1. Hindi News
  2. भारत
  3. राष्ट्रीय
  4. 'जानवरों की कोई आवाज नहीं होती, लेकिन हमारी है', प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों पर अंबिका शुक्ला ने दी चेतावनी

'जानवरों की कोई आवाज नहीं होती, लेकिन हमारी है', प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों पर अंबिका शुक्ला ने दी चेतावनी

लैब्स में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार के प्रस्तावित नियमों को लेकर लोग विरोध जता रहे हैं। इस मामले पर एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला ने इंडिया टीवी से खास बात की है।

लैब्स में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर केंद्र सरकार के प्रस्तावित नियमों के मसौदे पर सार्वजनिक राय देने की समय-सीमा 5 नवंबर को खत्म हो जाएगी, ऐसे में तमाम एक्टिविस्ट जानवरों के खिलाफ क्रूरता को रोकने के लिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। इसी में एक आवाज एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला की भी है, जिन्होंने इस मुद्दे पर इंडिया टीवी से खुलकर बात की।

प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों पर अंबिका ने जताई चिंता

एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला ने प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने ये चेतावनी भी दी है कि अगर लैब टेस्टिंग नियमों में बदलाव हुए तो इससे पशुओं के सुरक्षा संबंधी उपाय कमजोर हो सकते हैं, उन्हें गैर-जरूरी दर्द से गुजरना पड़ सकता है और ये वैज्ञानिकों की रिसर्च पर बुरा असर डाल सकता है।

बता दें कि अंबिका शुक्ला 'पीपल फॉर एनिमल्स' (भारत के सबसे बड़े गैर-लाभकारी पशु कल्याण संगठनों में से एक) से जुड़ीं हैं। वह एनीमल राइट एक्टिविस्ट भी हैं और एनिमल वेलफेयर एडवोकेट भी हैं।

अंबिका ने कहा कि प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों का फ्रेमवर्क जानवरों पर प्रयोगों को रेगुलेट करने के मामले में देश को कई कदम पीछे ले जा सकता है। उन्होंने प्रयोगशाला के जानवरों को प्राप्त करने, प्रयोगों की मंजूरी, सुविधाओं के निरीक्षण और परीक्षण के दौरान होने वाले दर्द के क्लासीफिकेशन से जुड़े प्रावधानों पर सवाल उठाए।

प्रस्तावित नियमों पर 5 नवंबर से पहले सरकार के पास अपनी आपत्तियां और सुझाव भेजें: अंबिका

अंबिका ने इंटरव्यू के दौरान कहा कि 'गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिसेज' (GLP) को लागू करके मजबूत किया गया मौजूदा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क, भारत को वैज्ञानिक रिसर्च में विश्वसनीयता बनाने में मदद कर रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इन सुरक्षा उपायों को कमजोर करने के नतीजे केवल जानवरों के कल्याण तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इससे रिसर्च के नतीजों की विश्वसनीयता, जन स्वास्थ्य और एक वैज्ञानिक केंद्र के रूप में भारत की साख पर भी बुरा असर पड़ सकता है। चूंकि ये नियम अभी केवल एक प्रस्ताव के चरण में हैं, इसलिए उन्होंने नागरिकों, वैज्ञानिकों और पशु कल्याण संगठनों से अपील की है कि वे 5 नवंबर से पहले सरकार के पास अपनी आपत्तियां और सुझाव भेजें।

मौजूदा सुरक्षा उपाय क्यों मायने रखते हैं? 1997 की समिति से लेकर GLP मानकों तक

अंबिका ने भारत में प्रयोगशाला जानवरों से जुड़े नियमों की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि वैज्ञानिक प्रयोगों में जानवरों के इस्तेमाल की निगरानी के लिए 1997 में 'कमेटी फॉर द पर्पस ऑफ कंट्रोल एंड सुपरविज़न ऑफ एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स' (CPCSEA) की स्थापना की गई थी। उन्होंने बताया कि शुरुआती वर्षों में जब प्रमुख चिकित्सा और रिसर्च संस्थानों की प्रयोगशालाओं की जांच की गई, तो जांचकर्ताओं को कथित तौर पर पता चला कि वहां जानवरों को बहुत ही खराब स्थितियों में रखा जा रहा था।

