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जम्मू-कश्मीर HC: गौमांस बिक्री पर कानूनी प्रतिबंध का फैसला रद्द

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने गौवंश हत्या और गौमांस बिक्री पर कानूनी प्रतिबंध लागू करने के अदालत के पिछले आदेश को आज रद्द करते हुए कहा कि राज्य सरकार को कानूनों

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J&K HC: गौमांस बिक्री पर कानूनी प्रतिबंध का फैसला रद्द

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने गौवंश हत्या और गौमांस बिक्री पर कानूनी प्रतिबंध लागू करने के अदालत के पिछले आदेश को आज रद्द करते हुए कहा कि राज्य सरकार को कानूनों की समीक्षा करनी होगी और यह सुनिश्चित करते हुए संवैधानिक रूपरेखा के दायरे में फैसले लेने होंगे कि अंतर-धार्मिक संघर्ष नहीं हों। न्यायमूर्ति मुजफ्फर हुसैन अत्तार, न्यायमूर्ति अली मुहम्मद मगरे और न्यायमूर्ति ताशी रबस्तान की पीठ के इस आदेश से पहले की यथास्थिति बहाल हो गई है।

उच्चतम न्यायालय ने पांच अक्तूबर को पीठ से गौमांस पर पाबंदी के मुद्दे के समाधान के लिए कहा था। उच्च न्यायालय की श्रीनगर और जम्मू की खंडपीठों के इस विषय पर भिन्न फैसले देने के बाद ऐसा किया गया। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत का रख किया था। पीठ ने याचिकाओं का निस्तारण किया और इस मुद्दे पर समय समय पर पारित अदालती आदेशों को निष्प्रभावी कर दिया। पूर्ण पीठ ने अपने 25 पन्नों के आदेश में कहा, जम्मू कश्मीर राज्य को इस आदेश में की गयी टिप्पणी के मद्देनजर मौजूदा कानूनों की समीक्षा पर विचार करना होगा और संविधान की रूपरेखा के दायरे में नीतिगत फैसले लेने होंगे और साथ ही सुनिश्चित करना होगा कि राज्य की जनता के बीच कोई अंतर-धार्मिक संघर्ष नहीं हो। उच्चतम न्यायालय ने राज्य में एक सदी से अधिक समय पुरानी गौमांस पाबंदी को लागू करने के लिए पुलिस अधिकारियों को निर्देश देने वाले राज्य उच्च न्यायालय की खंडपीठ के नौ सितंबर के आदेश को दो महीने तक लंबित रखा जिसके बाद पूर्ण पीठ का गठन किया गया।

उच्च न्यायालय की जम्मू खंडपीठ ने नौ सितंबर को अपने आदेश में राज्य पुलिस प्रमुख से राज्य में गौकशी और गौमांस बिक्री पर पाबंदी को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने को कहा था। हालांकि एक सप्ताह बाद श्रीनगर में उच्च न्यायालय की एक और खंडपीठ ने गौवध और गौमांस बिक्री पर पाबंदी को नियंत्रित करने वाले दंडनीय प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किए और एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बाद में राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के दो आदेशों से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय का रख किया था।

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