'फिर हो सकता है पठानकोट, पाकिस्तान से बातचीत बेकार'
क्या पाकिस्तान से बात करने का कोई फायदा है? क्या पाकिस्तान दबाव डालने-धमकाने के उपकरण के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल करने की अपनी नीति बदलेगा?

नई दिल्ली: क्या पाकिस्तान से बात करने का कोई फायदा है? क्या पाकिस्तान दबाव डालने-धमकाने के उपकरण के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल करने की अपनी नीति बदलेगा? क्या पाकिस्तानी फौजी जनरल नागरिक सरकार को भारत के बारे में कोई रणनीतिक विदेश नीति फैसला लेने की इजाजत देंगे? क्या भारत कभी भी पलट कर दबाव-धमकाने वाले विकल्प का, ऐसे विकल्प का जिससे पाकिस्तानी राज्य के ढांचे को चोट पहुंचे, इस्तेमाल करेगा? ये और ऐसे ही कई सुलगते सवाल मंगलवार को यहां इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सोसाइटी फॉर पॉलिसी स्टडीज (एसपीएस) द्वारा आयोजित 'लाहौर टू पठानकोट : टरबुलेंट ट्रैजेक्ट्री' शीर्षक पर परिचर्चा में पूर्व नीति निर्माता, अवकाश प्राप्त जनरल और रणनीतिक विश्लेषक के बीच उठे। इस मौके पर बड़ी संख्या में राजनयिक और रणनीतिक-सामरिक क्षेत्र से संबंध रखने वाले समुदाय के सदस्य मौजूद थे। इस बारे में व्यापक सहमति दिखी कि प्राथमिक संवाद से आतंकवाद को अलग करने से लक्ष्य को हासिल करने में मदद नहीं मिलेगी। इस बात पर भी गंभीर संशय जताया गया कि क्या पाकिस्तान के साथ रिश्तों में 'इतिहास की धारा मोड़ने' की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशें सफल हो पाएंगी?
अफगानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत और अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बारे में नीति बनाने के प्रभारी रह चुके विदेश मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव विवेक काटजू ने कहा कि पाकिस्तान की सेना भारत के साथ सहयोग की कोई वास्तविक इच्छा नहीं रखती। उन्होंने इस बात पर संदेह जताया कि क्या मोदी की अचानक लाहौर यात्रा में मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच की बातचीत का जनरल (सेना) भी हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि 'श्रेणियों में बंटा आतंकवाद' पाकिस्तान के उस सुरक्षा सिद्धांत का हिस्सा बना रहेगा, जिसकी बागडोर सेना के हाथ में है। विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के विजिटिंग फेलो एवं लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) सैयद अता हसनैन ने कहा, "पठानकोट (जैसे हमला) फिर होगा, अगर भारत ने इस हमले से अपने असैन्य-सैन्य ढांचे में गुणात्मक बदलाव के बारे में कोई अच्छा सबक नहीं सीखा।"
किंग्स इंडिया इंस्टीट्यूट के विश्लेषक जोरावर दौलत सिंह ने कहा कि भारत को 'पाकिस्तान को बदलने की कोशिश' रोक देनी चाहिए या 'अतीत के व्यवहार को बदलने की कोशिश' रोक देनी चाहिए। इसके बजाए 'उन साधनों के इस्तेमाल पर जोर देना चाहिए जिनसे अपना लक्ष्य हासिल होता हो।' इनमें 'जवाबी धमकी के उपायों' का इस्तेमाल शामिल है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना होगा, वहां चोट पहुंचानी होगी जहां उसे सबसे अधिक दर्द हो। सिंह ने कहा कि सरकारों के बदलने के बावजूद, भारत आज भी विदेश नीति में नेहरू के दौर के आदर्शवाद पर टिका हुआ है। यह उम्मीद लगाए हुए है कि दूसरा पक्ष अपने व्यवहार को बदल देगा। काटजू ने सिंह की बातों से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि पुरानी बातों से फायदा नहीं होने वाला है। काटजू ने कहा कि 'वाघा पर चाहे जितनी भी मोमबत्तियां जला लो', इससे उन लोगों की मानसिकता पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ेगा जो जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे उन आतंकवादी संगठनों पर नियंत्रण रखते हैं, जिनके प्रशिक्षित कार्यकर्ता भारत पर लगातार हमले करते रहते हैं।
परिचर्चा की अध्यक्षता एसपीएस के निदेशक सी.उदय भास्कर ने की। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को यथार्थवादी राष्ट्रीय सुरक्षा क्षमता को हासिल करने की दिशा में काम करना होगा ताकि पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थन न करने के लिए बाध्य किया जा सके। सभी वक्ताओं का कहना था कि भारत को अंतर्राष्ट्रीय राय, खासकर पश्चिमी देशों की राय का बहुत दबाव अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। अपनी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से नीति बनानी चाहिए क्योंकि पश्चिम कभी भी पाकिस्तान को नहीं छोड़ेगा। बेहद अस्थिर अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में पश्चिमी देशों को अपने सुरक्षा हितों के लिए पाकिस्तान की जरूरत है।