नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार अपना दूसरा आम बजट 29 फरवरी को पेश करेगी। इस बार के बजट पर उद्योग जगत के साथ-साथ मध्य वर्ग की निगाहें भी टिकी हुई हैं। हम अपनी बजट सीरीज में आपको बताने की कोशिश करेंगे कि बजट के दौरान वित्त मंत्री और सदन में मौजूद लोग जिन शब्दों का उल्लेख करते हैं उनका मतलब क्या होता है। चालू खाते का घाटा से लेकर बैलेंस ऑफ पेमेंट तक ऐसे तमाम शब्द होते हैं जिन्हें जानना एक जागरूक नागरिक के लिए बेहद जरूरी है। तो जानिए बजट के दौरान बोले जाने वाले A to Z शब्दों का मतलब।
एप्रोप्रिएशन बिल (appropriation bill):
यह बिल संचित निधि में से खर्चों के लिए पैसे निकासी को हरी झंडी देने की तरह है। यह वह प्रस्ताव है जिसे संसद लोकसभा में मतदान के बाद पास करती है।
एग्रीगेट डिमांड (Aggregate demand):
यह अर्थव्यवस्था की कुल मांगों का एक योग होता है। इसकी गणना उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं और निवेश पर होने वाले व्यय को जोड़कर इसकी गणना की जा सकती है।
एग्रीग्रेट सप्लाई (Aggregate supply):
यह देश में उत्पादित होने वाली वस्तु एवं सेवाओं का कुल योग होता है और इसमें निर्यातित माल की कीमत को घटाने के बाद आयातित माल की कीमत भी शामिल होती है।
बैलेंस ऑफ पेमेंट (Balance of payments):
भुगतान संतुलन (बीओपी) खाते किसी देश और शेष विश्व के बीच सभी मौद्रिक कारोबार का लेखा-जोखा होता है। दूसरे शब्दों में, यह एक निश्चित अवधि में एक देश और अन्य सभी देशों के बीच समस्त लेन-देन का अभिलेख है। यदि किसी देश को धन मिला है, तो वह ऋण कहलाता है। इसी प्रकार जब कोई देश धन देता है अथवा भुगतान करता है, इसे डेबिट कहते है। सैद्धांतिक तौर पर यह कहा जाता है की भुगतान संतुलन (बीओपी) सदैव शून्य होना चाहिए। इसका अर्थ होता है कि परिसंपत्ति अथवा ऋण और देनदारियां एक -दूसरे के बराबर होनी चाहिए। आसान से शब्दों में कहा जाए तो एक देश और शेष दुनिया के बीच हुए वित्तीय लेनदेन के हिसाब को बैलेंस ऑफ पेमेंट यानी भुगतान संतुलन कहा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक देश और बाकी दुनिया के बीच के आयात निर्यात के दौरान होने वाला वित्तीय लेन-देन शामिल रहता है।
बैलेंस बजट (Balanced budget) :
एक केंद्रीय बजट बैलेंस बजट तब कहलाता है जब वर्तमान प्राप्तियां मौजूदा खर्चों के बराबर होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आय और व्यय पर लगने वाला कर काफी है और इससे वस्तु एवं सेवाओं के भुगतान के साथ साथ राष्ट्रीय कर्ज पर लगने वाले ब्याज को भी अदा किया जा सकता है।
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