साईं बाबा की पुण्यतिथि पर जानें कैसे हुई उनके नाम की उत्पत्ति!
नई दिल्ली: शिरडी साईं बाबा एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु, योगी और फ़कीर थे। साईं बाबा को कोई चमत्कारी पुरुष तो कोई दैवीय अवतार मानता है, लेकिन कोई भी उन पर यह सवाल नहीं उठाता कि
नाम की उत्पत्ति
बाबा के नाम की उत्पत्ति 'साईं' शब्द से हुई है, जो मुस्लिमों द्वारा प्रयुक्त फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- पूज्य व्यक्ति और बाबा पिता के लिए एक हिन्दी शब्द।
अनुयायी
साई बाबा एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु और फ़कीर थे, जो धर्म की सीमाओं में कभी नहीं बंधे। वास्तविकता तो यह है कि उनके अनुयायियों में हिन्दू और मुस्लिमों की संख्या बराबर थी। श्रद्धा और सबूरी यानी संयम उनके विचार-दर्शन का सार है। उनके अनुसार कोई भी इंसान अपार धैर्य और सच्ची श्रद्धा की भावना रखकर ही ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है।
सबका मालिक एक है के उद्घोषक वाक्य से शिरडी के साईं बाबा ने संपूर्ण जगत को सर्वशक्तिमान ईश्वर के स्वरूप का साक्षात्कार कराया। उन्होंने मानवता को सबसे बड़ा धर्म बताया और कई ऐसे चमत्कार किए, जिनसे लोग उन्हें भगवान की उपाधि देने लगे। आज भी साईं बाबा के भक्तों की संख्या को लाखों-करोड़ों में नहीं आंका जा सकता।
शिरडी में आगमन
कहा जाता है कि सोलह वर्ष की अवस्था में साईं बाबा महाराष्ट्र के अहमदनगर के शिरडी गाँव पहुँचे थे और जीवन पर्यन्त उसी स्थान पर निवास किया। शुरुआत में शिरडी के ग्रामीणों ने पागल बताकर उनकी अवमानना की, लेकिन शताब्दी के अंत तक उनके सम्मोहक उपदेशों और चमत्कारों से आकर्षित होकर हिन्दुओं और मुस्लिमों की एक बड़ी संख्या उनकी अनुयायी बन गई।
कुछ लोग मानते थे कि साईं के पास अद्भुत दैवीय शक्तियाँ थीं, जिनके सहारे वे लोगों की मदद किया करते थे। लेकिन खुद कभी साईं ने इस बात को नहीं स्वीकारा। उनके चमत्कार अक्सर मनोकामना पूरी करने वाले रोगियों के इलाज़ से संबंधित होते थे। वे कहा करते थे कि मैं लोगों की प्रेम भावना का ग़ुलाम हूँ। सभी लोगों की मदद करना मेरी मजबूरी है।
सच तो यह है कि साईं हमेशा फ़कीर की साधारण वेश-भूषा में ही रहते थे। वे जमीन पर सोते थे और भीख माँग कर अपना गुजारा करते थे। कहते हैं कि उनकी आंखों में एक दिव्य चमक थी, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती थी। साई बाबा का एक ही लक्ष्य था- "लोगों में ईश्वर के प्रति विश्वास पैदा करना"।
मृत्यु
साईं बाबा अपनी घोषणा के अनुरूप 15 अक्टूबर, 1918 को विजया दशमी के विजय-मुहूर्त्त में शारीरिक सीमा का उल्लंघन कर निजधाम प्रस्थान कर गए। इस प्रकार 'विजया दशमी' उनका महासमाधि पर्व बन गया। कहते हैं कि आज भी सच्चे साईं-भक्तों को बाबा की उपस्थिति का अनुभव होता है।
