मध्यप्रदेश: देश में 1960 के दशक की शुरूआत में आरंभ हरित क्रांति की कठोर समीक्षा की मांग करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव, सुरेश भैयाजी जोशी ने शुक्रवार को कहा कि हरित क्रांति के नाम पर पेश नीतियों के चलते किसान बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और बड़े उद्योगों पर निर्भर हो गए हैं।
जोशी ने उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ मेले की पृष्ठभूमि में प्रदेश सरकार के आयोजित अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ में कृषि पर केंद्रित सत्र में कहा, हमने हरित क्रांति के नाम पर जिन कृषि नीतियों को स्वीकार किया, उनसे किसान स्वावलंबन खो बैठे। वे खाद और बीज के लिये बड़ी कम्पनियों पर निर्भर हो गए हैं। सरकार, समाज, वैज्ञानिको और किसानों को हरित क्रांति की कठोरता से समीक्षा करनी चाहिए और विचार करना चाहिए कि पिछले 60 बरसों में हमने पारंपरिक कृषि की जगह आधुनिक कृषि को बढ़ावा देकर आखिर क्या हासिल किया।
उन्होने कहा, हम खेती में यंत्रों के इस्तेमाल का पूरी तरह समर्थन नहीं कर सकते, क्योंकि इस तरह की खेती किसानों को परावलम्बन के रास्ते पर धकेल रही है। किसानों को कृषि यंत्रों के लिए बड़े उद्योगों पर निर्भर रहना पड़ता है। संघ महासचिव ने देश में समग्र कृषि नीति बनाने की मांग करते हुए कहा कि सरकार को चाहिए कि वह इस नीति को आकार देते वक्त अलग-अलग स्थानों की जलवायु और जमीनी हालात का ध्यान रखे।
जोशी ने कहा, यह भारत के वैज्ञानिको और नीति निर्धारकों का दायित्व है कि वे पारंपरिक और आधुनिक खेती के बीच मौजूदा हालात के मद्देनजर संतुलन कायम करते हुए योजनाएं बनाएं। मशहूर योग गुर बाबा रामदेव ने रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों का हवाला देते हुए कहा कि देश के कृषि क्षेत्र में विज्ञान के नाम पर झूठ भी परोसा गया है और वक्त आ गया है, जब जैविक और प्राकृतिक कृषि को अपनाया जाए।
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