नई दिल्ली: इस वर्ष 5 सितम्बर को भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को महाजन्माष्टमी पूरे देश में मनाई जाएगी। ऐसे तीन योग हैं, जो कई वर्षो बाद बने हैं। 26 वर्षों बाद जन्माष्टमी बृहस्पति, सूर्य सिंह संक्रांति में आयी है 20 वर्षों बाद स्मार्त एवं वैष्णवों दोनों संप्रदाय की जन्माष्टमी साथ में आयी है। 2 वर्षों बाद अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में पूरे दिन रहेगी और ऐसा अगला महायोग 8 साल बाद 6/9/2023 को बनेगा।
कृष्ण जन्मभूमि पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती हें और पूरे दिन व्रत रखकर नर-नारी तथा बच्चे रात्रि 12 बजे मन्दिरों में अभिषेक होने पर पंचामृत ग्रहण कर व्रत खोलते हैं। कृष्ण जन्म स्थान के अलावा द्वारकाधीश, बिहारीजी एवं अन्य सभी मन्दिरों में इसका भव्य आयोजन होता हैं, जिनमें भारी भीड़ होती है।
श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।
जन्माष्टमी के मौके पर पूजा मुहूर्त रात में 11 बजकर 56 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। इस तरह से पूजा की अवधि 46 मिनट की होगी। यह भगवान श्री कृष्ण का 5242वां जन्मोत्सव होगा।
जन्माष्टमी के दिन अगर आप व्रत रखते हैं तो उसका पारण आप अगले दिन यानी कि 6 सितंबर को सुबह 6 बजकर 5 मिनट के बाद कभी भी कर सकते हैं। दही हांडी भी 6 सितंबर को होगी।
अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है। जब-जब ऎसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त संप्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव संप्रदाय के लोगों के लिए होती है। अक्सर उत्तर भारत में श्रद्धालु स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी का भेद नहीं करते और दोनों संप्रदाय की जन्माष्टमी एक ही दिन मनाते हैं। यह सर्वसम्मति इस्कॉन संस्थान की वजह से है। कृष्ण चेतना के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदायं संस्था, जिसे इस्कॉन के नाम से जाना जाता है, वैष्णव परंपराओं और सिद्धांतों के आधार पर निर्माणित की गई है।
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