चेतन भगत के कश्मीर के युवाओं को पत्र से उठा सामाजिक तूफान
कश्मीर के युवाओं को चेतन भगत ने खुला पत्र लिखा है जिसपर सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है। तो आईये देखते हैं कि आखिर चेतन भगत ने अपने पत्र में क्या लिखा है....

नई दिल्ली: कश्मीर के युवाओं को चेतन भगत ने खुला पत्र लिखा है जिसपर सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है। तो आईये देखते हैं कि आखिर चेतन भगत ने अपने पत्र में क्या लिखा है....
प्रिय कश्मीरी मित्रों (वे जो भारत को पसंद नहीं करते),
मैं इस खुले मंच पर यह पत्र लिख रहा हूं, क्योंकि कश्मीर घाटी में कुछ भयावह घट रहा है। श्रीनगर के एनआईटी में हुई घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा है। कुछ विद्यार्थियों ने तब पटाखे फोड़े जब भारत टी-20 क्रिकेट के सेमीफाइनल में हार गया। कई छात्रों को भारतीय ध्वज फहराने की वजह से पीटा गया। मैं समझता हूं कि कश्मीर घाटी के लोगों में भारत के प्रति सहानुभूति की भावना ज्यादा नहीं है। कई लोग चाहेंगे कि घाटी अपना अलग वजूद बनाए या कुछ को तो पाकिस्तान में शामिल होने में भी हर्ज नहीं होगा। यदि आप भारत से नफरत करते हैं तो भी मैं देशभक्त भारतीय होने के बावजूद आपके खिलाफ मन में कोई पूर्वग्रह नहीं रखूंगा। आपके पास नफरत के कारण होने चाहिए, हैं भी।
किंतु मुझे एक अलग दृष्टिकोण भी पेश करने दें। कश्मीर घाटी के भारत के साथ मिलने में ही आपके सुमदाय का सर्वश्रेष्ठ भविष्य है। यह कोई भावनात्मक, राजनीतिक या ऐतिहासिक दलील नहीं है। यह तो कश्मीर घाटी के उन लोगों के लिए तर्कसंगत तथ्य है, जो बेहतर भविष्य चाहते हैं। पक्की बात है कि विशेषज्ञ मुझ पर टूट पड़ेंगे। वे विशेषज्ञ जिन्होंने कश्मीर समस्या को अपनी जागीर बना लिया है। उनका कॅरिअर तो कश्मीर समस्या सुलझाने के लिए होने वाली कॉन्फ्रेंस, बहसों, सम्मेलनों और इस तरह की सारी बकवासों से भरा पड़ा है। परंतु यदि समस्या वाकई सुलझा ली गई तो इन लोगों की प्रासंगिकता कैसे रहेगी? जो लोग कश्मीर मुद्दे से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें मैं संक्षेप में बता दूं। भारत स्वतंत्र हुआ। रियासतों का एकीकरण किया गया। जम्मू-कश्मीर अलग ही रहा। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और आधा हिस्सा ले लिया (वहां अब भी उसी का नियंत्रण है)। कश्मीर के राजा ने मदद के लिए भारत के साथ रणनीतिक समझौता किया। भारत ने मदद की। मदद के बदले में जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया, लेकिन उसके साथ कुछ शर्तें थीं। जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान होगा, अन्य राज्यों की तुलना में उसे अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता होगी जबकि आर्थिक, विदेश नीति और रक्षा संबंधी मामले भारत देखेगा। सिद्धांतत: यह अच्छा समाधान था। योजना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर के दो संरक्षक होने की बजाय वह अनाथ हो गया। पाकिस्तान ने इसका फायदा उठाया और इस्लाम की समानता को देखते हुए आतंकवाद शुरू कर दिया। भारतीय सेना ने काबू पाने की कोशिश की, लेकिन ऐसे आतंकवाद पर काबू पाना मुश्किल होता है, जो नागरिक आबादी में रचा-बसा हो (आईएसआईएस का उदाहरण सामने है, जिसे दुनिया की महाशक्तियां भी काबू में नहीं ला पा रही हैं)। नतीजतन भारतीय सेना और भारत को कश्मीर घाटी में केवल बदनामी ही मिली। सवाल यह है कि कश्मीरी युवा अब क्या करें? पहली बात तो सिर्फ कश्मीरियों को ही नहीं, हर किसी को उस इलाके व आबादी को समझना होगा।
