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जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद से अधिक घातक हैं सड़कें

जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवाद से कहीं अधिक जानें सड़कें लेती हैं। ऐसा हम नहीं सरकारी आंकड़े बताते हैं।

Road Accidents

जम्मू एवं कश्मीर में पिछली और मौजूदा सरकारों ने बेहतर सड़क सम्पर्क के लिए महत्वाकांक्षी परियोजना बनाई है। यहां के बुजुर्ग लोगों का कहना है कि वे बीते 50 साल से सड़कों की यही हालत देख रहे हैं जबकि इन सालों में ट्रैफिक काफी बढ़ा है। राज्य में बीते पांच साल में 5 लाख नए वाहनों का पंजीकरण हुआ है। अब राज्य में कुल वाहनों की संख्या 12 लाख हो गई है लेकिन सड़क प्रबंधन प्रणाली की रफ्तार बढ़ते वाहनों की संख्या के साथ कदम नहीं मिला सकी।

अभी हाल तक ट्रैफिक विभाग में कार्यरत एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शैलेंद्र मिश्रा ने कहा कि बेहतर प्रबंधन और नियमों को कड़ाई से लागू करने से सड़क दुर्घटनाओं में कमी ला सकती है। राज्य में सड़क दुर्घटनाओं से मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफे का कारण यह भी है कि यहां कोई ट्रामा सेंटर नहीं है, जहां आपात स्थिति में मरीजों को लाया जा सके और उनकी जान बचाई जा सके।

पुलिस सड़क दुर्घटनाओं के कई कारण गिना रही है लेकिन यहां के कार्यकर्ता मानते हैं कि जब तक राज्य में चौड़ी सड़कें नहीं बन जातीं और नियमों का कड़ाई से पालन नहीं होता, तब तक पुलिस अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। उसका काम दुर्घटनाओं को कम करना है। वकील और सामाजिक कार्यकर्ता साजाद शेख ने संवाददाता से कहा, "पुलिस की क्या प्राथमिकता है, यह सालों से साफ नहीं रहा है। पुलिस को सिर्फ अशांति के समय ही काम नहीं करना है।"

एक अन्य कार्यकर्ता जावेद काकरू कहते हैं कि सरकारें परिवहन व्यवस्था दुरुस्त करने को लेकर मुस्तैद नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर उनका कहना है कि श्रीनगर में सड़कें अभी से काफी पतली लगने लगी हैं। दुकानदार पैदल पथ को अवरुद्ध किए रहते हैं, जिससे कि सड़क पर चलना मुश्किल हो गया है। जावेद कहते हैं कि पहले तो सरकार को सड़क पर दुकान लगाए व्यापारियों को हटाना चाहिए और उसके बाद सड़कों को चौड़ी करने के बारे में सोचना चाहिए।

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