अब सवाल यह उठता हे कि आखिर क्या है शाही स्नान और क्यों होता रहा है इसके लिया खूनी संघर्ष ?
शाही स्नान सैकड़ों साल से सन्तों के लिए मान-मर्यादा का प्रश्न रहा है। अखाड़ों से जुड़े सन्त-संन्यासियों के अलावा अन्य कोई शाही स्नान नहीं कर सकता और उसका हिस्सा भी नहीं बन सकता। कुंभ में संन्यासियों, बैरागियों, उदासीनों और निर्मलों के 13 अखाड़ों के संन्यासियों को शाही स्नान की योग्यता हासिल है।
इस परंपरा का कोई दार्शनिक और आध्यामिक आधार नहीं मिलता, लेकिन इसका सामाजिक-सांस्कृतिक आधार जरूर मौजूद है। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रांताओं का मुकाबला करने के लिए संन्यासियों के बीच से नागाओं की फौज खड़ी की गई।
इस फौज को अखाड़ों के महामंडलेश्वरों ने वैचारिक-आध्यात्मिक आधार प्रदान किया। इसी फौज ने धर्म-रक्षा के लिए अनेक छोटे-बड़े युद्ध लड़े। कई ऐसे युद्धों में परधर्मी हमलावरों को परास्त किया जहां संबंधित क्षेत्र के राजा की शक्ति कमजोर पड़ रही थी।
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