"खबरों के अनुसार, कुछ जानवरों को प्रयोगशालाओं में सालों तक ऐसे ही छोड़ दिया गया था, न तो उनका इस्तेमाल किसी प्रयोग में हुआ, न ही वहां साफ-सफाई की उचित व्यवस्था थी और न ही कोई वैज्ञानिक देखरेख। साल 2000 के आसपास नियामक ढांचे में एक बड़ा बदलाव आया, समिति का पुनर्गठन किया गया और शोध में इस्तेमाल होने वाले जानवरों के साथ बर्ताव को बेहतर बनाने के लिए 'गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिसेज' (अच्छी प्रयोगशाला पद्धतियां) लागू की गईं। शुक्ला ने बताया कि इस व्यवस्था के तहत, प्रयोगों की बारीकी से जांच की जाने लगी ताकि यह तय किया जा सके कि क्या वे प्रयोग जरूरी हैं, क्या इस तरह का शोध पहले ही हो चुका है, असल में कितने जानवरों की जरूरत है और उनसे किस तरह के वैज्ञानिक नतीजों की उम्मीद है।"

उन्होंने आगे तर्क दिया कि इन जांचों से जवाबदेही की व्यवस्था कायम करने में मदद मिली और यह सुनिश्चित हुआ कि जानवरों पर कोई भी प्रयोग उसकी वैज्ञानिक आवश्यकता की जांच किए बिना न किया जाए। शुक्ला ने वैज्ञानिक रिसर्च और वैक्सीन विकास में भारत की प्रगति - जिसमें कोविड-19 महामारी के दौरान का प्रदर्शन भी शामिल है - को प्रयोगशाला के कड़े मानकों को बनाए रखने के महत्व से जोड़ा। उनका मुख्य तर्क यह था कि वैज्ञानिक प्रगति की कीमत पर उन नियामक तंत्रों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए, जो विश्वसनीय रिसर्च और जानवरों के साथ मानवीय व्यवहार को सुनिश्चित करते हैं।

'कहीं से भी कोई भी जानवर' उठाकर लाना बन सकती है बड़ी समस्या

अंबिका शुक्ला की सबसे बड़ी आपत्तियों में लैब्स में प्रयोगों के लिए जानवरों को प्राप्त करने के तरीकों में प्रस्तावित बदलाव हैं। उन्होंने बताया कि मौजूदा व्यवस्था के तहत, प्रयोगों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों का आमतौर पर रजिस्टर्ड प्रयोगशाला सुविधाओं के भीतर ही पैदा किया जाना जरूरी होता था। इससे रिसर्चरों को जानवरों के स्वास्थ्य, मेडिकल हिस्ट्री और अन्य ऐसी स्थितियों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती थी, जिनका प्रयोग के नतीजों पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित ड्राफ्ट के नियम 5 के तहत, प्रयोगशालाओं को तब अन्य स्रोतों से जानवर लाने की अनुमति मिल सकती है, जब उनके अपने परिसर में पाले गए जानवर उपलब्ध न हों। शुक्ला ने इस बात पर सवाल उठाया कि 'स्वीकार्य वैकल्पिक स्रोत' किसे माना जाएगा, इसे लेकर स्पष्टता की कमी है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान की वजह से सड़कों, बाज़ारों, निजी घरों या यहां तक कि जंगली आवासों से भी जानवरों को उठाए जाने का रास्ता खुल सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जानवरों को लाने के स्रोतों पर स्पष्ट पाबंदियां न होने से आवारा कुत्तों, बिल्लियों और अन्य सामुदायिक जानवरों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

अंबिका शुक्ला ने इस बात पर चिंता जताई कि "अगर किसी भी जानवर को कहीं से भी लाया जा सकता है, तो फिर किसी को सड़क से या किसी के घर से जानवर उठाने से कौन रोकता है?" 

शुक्ला ने इस तरह के प्रावधान के वैज्ञानिक इम्पलीकेशन पर भी सवाल उठाए। अनकंट्रोल एनवायरमेंट से लाए गए जानवरों में पहले से ही कोई बीमारी, संक्रमण या स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याएं हो सकती हैं, जिनके बारे में रिसर्चरों को जानकारी न हो। उनके अनुसार, ऐसे कारक प्रयोग के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि परिणाम वास्तव में उस पदार्थ या प्रक्रिया की वजह से मिले हैं, जिसका परीक्षण किया जा रहा था।

संस्थानों को प्रयोगों की मंजूरी का अधिकार देने से स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था हो सकती है कमजोर 

