रायगढ़: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में धार्मिक आस्था और अंधविश्वास के कारण 11 वर्षीय एक आदिवासी बालिका ने अपनी जीभ काटकर शिव लिंग पर चढ़ा दी। रायगढ़ जिले के अनुविभागीय दंडाधिकारी प्रकाश सर्वे ने बताया कि जिला मुख्यालय से लगे सागीतराई गांव में बालिका चमेली सिदार ने धार्मिक आस्था और अंधविश्वास के कारण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपनी जीभ काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दी। गौरतलब है कि आजाद हिंदुस्तान में आज भी कुछ लोग प्राचीन मान्यताओं के हिसाब से पशु बलि देते हैं।
सर्वे ने बताया कि मामला धार्मिक आस्था से जुड़े होने के कारण ग्रामीणों ने बालिका को उपचार के लिए अस्पताल ले जाने से मना कर दिया है। जिला प्रशासन द्वारा बालिका के उपचार के लिए मौके पर ही चिकित्सक की व्यवस्था की गई है। अधिकारी ने बताया कि रायगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर दूर सागीतराई निवासी चमेली भगवान शिव की भक्त है। शनिवार को वह करीब के शिव मंदिर गई और अपनी जीभ काटकर शिवलिंग में चढ़ा दी। इस दौरान चमेली बेहोश हो गई। देर तक जब वह घर नहीं लौटी तब उसके परिजनों ने उसकी खोज शुरू की।
उन्होंने बताया कि चमेली पिछले पांच दिनों से मंदिर में बैठी है तथा वह आस्था का केंद्र बन गई है। मंदिर में भीड़ लगने के बाद गांव के सरपंच गोपाल ने इसकी जानकारी पुलिस को दे दी है। ग्रामीणों के अनुसार इस शिव मंदिर में पूर्व में भी तीन युवतियों ने अपनी जीभ काटकर शिव लिंग पर चढ़ाई है। बिना उपचार के ठीक होने के कारण ग्रामीण इन घटनाओं को दैवीय चमत्कार मान रहे हैं।
उज्जैन के एक मंदिर में दी जाती थी नर बलि:
ऐसे अनेक किस्से मशहूर हैं कि प्राचीन काल में दुनिया के कई देशों में धार्मिक और अन्य कारणों से इनसान की बलि दी जाती थी। भारत भी ऐसे किस्सों से अनछुआ नहीं है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां किसी ज़माने में इनसानों की बलि दी जाती थी। आपको यह जानकर जरूर हैरानी होगी, लेकिन यह सच है। बताया जाता है कि भारत के शहर उज्जैन में प्राचीन समय में हर दिन इनसानों की बलि दी जाती थी। इस मंदिर का नाम भूखी माता का मंदिर है। इस मंदिर की कहानी सम्राट विक्रमादित्य के राजा बनने से जुड़ी है।
इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर प्रतिदिन एक व्यक्ति की बलि चढ़ाई जाती थी। जिस भी लड़के को अवंतिका नगरी का राजा बनाया जाता था, भूखी माता उसे खा जाती थी। एक बार एक दुखी मां को विलाप करते देख विक्रमादित्य ने उसके पुत्र की रक्षा का वचन दिया। विक्रमादित्य ने कहा कि उसके बेटे की जगह वे स्वयं भूखी माता का भोग बन जाएंगे। राजा बनते ही विक्रमादित्य ने पूरे शहर को स्वादिष्ट व खुशबू वाले व्यंजनों से सजाने का आदेश दिया। जगह-जगह छप्पन भोग सजाए गए। भूखी माता की भूख विक्रमादित्य को अपना आहार बनाने से पहले ही खत्म हो गई। साथ ही उन्होंने विक्रमादित्य को प्रजा पालक चक्रवर्ती सम्राट होने का आशीर्वाद दिया। इस प्रकार मानव बलि की यह प्रथा समाप्त हुई।
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