नई दिल्ली: छतरी, टटमोर, डुंघरू या गुच्छी। कितने ही नाम है इस अजूबे के, लेकिन इसका न सिर है न पैर। यह औषधिय गुणों से भरपूर होती है। इस औषधीय गुणों से भरपूर गुच्छी शिमला के जंगलों में लगती है। इसे ढूंढने के लिए यहां के ग्रामीण जगलों में जाते हैं। प्रकृति के खजाने के इस कीमती तोहफे को पाने के लिए ग्रामीणों में हर बार की तरह कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है। गुच्छी की कीमत 25 से 30 हजार रु. किलो है।
इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए गुच्छी एक वरदान की तरह है। क्योंकि इससे यहां रहने वाले लोगों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है। स्थानिय लोगों की माने तो गुच्छी पहाड़ों पर बिजली की गड़गड़ाहट व चमक के कारण बर्फ से निकलती है। बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है। इस सब्जी का इस्तेमाल लोग सर्दियों में करते हैं। संतश्री ने बताया कि 1980 के सिंहस्थ में जूना अखाड़ा के एक महंत ने 45 लाख रुपए की गुच्छी की सब्जी का भंडारा सात दिन तक चलाया था।
यूं तो यह सब्जी औषधीय गुणों से भरपूर है लेकिन इससे नियमित खाने से दिल की बिमारियां दूर हो जाती है। यह सब्जी हार्ट पेशेंट के लिए उपयोगी होती है। गुच्छी का वैज्ञानिक नाम मार्कुला एस्क्यूपलेंटा है, लेकिन इसे हिंदी में स्पंज मशरूम कहा जाता है। इस सब्जी के लिए जहां एक ओर लोगों में प्रतिस्पर्धा लगती है वहीं दूसरी ओर अमरीका, यूरोप, फ्रांस, इटली व स्विट्जरलैंड के लोग गुच्छी को खूब पसंद करते हैं। इसमें विटामिन-बी और डी के अलावा विटामिन-सी और विटामिन-के प्रचुर मात्रा में होता है। इन इलाकों में रहने वाले लोग सीजन के समय जंगलों में ही डेरा डालकर गुच्छी इकट्ठा करते हैं। इन लोगों से गुच्छी बड़ी कंपनियां 10 से 15 हजार रुपए प्रतिकिलो के हिसाब खरीद लेती हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति किलो है।
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