नई दिल्ली: भारत रंग महोत्सव के आठवे दिन की शुरुआत “मीट दी डायरेक्टर्स” से हुई। पिछले दिन की प्रस्तुति “गदल”, “गबरघिचोर” एवं “कबीर” के निर्देशकों से बातचीत करने के इस अवसर पर बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे। इन नाटको के निर्देशक सतीश आनंद, प्रवीन के.गुंजन एवं शेखर सेन ने दर्शको से बातें की।
अपनी प्रस्तुति पर प्रवीन के. गुंजन ने कहा, “ जो नाटक पहले लिखें गए है मैं उन्हें आज से जोड़ने की कोशिश करता हूं। रंगमंच के लिए कोई निर्धारित व्याकरण नहीं बनाया गया है इसलिए दर्शको तक अपनी बात कहने के बहुत से तरीके है।” चूंकि “गदन” की प्रस्तुति में एक संगीत प्रदर्शन शामिल था, उन्होंने नाटक में संगीत की अहमियत के बारे कहा, “प्रवाह में जो शब्द संगीत के माध्यम से तैरता है, इसको ध्यान में रखा जाना ज़रूरी है। प्रस्तुति में गीत के ज़रिये भी दर्शको से संवाद करना ज़रूरी है।”
पद्मश्री शेखर सेन द्वारा “कबीर” कमानी सभागार में प्रदर्शित (संगीतमय नाटक) किया गया। प्रदर्शन की शेली के चयन पर उठे सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “रंगमंच सपनों की दुनिया का एक उत्पादन होता है। मेरे प्रदर्शन की भाषा संगीत है। यह मेरे लिए तांबे की तरह है। जितना मैं इसे पॉलिश करूँगा ,यह और चमक जाएगी।” गदल के निर्देशक सतीश आनंद ने कहा, “रंगमंच रुड़ीवादी मूल्यों पर कहा नहीं जा सकता है। रंगमंच समझने के लिए व्यापक दृष्टि के साथ खुले दिमाग की आवश्यकता होती है।”
इमर्जिंग ट्रेंड में थिएटर की शिक्षा पर अपने अनुभव को साझा करते हुए शान्मुघा राजा ने कहा, “यदि एक अभिनेता अपने ही ' व्यक्तित्व ' को बनाना चाहता है तो उसे स्वयं प्रशिक्षण से जाना पड़ता है और प्रकृति के अनुरूप खुदको विकसित करने के उपायों को अपनाना पडता है।”
साहित्य के साथ-साथ थिएटर के अभ्यास पर जोर देते हुए नेशनल स्कूल ड्रामा के स्नातक योगेंद्र चौबे ने कहा, "यह महत्वपूर्ण है कि आप प्रमाणित कर सके कि आप नाटक के द्वारा क्या पेश कर रहे हैं। "
भारत रंग महोत्सव में हुई एक्टिंग के नए ट्रेंड्स पर चर्चा
भारत रंग महोत्सव में “इमर्जिंग ट्रेंड्स” के तीन दिवसीय सेमिनार थियेटर में एक्टिंग पर चर्चा हुई। प्रख्यात रंगमंची कलाकार रमनजीत कौर, कलईरानी, चिन्मय मंडलेकर एवं टीकम जोशी चर्चा में मौजूद रहे। अभिनेता की भूमिका के बारे में कहते हुए चिन्मय मंडलेकर ने कहा, “अभिनेता को अपनी कला को लेकर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। जो कर चुके है उसे भुलाकर अपने किरदार पर भरोसा करना ज़रूरी है।”
टीकम जोशी ने कहा, “हर मंचन में नया तरीका अपनाने की ज़रूरत होती है। आप एक ही विधि को हर नए प्रयोग में नहीं आज़मा सकते।” डिअर चिल्ड्रन की निर्देशक रुवंथि दे चिच्केरा ने अपनी नाट्य प्रस्तुति के बारे में कहा, “एक प्रस्तुति की प्रक्रिया एकदम अलग होती है।
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