अंबिका शुक्ला ने पशुओं पर होने वाले प्रयोगों की मंजूरी से जुड़ी प्रस्तावित व्यवस्था में बदलाव को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मौजूदा नियामक ढांचे के तहत एक केंद्रीय प्राधिकरण प्रयोगों की समीक्षा करता है। यह प्राधिकरण जांचता है कि किसी प्रयोग की वैज्ञानिक आवश्यकता और उसका औचित्य क्या है। साथ ही यह भी तय करता है कि प्रयोग के लिए कितने पशुओं की जरूरत होगी।

हालांकि, शुक्ला का आरोप है कि प्रस्तावित नियमों के जरिए अलग-अलग संस्थानों को अपने यहां होने वाले प्रयोगों को मंजूरी देने का ज्यादा अधिकार मिल सकता है। उन्होंने इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संस्थान के लिए अपने ही यहां से आए शोध प्रस्ताव को खारिज करना मुश्किल हो सकता है।

इस व्यवस्था की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि यह कुछ ऐसा ही होगा, जैसे विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी उनके माता-पिता को दे दी जाए। उनके मुताबिक, निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन बेहद जरूरी है।

शुक्ला ने चेतावनी दी कि बाहरी निगरानी को हटाने या कमजोर करने से अनावश्यक प्रयोगों, पशुओं के अत्यधिक इस्तेमाल और बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के शोध किए जाने की आशंका बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि जब संस्थानों को अपने ही शोध प्रस्तावों का मूल्यांकन करने की जिम्मेदारी दी जाएगी, तो वैज्ञानिक जरूरत और संस्थागत सुविधा के बीच का अंतर धुंधला पड़ सकता है।

खुले वातावरण में प्रयोग और निरीक्षण से पहले सूचना देने की व्यवस्था पर सवाल

शुक्ला ने उन प्रावधानों पर भी चिंता जताई, जिनसे उनके मुताबिक प्रयोगशालाओं के बुनियादी ढांचे और निरीक्षण संबंधी नियम कमजोर हो सकते हैं। उन्होंने इस संभावना पर सवाल उठाया कि पर्याप्त रूप से बंद प्रयोगशाला सुविधाओं के बिना भी प्रयोग किए जा सकते हैं।

उनका कहना था कि गर्मी, बारिश, धूल और बाहरी वातावरण में होने वाले बदलाव शोध के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने समझाया कि भरोसेमंद वैज्ञानिक शोध के लिए जरूरी है कि किसी प्रयोग को समान परिस्थितियों में दोहराया जा सके और हर बार एक जैसे नतीजे प्राप्त हों।

उन्होंने सवाल किया, "अगर वातावरण नियंत्रित नहीं होगा और परिस्थितियां लगातार बदलती रहेंगी, तो शोधकर्ता किसी प्रयोग को दोबारा कैसे कर पाएंगे और यह कैसे साबित करेंगे कि उसके नतीजे भरोसेमंद हैं?"

शुक्ला ने प्रयोगशालाओं के निरीक्षण से पहले सूचना देने की प्रस्तावित व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई। उनके मुताबिक, अचानक किए जाने वाले निरीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनके जरिए अधिकारी यह देख सकते हैं कि प्रयोगशालाओं में पशुओं को वास्तव में किन परिस्थितियों में रखा जा रहा है और उन पर किस तरह प्रयोग किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अगर प्रयोगशालाओं को निरीक्षण से पहले सूचना दे दी जाएगी, तो वे अधिकारियों के पहुंचने से पहले अपनी कमियों को अस्थायी रूप से ठीक कर सकती हैं या नियमों के उल्लंघन को छिपा सकती हैं। उनके अनुसार, अगर किसी प्रयोगशाला को जांच से पहले तैयारी करने का मौका दिया जाता है, तो ऐसे निरीक्षण का कोई खास महत्व नहीं रह जाता।

क्या दर्द, पीड़ा और मानसिक आघात का सही वर्गीकरण संभव है?

प्रयोगशालाओं में पशुओं की व्यवस्था और निगरानी के अलावा शुक्ला ने प्रयोगों के दौरान होने वाले दर्द और पीड़ा के प्रस्तावित वर्गीकरण पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में पशुओं को उनके आकार के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है। इसमें छोटे, मध्यम और बड़े आकार के पशुओं के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित हैं। हालांकि, उनका आरोप है कि प्रस्तावित व्यवस्था में इस वर्गीकरण को बदलकर दर्द की गंभीरता के आधार पर प्रयोगों को बांटने की बात कही गई है। इसमें हल्के दर्द, मध्यम दर्द, गंभीर दर्द और मृत्यु जैसी श्रेणियां शामिल हैं।

शुक्ला ने इस व्यवस्था के व्यावहारिक इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जो पशु अपनी पीड़ा को शब्दों में जाहिर नहीं कर सकते, उनके दर्द की तीव्रता का सही आकलन आखिर कैसे किया जाएगा?

