नई दिल्ली: तमिलनाडु सरकार ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर राजीव गांधी हत्याकांड मामले में उससे अपने फैसले की समीक्षा करने की मांग की। उस फैसले में सजा में कमी करने के मामले में केंद्र को राज्यों पर प्राथमिकता दी गई थी। याचिका में शीर्ष अदालत से अपने पिछले साल के दिसंबर के फैसले की समीक्षा करने की मांग की गई है। उसमें वस्तुत: राज्य सरकार की सजा माफी के फैसले को पलट दिया गया था। पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि राज्य सरकारों को कुछ मामलों में दोषियों को मुक्त करने से पहले राज्य सरकारों को केंद्र सरकार की सहमति अवश्य लेनी चाहिए।
समीक्षा याचिका में कहा गया कि दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार केंद्र सरकार को सजा को माफ करने या कम करने में कोई प्राथमिकता हासिल नहीं है और शीर्ष अदालत की पीठ की तरफ से यह कहना गलती है कि संवैधानिक योजना के तहत केंद्र को विशेष दर्जा हासिल है। याचिका में कहा गया है, दोषियों की सजा को माफ करने की स्थिति में राज्य सरकार, जो कार्यपालक प्राधिकार है, वो इस तरह के दोषियों की सजा को कम करने या रिहा करने की स्थिति में उसके नतीजे के बारे में फैसला करने में अधिक सक्षम है क्योंकि वह दोषियों की दोषसिद्धि से संबंधित मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अधिक करीब है।
शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने कहा था कि दोषियों की तरफ से किसी विशेष अर्जी के बिना राज्य स्वत: संज्ञान लेकर सजा माफी की शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने 20 फरवरी 2014 को राजीव गांधी हत्याकांड के तीन दोषियों मुरगन, संतन और अरिवू को रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी। दो दिन पहले ही राज्य सरकार ने उनकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील किया था। शीर्ष अदालत ने बाद में चार अन्य दोषियों---नलिनी, रॉबर्ट पायस, जयकुमार और रविचंद्रन की रिहाई पर भी रोक लगा दिया था। अदालत ने कहा था कि राज्य सरकार की तरफ से प्रक्रियागत चूक हुई थी।
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