कुंभ हमारी सभ्यता का संगम
हिमालय को देवो का निवास स्थान माना जाता है। गंगा का उद्गम हिमालय से ही हुआ है। गंगा जंगलों, पर्वतों, और समतल मैदानों से होते हुए अंतत: सागर में मिल जाती है। यमुना भी पवित्र मानी जाती है। यमुना को त्रिपथगा, शिवपुरी आदि नामों से भी जाना जाता है। गंगा ने सूर्यवंशी राजा सागर के पुत्रों को श्राप से मुक्त किया था। गंगा के जल को अमृत माना जाता है।
कुंभ मेला कब कहां और क्यों ?
कुंभ मेले का उत्सव सूर्य और बृहस्पति की स्थिति पर निर्भर करता है। जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में आता है, तब यह हरिद्वार में मनाया जाता है। जब बृहस्पति वृषभ राशि में है और सूर्य मकर राशि में होता आता है, तो कुंभ प्रयाग में मनाया जता है। मेला उज्जैन में मनाया जाता है जब बृहस्पति और सूर्य वृश्चिक राशि में आते हैं। यह कहा जाता है कि जब बृहस्पति और सूर्य राशि चक्र चिन्ह, सिंह राशि तब कुंभ मेला नासिक में त्र्यंबकेश्वर में मनाया जाता है।
नासिक का कुम्भ पर्व-
भारत में 12 में से एक जोतिर्लिंग त्र्यंबकेश्वर नाम के पवित्र शहर में स्थित है। यह स्थान नासिक से 38 किलोमीटर की दूरी पर है और गोदावरी नदी का उद्गम भी यहीं से हुआ बताया जाता है। 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार नासिक उन चार स्थानों में से एक है जहां अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं। कुम्भ मेले में सैंकड़ों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। यहां पर शिवरात्रि का त्यौहार भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।
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