उन्होंने खास तौर पर भूखा रखने और अलग-थलग रखने जैसी परिस्थितियों को हल्के दर्द की श्रेणी में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि ये दोनों स्थितियां पशुओं को गंभीर शारीरिक और मानसिक पीड़ा पहुंचा सकती हैं।

शुक्ला ने कहा, "पशु भी इंसानों की तरह डर, तनाव, दर्द, अकेलापन और मानसिक आघात महसूस करते हैं। उनकी सूंघने और सुनने की क्षमता अधिक विकसित होती है, इसलिए प्रयोगशालाओं का अपरिचित वातावरण उनके लिए विशेष रूप से डरावना हो सकता है। उनकी पीड़ा जरूरी नहीं कि प्रयोग शुरू होने के बाद ही शुरू हो। प्रयोगशाला तक पहुंचाने के दौरान और अपरिचित जगहों पर रखे जाने के समय भी पशु तनाव और परेशानी का सामना कर सकते हैं।"

उनके मुताबिक, कुछ पशु डर और तनाव के कारण खाना तक छोड़ देते हैं, जबकि कुछ प्रयोग शुरू होने से पहले ही बीमारी, भूख और मानसिक आघात का शिकार हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि चूंकि पशु किसी प्रयोग के लिए अपनी सहमति नहीं दे सकते और न ही अपनी पीड़ा को शब्दों में बयां कर सकते हैं, इसलिए उनकी देखभाल और सुरक्षा सुनिश्चित करने की पूरी जिम्मेदारी शोधकर्ताओं और नियामक प्राधिकरणों की है।

पशुओं पर होने वाले प्रयोग हमेशा भरोसेमंद नतीजे क्यों नहीं देते?

पशुओं पर जरूरत से ज्यादा प्रयोग किए जाने का विरोध करते हुए शुक्ला ने कहा कि पशुओं और इंसानों की शारीरिक संरचना और जैविक प्रक्रियाओं में अंतर होने के कारण कई बार पशुओं पर किए गए परीक्षण भ्रामक साबित हो सकते हैं।

उन्होंने पेनिसिलिन का उदाहरण दिया, जो शुरुआती एंटीबायोटिक दवाओं में से एक है। उनका दावा था कि शुरुआत में पशुओं पर किए गए परीक्षण इंसानों के मामले में इसकी उपयोगिता को सही ढंग से सामने नहीं ला सके थे। उन्होंने तर्क दिया कि अगर केवल पशुओं पर किए गए परीक्षणों के नतीजों पर भरोसा किया जाता, तो संभव है कि इस महत्वपूर्ण दवा के विकास में बाधा आ जाती।

शुक्ला ने तंबाकू से जुड़े शोध का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि पशुओं और इंसानों के शरीर पर तंबाकू के अलग-अलग प्रभावों का इस्तेमाल तंबाकू उद्योग ने चेतावनियों और प्रतिबंधों को टालने के लिए किया।

उनके मुताबिक, इंसानों में तंबाकू सेवन और फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध सामने आने के बावजूद बंदरों पर बार-बार किए गए प्रयोगों का इस्तेमाल इस वैज्ञानिक प्रमाण को चुनौती देने के लिए किया गया।

उन्होंने कहा कि पशुओं पर किए गए परीक्षण हमेशा यह सटीक जानकारी नहीं दे सकते कि कोई दवा, रसायन या उत्पाद इंसानी शरीर पर किस तरह असर करेगा।

शुक्ला का मानना है कि केवल इसलिए पशुओं पर प्रयोग जारी रखना उचित नहीं है, क्योंकि शोध के लिए लंबे समय से इसी तरीके का इस्तेमाल होता आया है। अब जबकि वैकल्पिक तकनीकें तेजी से विकसित हो रही हैं, तो उन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

AI, स्टेम सेल और कंप्यूटर मॉडल: पशु प्रयोगों के क्या हैं विकल्प?

