भावुक हुए CJI टीएस ठाकुर, अधिवेशन में मौजूद थे पीएम मोदी
मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीशों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए आज भारत के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर का गला भर आया।

नई दिल्ली: भारत के चीफ जस्टिस (CJI) टीएस ठाकुर आज उस वक्त भावुक हो गए जब वो मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीशों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे। सीजेआई बोलते बोलते अचानक भावुक हो गए और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए। उन्होंने रुमाल से अपने आंसू पोछे और फिर अपनी बात कही। दरअसल चीफ जस्टिस ने आज देश में जजों की संख्या में भारी कमी की बात सामने रखी और बताया कि इस वजह से ही आज देश में लाखों मामले लंबित हैं। गौरतलब है कि इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे।
WATCH: Chief Justice of India TS Thakur breaks down during his speech at Jt conference of CMs and CJ of HCs in Delhihttps://t.co/xD1tro8rmX
— ANI (@ANI_news) April 24, 2016
क्या बोले टी एस ठाकुर:
इस समय लोगों और जजों के अनुपात की बात करें तो यह प्रति दस लाख पर 15 है जो कि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा से काफी पीछे है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 1987 में 40 हजार जजों की जरूरत थी। 1987 से लेकर आज तक आबादी में 25 करोड़ लोग जुड़ गए हैं। हम दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हो गए हैं, हम देश में विदेशी निवेश आमंत्रित कर रहे हैं, हम चाहते हैं कि लोग भारत आएं और निर्माण करें, हम चाहते हैं कि लोग भारत में आकर निवेश करें।
उन्होंने मोदी के मेक इन इंडिया और कारोबार करने में सरलता अभियानों का जिक्र करते हुए कहा, जिन्हें हम आमंत्रित कर रहे हैं वे भी इस प्रकार के निवेशों से पैदा होने वाले मामलों और विवादों से निपटने में देश की न्यायिक व्यवस्था की क्षमता के बारे में चिंतित हैं। न्यायिक व्यवस्था की दक्षता महत्वपूर्ण रूप से विकास से जुड़ी है। विधि मंत्रालय द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी को कार्यक्रम में नहीं बोलना था।
लंबित मामलों की संख्या का जिक्र करते हुए न्यायाधीश ठाकुर ने कहा कि उच्च न्यायालयों में 38 लाख से अधिक मामले लंबित हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार यह कहती रही है कि वह न्यायपालिका की सहायता करने के लिए तैयार है तो यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे ढांचे और जजों की संख्या में सुधार करें।
उन्होंने कहा कि राज्य चाहते हैं कि इसके लिए केंद्र धन मुहैया कराए। यह रस्साकशी चलती रहती है और जजों की संख्या वहीं की वहीं रहती है। पांच करोड़ मामलों की सुनवाई हुई और दो करोड़ निपटाए गए। लेकिन जजों के काम करने की क्षमता की एक सीमा है। जजों द्वारा जजों को नियुक्त करने की कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम लाए जाने के संबंध में उन्होंने कहा कि जब यह विवाद उच्चतम न्यायालय में था तो रिक्तियों की संख्या बढ़ रही थी। शीर्ष अदालत ने इस कानून को रद्द कर दिया था जिसके बाद कोलेजियम सिस्टम फिर से वापस आ गया।
न्यायाधीश ठाकुर ने कहा कि कोलेजियम ने उसे भेजे गए सभी प्रस्तावों को छह सप्ताह में निपटा दिया। 145 जजों को उच्च न्यायालयों में स्थायी जजों के रूप में पदोन्नत किया गया या अतिरिक्त न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किया गया। 169 प्रस्ताव अभी भी सरकार के पास लंबित हैं। उन्होंने सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की सेवाओं का इस्तेमाल करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 224 के प्रावधानों के क्रियान्वयन के विचार का भी समर्थन किया।
आंकड़ों का हवाला देते हुए न्यायाधीश ठाकुर ने बताया कि 1950 में जब शीर्ष अदालत अस्तित्व में आई थी तो शीर्ष अदालत में सीजेआई समेत आठ जज थे और 1215 मामले लंबित थे। उस समय प्रति जज सौ मामले लंबित थे। 1960 में जजों की संख्या 14 हो गई और लंबित मामले बढ़कर 3247 हो गए । 1977 में जजों की संख्या 18 और मामलों की संख्या 14501 हो गई। वर्ष 2009 आते आते शीर्ष अदालत में जजों की संख्या 31 हुई और लंबित मामले 77181 हो गए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में मामलों की संख्या 81582 थी जिसे 60260 किया गया। दो दिसंबर को जब मैंने सीजेआई का पद संभाला जो 17, 482 मामलों में से 16, 474 मामलों को निपटाया गया।
क्या बोले पीएम मोदी:
मोदी ने कहा कि यदि संवैधानिक अवरोधक कोई समस्या पैदा नहीं करें तो शीर्ष मंत्री और उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ जज बंद कमरे में एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर कोई समाधान निकाल सकते हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह तय करना सभी की जिम्मेदारी है कि आम आदमी का न्यायपालिका में भरोसा बना रहे और उनकी सरकार जिम्मेदारी को पूरा करेगी तथा आम आदमी की जिंदगी को सुगम बनाने में मदद करने से पीछे नहीं हटेगी।
मोदी ने न्यायाधीश ठाकुर द्वारा उठाए गए मुद्दों के संदर्भ में कहा, जब जागो तब सवेरा। उन्होंने कहा, मैं उनके दर्द को समझ सकता हूं क्योंकि 1987 के बाद से काफी समय बीत चुका है। जो भी मजबूरियां रही हों लेकिन देर आयद दुरूस्त आए। हम भविष्य में बेहतर करेंगे। देखते हैं कि बीते हुए काल के बोझ को कम करते हुए कैसे आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के बतौर ऐसे ही एक सम्मेलन में भाग लेने की घटना को याद करते हुए कहा कि उन्होंने उस समय अदालतों में छुट्टियों को कम करने , सुबह और शाम के समय अदालतें लगाने का सुझाव दिया था लेकिन सम्मेलन में भोजनावकाश के दौरान कुछ जजों ने उनके इस विचार पर सवाल उठा दिए थे।