लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा के इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब रविवार को सदन की बैठक हुई और इसमें कई महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किए गए। सदन में 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे की रिपोर्ट भी पटल पर रखी गई, जिसमें मुख्य रूप से तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) सुभाष चंद्र दुबे और स्थानीय खुफिया यूनिट (एलआईयू) के तत्कालीन इंस्पेक्टर प्रबल प्रताप सिंह के अलावा बसपा और भाजपा के नेताओं को दोषी ठहराया गया है।
न्यायमूर्ति विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट में दंगों के लिए मुख्य रूप से तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) सुभाष चंद्र दुबे और स्थानीय खुफिया यूनिट (एलआईयू) के तत्कालीन इंस्पेक्टर प्रबल प्रताप सिंह को भी दोषी माना है। आयोग ने दोनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को कहा है। आयोग ने दंगे भड़कने के 14 कारण गिनाए हैं। बसपा व भाजपा नेताओं के बारे में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि उनके खिलाफ दंगा भड़काने का मुकदमा दर्ज है, इसलिए आयोग उनके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 20(2) के तहत सरकार को कोई कार्रवाई करने के लिए विधिक रूप से नहीं कह सकता।
राज्य सरकार ने 27 अगस्त 2015 से 15 सितंबर 2013 के बीच मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों की जांच के लिए न्यायमूर्ति विष्णु सहाय की अध्यक्षता में आयोग गठित किया था। आयोग ने 700 पन्नों में अपनी रिपोर्ट में दंगे के कारणों का विस्तार से ब्योरा दिया है।
रिपोर्ट में इन दंगों के लिए प्रदेश की अखिलेश सरकार को न सिर्फ क्लीन चिट दिया गया है, बल्कि भाजपा और बसपा नेताओं को दोषी ठहराए जाने के साथ इस मामले से निपटने के लिए सरकार के कदम की तारीफ भी की गई है। सदन में इसके अलावा नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की चार रिपोर्ट तथा अलीगढ़ के टप्पल में किसानों पर हुई फायरिंग की जांच रिपोर्ट भी रखी गई।
विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे ने बताया कि कैग द्वारा 31 मार्च, 2015 को सौंपी चार रिपोर्ट के अलावा मुजफ्फरनगर में हुए वर्ष 2013 में हुए दंगों तथा अलीगढ़ के टप्पल में हुई फायरिंग की रिपोर्ट सदन में रखी गई। मुजफ्फरनगर दंगों के सिलसिले में जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ नेताओं ने प्रदेश में खूनी संघर्ष कराने के उद्देश्य से इसे यूट्यूब पर वायरल किया।
इस मामले में भाजपा विधायक संगीत सोम को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत तथा पार्टी के दूसरे विधायक सुरेश राणा के साथ बंद किया गया था, लेकिन उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण करार देते हुए जांच पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब सपा के इशारे पर किया गया है। उन्होंने कहा कि न्यायिक जांच आयोग ने दंगों के मामले में उनका बयान दर्ज नहीं किया, यह सब सत्तारूढ़ पार्टी को बचाने के लिए किया गया है।
गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर में 13 दिन तक दंगे होते रहे। दंगों की जांच के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग नौ सितंबर, 2013 को गठित किया गया था। जांच आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने में दो साल का समय लगा। दंगों में 68 लोग मारे गए थे तथा 50 हजार लोगों को शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा था। न्यायिक जांच आयोग ने इस मामले में 377 लोगों से पूछताछ की, जिसमें 100 से अधिक वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
Latest India News