शुक्ला ने बताया कि विज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है और अब पशुओं पर प्रयोग किए बिना भी शोध के कई विकल्प तलाशे जा सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), स्टेम सेल रिसर्च और कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडल का जिक्र किया।

उनके मुताबिक, इन तकनीकों की मदद से जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जा सकता है और अलग-अलग पदार्थों के प्रभावों का आकलन किया जा सकता है। इससे समय की बचत हो सकती है, अनावश्यक प्रयोगों को कम किया जा सकता है और इंसानी स्वास्थ्य के लिहाज से अधिक प्रासंगिक नतीजे मिल सकते हैं।

उन्होंने जोर देकर कहा कि शोध का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि शोध मौलिक हो, वैज्ञानिक रूप से उपयोगी हो और उसके नतीजे भरोसेमंद हों।

उन्होंने अपने विचार का सार बताते हुए कहा, "वैज्ञानिक प्रगति का मतलब ज्यादा प्रयोग करना नहीं है। इसका मतलब है बेहतर प्रयोग करना।"

हालांकि, शुक्ला ने स्पष्ट किया कि वह भारत में पशुओं पर होने वाले सभी प्रयोगों पर तत्काल और पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं कर रही हैं। इसके बजाय उनका कहना है कि देश को मौजूदा सुरक्षा उपायों को बरकरार रखना चाहिए और धीरे-धीरे ऐसे विकल्पों को अपनाना चाहिए, जिनसे पशुओं पर निर्भरता कम की जा सके।

क्या भारत सस्ते और कम नियमन वाले पशु परीक्षणों का केंद्र बन सकता है?

इंटरव्यू के दौरान शुक्ला ने इस आशंका को भी उठाया कि विदेशी कंपनियां भारत की प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल ऐसे परीक्षणों के लिए कर सकती हैं, जिन्हें अपने देशों में कराना उनके लिए मुश्किल, महंगा या नियमों के कारण प्रतिबंधित हो सकता है।

उन्होंने आगाह किया कि अगर भारत में मौजूदा सुरक्षा नियमों को कमजोर किया जाता है, तो देश उन कंपनियों के लिए आकर्षक ठिकाना बन सकता है, जो कम लागत पर और कम नियामक निगरानी के बीच पशुओं पर परीक्षण कराना चाहती हैं।

शुक्ला ने आशंका जताई कि भारत कहीं शोध का 'कूड़ाघर' बनकर न रह जाए, जहां विदेशी कंपनियां वास्तविक वैज्ञानिक नवाचार किए बिना अपनी परीक्षण संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल करें।

पशु अधिकार कार्यकर्ता ने कहा कि कंपनियां कम खर्च में नियामक प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए भारतीय प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल कर सकती हैं, जबकि अपने अधिक उन्नत शोध कार्यों को दूसरे देशों में जारी रख सकती हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसा होने से एक विश्वसनीय वैज्ञानिक शोध केंद्र के रूप में भारत की छवि को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर प्रयोगशालाओं के मानकों और निगरानी व्यवस्था को कमजोर किया जाता है, तो क्या अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और निवेशक भारतीय शोध के नतीजों पर पहले की तरह भरोसा कर पाएंगे?

शुक्ला ने कहा कि भारत पहले ही वैज्ञानिक और फार्मास्युटिकल रिसर्च के एक बड़े केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। ऐसे में नियामक ढांचे को कमजोर करने से वर्षों की मेहनत और और प्रगति पर पानी फिर सकता है।

पशु परीक्षण और क्रूरता-मुक्त कॉस्मेटिक्स बाजार के रूप में भारत की पहचान

शुक्ला ने कॉस्मेटिक्स के क्षेत्र में पशुओं पर परीक्षण को लेकर भारत में पहले से लागू प्रतिबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने यह साबित किया है कि पशुओं पर प्रयोग किए बिना भी कॉस्मेटिक्स उद्योग का विकास किया जा सकता है।

उन्होंने इस बात को समझाने के लिए लैक्मे सहित भारतीय ब्रांड्स का उदाहरण दिया और कहा कि कॉस्मेटिक्स के परीक्षण में पशुओं के इस्तेमाल पर प्रतिबंध होने के बावजूद इस उद्योग ने विकास जारी रखा है।

उन्होंने चिंता जताई कि प्रस्तावित बदलावों से ऐसे रास्ते खुल सकते हैं, जिनके जरिए विदेशी कंपनियां भारतीय प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल उन परीक्षणों के लिए कर सकेंगी, जिन पर उनके अपने देशों में प्रतिबंध या पाबंदियां हैं।

