जयपुर: राजस्थान में संपूर्ण शराबबंदी और मजबूत लोकायुक्त की मांग को लेकर पिछले 31 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा का मंगलवार को निधन हो गया। राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने बताया कि छाबड़ा ने मंगलवार सुबह 4 बजकर 30 मिनट पर अंतिम सांस ली।
31 दिनों से अनशन कर रहे 72 वर्षीय छाबड़ा की हालत कल बहुत नाजुक हो गई थी। जिसके चलते उन्हें गहन चिकित्सा इकाई में वेंटिलेटर पर रखा गया था। उपचार के दौरान वे कोमा में चले गए और आज सुबह 4 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
गांधी जयंती पर अनशन पर बैठे थें छाबड़ा
प्रदेश में संपूर्ण शराबबंदी की मांग को लेकर पूर्व विधायक काफी लम्बे समय से आंदोलन कर रहे थे। छाबड़ा ने चौथी बार आमरण अनशन 2 अक्टूबर 2015 को शुरू किया था। साल 2014 के अप्रैल-मई में भी उन्होंने अनशन किया था। तब वंसुधरा राजे सरकार ने उनके सात लिखित समझौता किया था कि जल्द ही सशक्त लोकायुक्त और शराबबंदी के लिए कमेटी गठित की जाएगी। लेकिन लिखित वादे के एक साल बाद भी कुछ नहीं होने पर छाबड़ा इस साल 2 अक्टूबर को फिर से अनशन पर बैठ गए। छाबड़ा मांग कर रहे थे सरकार पिछले साल मई में दिए गए लिखित आश्वासन को लागू करे।
इस बार राज्य के कई संगठनों और सक्रिय लोगों ने उनके आन्दोलन का समर्थन किया. अनशन के 17वे दिन पुलिस ने उन्हें अनशन स्थल से उठा लिया और जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में जबरन भर्ती करा दिया. वहां पर भी छाबड़ा ने अपना अनशन जारी रखा।
दान की जाएगी देह
पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक छाबड़ा की इच्छा के अनुसार उनकी देह को दान करने का निर्णय लिया गया है और उनकी आंखों को भी दान किया जाएगा।
सूरतगढ़ से चुने गए थे विधायक
पूर्व विधायक गुरुशरण छाबड़ा ने प्रसिद्ध सर्वोदयी नेता गोकुलभाई भट्ट के साथ मिलकर शराबबंदी के लिए चलाये गए अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई. 1977 में सूरतगढ़ से जनता पार्टी से वे विधायक चुने गए थे. प्रदेश के सर्वोदयी तथा गांधीवादी आन्दोलन से भी उनका नजदीकी रिश्ता था.
निशाने पर वसुंधरा सरकार
गुरुशरण छाबड़ा गांधीवादी तरीकों से अपनी मांग के समर्थन में पहले की सरकारों में आंदोलन करते रहे है। साल 2003 में गहलोत सरकार के समय भी उन्होंने अनशन किया था। तत्कालीन सीएम अशोक गहलोत ने अपने हाथ से जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया था। इसके बाद 2014 में फिर उन्होंने अनशन किया जौ राज्य सरकार के लिखित समझौते से खत्म हुआ। लेकिन इस बार वंसुधरा सरकार छाबड़ा के आंदोलन के प्रति संवेदनहीन रही। एक महीने से अनशन पर बैठे बुजुर्ग गांधीवादी नेता से बातचीत तक करना भी सरकार ने उचित नहीं समझा। संवेदनहीनता के आरोपों के चलते मुख्यंमत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ती जा रही है।
Latest India News