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#Budget2016: सर्कुलर के श्रीगणेश से नॉर्थ ब्लॉक की भूमिका तक, जाने बजट से जुड़ी खास बातें

मोदी सरकार के आगामी बजट से इस बार भी उद्योग जगत, बाजार और आम आदमी को काफी उम्मीदें हैं।

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नई दिल्ली: मोदी सरकार के आगामी बजट से इस बार भी उद्योग जगत, बाजार और आम आदमी को काफी उम्मीदें हैं। हालांकि यह दीगर बात है कि पिछले साल के बजट में मध्य वर्ग को ज्यादा कुछ न दे पाने वाले केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली यह पहले ही कह चुके हैं कि इस बार का बजट ज्यादा लोकलुभावन नहीं होगा। आपको बता दें कि साल 2016 का आम बजट 29 फरवरी को संसद में पेश किया जाएगा। आज हम अपनी खबर में आपको बजट से जुड़ी कुछ ऐसी बातें बताएंगे जिनका जिक्र आपके सामने अक्सर आता है लेकिन आप उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते। तो जानिए और समझिए बजट का पूरा गणित कि आखिर 125 करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान का सालाना बजट कैसे तैयार होता है।

सालाना वित्तीय रिपोर्ट को कहा जाता है बजट:

देश के सालाना आय और व्यय के अनुमान को एक पूरी टीम तय करती है जिसे सालाना वित्तीय रिपोर्ट कहते हैं और इसे ‘बजट’ टर्म भी दिया गया है। दरअसल बजट शब्द फ्रेंच भाषा के बॉजेट से उपजा है जिसका मतलब होता है चमड़े का बटुआ। आप सभी ने देखा होगा कि जब भी कोई बजट पेश किया जाता है वो चाहे रेल बजट हो या फिर आम बजट मंत्रालय से जुड़ा अहम व्यक्ति जिसे सदन में इस दस्तावेज को पेश करना होता है वह अपने हाथ में एक चमड़े का थैला लेकर आता है।

बजट में क्या क्या होता है:

आप सभी सोचते होंगे कि आखिर इस चमड़े के थैले में होता क्या होगा। तो आपको बता दें कि इस थैले में अकाउंट स्टेटमेंट, अनुमानित प्राप्तियां और पूरे वित्तीय वर्ष के अनुमानित खर्च का पूरा ब्यौरा शामिल होता है। हालांकि सरकारी योजनाओं पर होने वाले खर्चों की स्वीकृति पूरी तरह से संसद पर निर्भर करती है। वित्त मंत्री टैक्स, ड्यूटीज और कर्ज के माध्यम से धन जुटाने की मंजूरी संसद से मांगते हैं।

क्या होता है अंतरिम बजट:

भारतीय संविधान में अंतरिम बजट जैसा किसी शब्द का उल्लेख नहीं है। ऐसे में अगर सरकार चाहे तो दो भी बार बजट पेश कर सकती है। दरअसल अंतरिम बजट एक औपचारिक शब्द है जो चुनावी साल के दौरान ही सुनने को मिलता है। दरअसल चुनावी साल में नई सरकार के गठन तक के वक्त तक सरकार को चलाने के लिए खर्चों के इंतजाम की औपचारिकता को ही अंतिरम बजट कहा जाता है। इस तरह के बजट में कोई भी ऐसा नीतिगत फैसला नहीं लिया जाता जिसके लिए संसद की मंजूरी लेनी पड़े और कानून में संशोधन की जरूरत आन पड़े।

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