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शव जलाने नहीं, दफनाने को मजबूर हैं यहां के हिंदू

हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक अपनों की मौत के बाद उनके शवों को जलाकर परिजन उनकी मुक्ति की कामना करते हैं। दरअसल यह पारंपरिक सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा मसला होता है।

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नई दिल्ली: हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक अपनों की मौत के बाद उनके शवों को जलाकर परिजन उनकी मुक्ति की कामना करते हैं। दरअसल यह पारंपरिक सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा मसला होता है। हिंदू हिंदुस्तान के किसी भी भू-भाग में रहता हो मृत्यु के बाद उसके शव को जलाया ही जाता है। लेकिन मजबूरी भी कभी-कभी आपको कुछ ऐसा करने पर मजबूर कर देती है कि आप अपनी संस्कृति और रीतिरिवाजों की चाहकर भी परवाह नहीं कर पाते। बिहार के लखीसराय जिले में एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां पर हिंदू अपने प्रियजनों के शवों को दफनाने पर मजबूर हैं।

मजबूरी ने बदल दी दाह संस्कार की प्रक्रिया:   

लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड में कजरा के जंगलों में रहने वाले आदिवासी शवों को जलाने की स्थिति में नहीं हैं और वो उन्हें दफनाने को मजबूर हैं। बताया जाता है कि आर्थिक तंगी इस समुदाय को दाह संस्कार की प्रक्रिया से भी दूर कर चुकी है। गरीबी ने इस समुदाय को उन तमाम रीति-रिवाजों से कोसों दूर कर दिया है, जो धार्मिक रुप से अहम माने जाते हैं। गरीबी के कारण ही ये लोग अन्य लोगों (मुस्लिम, क्रिश्चियन और यहूदी) की तरह ही अपने शवों को दफना रहे हैं। शवों को दफनाने के पीछे का तर्क यह है कि गरीबी के कारण ये हिंदु समुदाय दाह संस्कार का खर्च भी वहन करने की स्थिति में नहीं है।

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