शुक्ला ने यह भी कहा कि अब निवेश से जुड़े फैसलों में नैतिक पहलुओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। शेयरधारक और निवेशक इस बात पर भी ध्यान दे रहे हैं कि कंपनियां अपने उत्पादों का निर्माण किस तरह करती हैं और शोध के दौरान किन प्रक्रियाओं का पालन करती हैं।

उन्होंने कहा, "क्रूरता-मुक्त और नैतिक तरीकों का इस्तेमाल अब केवल पशु कल्याण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक कारोबार और निवेश के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण पहलू बनता जा रहा है।"

करुणा के साथ किया गया शोध ही वास्तविक वैज्ञानिक शोध

जो प्रयोगशालाओं के भीतर होने वाली गतिविधियों से परिचित नहीं हैं, उनके लिए शुक्ला ने कहा कि पशु कल्याण को सार्वजनिक स्वास्थ्य और इंसानी सुरक्षा से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि डर, भूख, तनाव और खराब परिस्थितियों में रखे गए पशुओं के शरीर में शारीरिक बदलाव हो सकते हैं, जो प्रयोगों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

उन्होंने कहा, "दूसरी ओर, साफ-सुथरी प्रयोगशालाएं, पर्याप्त वेंटिलेशन, उचित जगह और स्वच्छ परिस्थितियां बनाए रखने से पशुओं का कल्याण सुनिश्चित करने के साथ-साथ वैज्ञानिक शोध की गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है।"

शुक्ला ने कहा कि अविश्वसनीय शोध के नतीजों का असर आखिरकार आम लोगों के इस्तेमाल में आने वाले उत्पादों और दवाओं पर भी पड़ सकता है।

उन्होंने कहा, "अगर हम तनाव से जूझ रहे पशुओं का इस्तेमाल करेंगे, तो हमें तनावपूर्ण नतीजे ही मिलेंगे। करुणा के साथ किया गया शोध ही वैज्ञानिक शोध है।"

शुक्ला ने इस संदर्भ में महात्मा गांधी के अहिंसा के दर्शन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पशु कल्याण से जुड़े सुरक्षा उपायों को कमजोर करना भारत के करुणा और अहिंसा के लंबे समय से चले आ रहे मूल्यों के विपरीत होगा।

उनका कहना था कि भारत को ऐसा माहौल बनाने के बजाय नैतिक वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए, जहां पशुओं को अनावश्यक प्रयोगों का सामना करना पड़े।

अंबिका शुक्ला की नागरिकों से अपील, 5 नवंबर से पहले सरकार को भेजें आपत्तियां

प्रस्तावित नियमों पर अभी भी जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी जा रही हैं। ऐसे में शुक्ला ने नागरिकों, वैज्ञानिकों और पशु कल्याण संगठनों से अपील की कि वे बचा हुआ समय अपने विचार और चिंताएं सरकार तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करें।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मसौदा अभी कानून नहीं बना है और जनता की प्रतिक्रिया अंतिम फैसले को प्रभावित कर सकती है।

शुक्ला के मुताबिक, मौजूदा नियामक ढांचे ने वैज्ञानिक शोध और पशु कल्याण के बीच पहले से ही संतुलन स्थापित किया हुआ है। ऐसे में इसे कमजोर करने की कोई ठोस वजह नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत को पशु प्रयोगों के विकल्पों में निवेश करते हुए अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं को लगातार मजबूत करना चाहिए।

लोगों से अपनी आवाज उठाने की अपील करते हुए शुक्ला ने कहा, "पशुओं की कोई आवाज नहीं है। उनके पास कोई विकल्प नहीं है। लेकिन हमारे पास है।"

उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे 5 नवंबर की समयसीमा समाप्त होने से पहले प्रस्तावित नियमों पर अपनी आपत्तियां और सुझाव सरकार तक जरूर पहुंचाएं।

इससे पहले नए नियमों के ड्राफ्ट पर गौरी मौलेखी भड़की थीं। उन्होंने कहा था, "जानवरों की पीड़ा को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए"

नोट: आप प्रस्तावित नियमों पर अपने सुझाव या आपत्तियां ईमेल के जरिए cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।

ये भी पढ़ें: लैब में जानवरों पर होंगे खतरनाक प्रयोग? नए ड्राफ्ट पर बवाल, गौरी मौलेखी बोलीं- 'भारत बन जाएगा रिसर्च का डस्टबिन'

Latest India News