सेना का नहीं हुआ सही इस्तेमाल
1962 में देश का राजनीतिक नेतृत्व यह पूरी तरह समझ नहीं पाया कि सेना का इस्तेमाल कहां और कैसे किया जाए। उस समय सेना को पुलिस की तरह इस्तेमाल किया गया। सेना को आदेश दिया गया कि वह सीमा पर जाए और हर सौ गज पर या एक वर्ग किलोमीटर पर नाकाबंदी कर दे।
अचानक मिले आदेश का पालन करते हुए हमारे जवान जब वहां पहुंचे तो न वहां सड़कें थीं, न उस क्षेत्र के नक्शे उनके पास थे, न ही वे जरूरी हथियारों से लैस थे, न उस बर्फीले क्षेत्र में लड़ने और रहने के लिए उनके पास कपड़े थे। ऊंचाई और ठंड की स्थिति से सैन्य और अन्य लॉजिस्टिक कार्यों में सैनिकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कई सैनिक जमा देने वाली ठण्ड से मर गए।
इस युद्ध में 1383 भीरतीय सैनिक मारे गए थे जबकि 1047 घायल हुए थे। इतना ही नहीं करीब 1700 सैनिक लापता ही हो गए थे और 3968 सैनिकों को चीन ने गिरफ्तार कर लिया था। जबकि चीन के कुल 722 सैनिक मारे गए, 1697 घायल हुए थे। भारत की तरफ से बारह हजार सैनिक चीन के 80 हजार सैनिकों का मुकाबला कर रहे थे।
लेकिन राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की अक्षमता के कारण सैनिकों की बहादुरी भी काम नहीं आयी। उस समय भारतीय वायुसेना चीनी वायुसेना के मुकाबले बहुत आगे थी, लेकिन भारतीय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने वायुसेना को कोई काम नहीं दिया, उसे लड़ाई में आगे नहीं लाया। अगर हम अपनी हवाई शक्ति का प्रयोग करते तो परिणाम कुछ और होता।
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