीवालों को जातिवाद के जंजाल में क़ैद कर रखा है।
Latest India News