नई दिल्ली: डिस्ट्रिक्ट लेवल से लेकर जूनियर नेशनल लेवल तक बॉक्सिंग में अपना नाम रोशन कर चुके कमल कुमार अब कानपुर में कूड़ा बटोरते हैं, वो भी चेहरा छुपाकर, ताकि कोई पहचान न ले।
36 साल का कमल अपने बेटों को मुक्केबाज बनाने का सपना देख रहा है इसीलिये नगर निगम में अस्थायी नौकरी के बाद बाकी समय में रात को रिक्शा चलाता है ताकि वह अधिक से अधिक पैसा कमा सकें ताकि जो वो खुद नहीं कर सका वह अपने दो बच्चों से करवा सके।
कमल कुमार वाल्मीकि जिस बस्ती में रहते थे, वहां झगड़े और मारपीट आम बात थी। खुद के बचाव में घूंसे चलते थे, जो बाद में एक शौक के तौर पर डिवेलप हो गया। कमल बॉक्सर बन गए।
डिस्ट्रिक्ट लेवल पर उन्होंने 3 बार गोल्ड मेडल जीते। 1993 में यूपी ओलंपिक्स में मिला ब्रॉन्ज मेडल। 2006 में स्टेट गेम्स में भी ब्रॉन्ज घर आया। 2011 में इंटर यूनिवर्सिटी गेम्स में सिल्वर मिला।
वह कहते है कि मुक्केबाजी के जुनून के आगे वह पढ़ नही सके थे इसलिये उन्होंने सफाई कर्मचारी का खानदानी पेशा ही अपनाया। इसलिये अब वे नगर निगम के एक ठेकेदार के अन्तर्गत सफाई, कूडा और गंदगी उठाने का काम करते है। उन्हें ठेकेदार ने 4200 रुपये महीना देने का वायदा किया है। शाम से लेकर रात तक वह रिक्शा चलाते है और 100 से 200 रुपये रोज कमा लेते है।
कमल कहते है कि हमारे मुक्केबाजी के सपने तो दफन हो गये है लेकिन मेरे चार बेटे है जिनमें से दो बडे बेटों सुमित (14) और आदित्य (12) को मैं बॉक्सिंग की ट्रेनिंग दिलवा रहा हूं और इन्हें मुक्केबाज बनाने के लिये मुझे कुछ भी करना पडे उसे मैं करुंगा और अपने बेटो के सपने पूरे करुंगा उससे मेरे दिल को काफी सुकून मिलेंगा।
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