भारत चाहे इस पर दावा करता हो, लेकिन यदि हमें नागरिकों के बड़ी संख्या में मारे जाने से फर्क न पड़ता हो (हकीकत में ऐसा है नहीं, हमें फर्क पड़ता है) तो ही हम इसे हासिल कर पाएंगे। इसलिए भारतीय नियंत्रण वाले हिस्से पर ध्यान केंद्रित करें। इसे तीन भागों में बांटा जा सकता है लद्दाख, जम्मू और कश्मीर घाटी। ज्यादातर उपद्रव कश्मीर घाटी में है। भारतीय नक्शे में जो कश्मीर हम देखते हैं, यह कश्मीर घाटी उसका करीब सात फीसदी हिस्सा है। लगभग मणिपुर के बराबर। यहां की आबादी है 70 लाख यानी चेन्नई के बराबर। जमीन ऊबड़-खाबड़ है और पूरा एरिया चारों ओर से जमीन से घिरा हुआ है। यदि हम यह दलील मान भी लें कि भारत एक भयानक देश है और इसलिए कश्मीर घाटी को खुद मुख्तियारी देनी चाहिए, तो क्या वाकई आपको लगता है कि आप कोई स्थायी देश का स्वरूप इसे दे सकेंगे। यह उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में एक छोटा-सा टुकड़ा होगा और भारत व पाकिस्तान दोनों उसे तकलीफ देंगे। कोई अर्थव्यवस्था न होने और विशाल पड़ोसियों पर बुरी तरह निर्भरता के कारण इसे आतंकवाद, मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध व्यापार का गढ़ बनने का खतरा रहेगा। फिर कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों द्वारा इस पर कब्जे का जोखिम भी रहेगा। ऐसी खतरनाक जगह पर बाहर से निवेश की संभावना नहीं होगी। न तो नौकरियां होंगी और न कोई सुरक्षा। क्या आप ऐसी जगह में रहना चाहेंगे? यही हालत इसके पाकिस्तान में शामिल होने पर भी होगी, जबकि भारत को आज बड़े, उभरते आर्थिक बाजार के रूप में देखा जाता है।
एक अन्य मुद्दा महिला अधिकारों का है। 70 लाख की आबादी में आधी तो महिलाएं होंगी ही, कट्टरपंथी इस्लामी शासन में महिला अधिकारों की हालत तो खराब ही होगी फिर चाहे घाटी आज़ाद रहे या पाकिस्तान के साथ जाए। या महिलाएं क्या सोचती हैं, इसका आपके लिए कोई अर्थ ही नहीं है? यदि आप कश्मीर की परवाह करते हैं तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि आप भारत के साथ एकजुट हो जाएं। आपकी आबादी सिर्फ 70 लाख है। एकजुट होकर ऐसा समूह बनाना कोई दूर की कौड़ी नहीं है, जो भारत सरकार के साथ व्यावहारिक मुद्दों पर बात करे। अापके स्थानीय नेता एकीकरण की बात नहीं करेंगे, क्योंकि मौजूदा स्थिति में उनके पास अन्य राज्यों की सरकारों से ज्यादा ताकत होगी। किंतु आप युवाओं के लिए सबसे अच्छा विकल्प घाटी को सच्चे अर्थों में भारत का हिस्सा बनाना है। अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग घाटी के 70 लाख लोग करें। जिन कश्मीरी पंडितों को घाटी से भागने पर मजबूर किया गया था, उन्हें वापस लाने की जरूरत है। आतंकवाद कोई हल नहीं है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान घाटी के लोगों को ही होगा। घाटी के लोग साथ आएं या न आएं, भारत आगे बढ़ सकता है और बढ़ता जाएगा। परंतु अब यह घाटी के युवाओं पर है कि वे इस समस्या को वास्तव में सुलझाने के लिए आंदोलन चलाएं। अनुच्छेद 370 से पिंड छुड़ा लीजिए। इससे कश्मीर को कोई ताकत नहीं मिलती। इससे तो केवल आपके स्थानीय नेताओं को ताकत मिलती है, जो साफ कहूं तो भारत के साथ आए बगैर आपके लिए कुछ नहीं कर सकते। भारतीय सेना को दोष मत दीजिए। नागरिक आबादी में से आतंकवादियों को खत्म करना बहुत कठिन काम है। नागरिकों को नुकसान पहुंचाए बिना इसे अंजाम देना नामुमकिन-सी बात है। दोष तो उन्हें दीजिए जो वाकई इसके लिए जिम्मेदार हैं- पाकिस्तानी सेना व स्थानीय नेता, जिन्होंने स्थिति को खूब भुनाया है अौर उन विशेषज्ञों को, जिन्होंने आपके लिए कभी कुछ नहीं किया। भारत की नाकामी पर खुशी महसूस मत कीजिए, क्योंकि यदि भारत नाकाम हुआ तो आप भी नाकाम होंगे। जय हिंद! जय कश्मीर!
चेतन भगत